परमसन्त सन्त कबीर साहिब जी के समय में काशी में एक ऐसा ही विद्वान था, जिसने बड़े-बड़े दिग्गज विद्वानों को अपनी तर्क शक्ति से शास्त्रार्थ में पराजित किया था। जहाँ भी और जब भी उसने किसी को भी हराया उससे विजय पत्र लिखवाकर उससे हस्ताक्षर करवा लिए। इस प्रकार बड़े-बड़े विद्वानों को पराजित कर जब वह काशी वापिस लौटा, तो उसका अहंकार सातवे आसमान पर पहुँच चुका था। सबको पराजित करने के कारण उसने अपना नाम 'सर्वजित' रख लिया था। काशी वापिस जाकर उसने अपने सारे विजय-पत्र अपनी माता के सामने रख दिए और बड़े गर्व से बोला- "माते। ये सब वे विजय पत्र है जो बड़े-बड़े विद्वानों ने शास्त्रार्थ में परास्त होने के बाद मुझे लिखकर दिये है। आज से मैंने अपना नाम सर्वजित रख लिया है। माते। आज से आप भी मुझे सर्वजित कहकर बुलाया करे।" लेकिन माता बिलकुल भी खुश न हुई उसने माता से प्रशन किया- "माते। मेरी इस दिग्विजय पर क्या आपको कोई प्रसन्नता नहीं हुई?" उसकी माँ जानती थी कि मेरे पुत्र ने केवल उन्ही को हराया है, जो मात्रवाचक ज्ञानी थे। वास्तविकता की जिन्हें तनिक भी समझ नहीं थी। वह इस बात को भली भांति समझती थी कि परमसन्त श्री कबीर साहिब जी इस समय के पूर्ण महापुरुष है जो इसे सही मार्ग दिखा सकते है यह सोचकर उसने उत्तर दिया- "कौन माता अपने पुत्र की विजय पर प्रसन्न नहीं होती? किन्तु तुम्हारी विजय अभी अधूरी है इसलिए मै तुम्हे सर्वजित नहीं कह सकती। यदि तुम कबीर साहिब जी को पराजित कर दो। मै तुम्हे सर्वजित मान लूंगी। सर्वजित ने कहा- माते कबीर साहिब जी तो अनपढ़ है। माता ने कहा- "सांसारिक दृष्टि से वे चाहे अनपढ़ है परन्तु उन जैसा ज्ञानवान मेरी दृष्टि में कोई नहीं है। सर्वजित ने कहा ठीक है माते। जब बड़े-बड़े विद्वान मेरे आगे न टिके, तो एक अनपढ़ व्यक्ति मेरे सामने क्या टिकेगा। यह कहकर सर्वजित परमसंत श्री कबीर जी के घर जा पहुंचा और उन्हें बताया कि मै आपसे शास्त्रार्थ करने के लिए आया हूँ। श्री कबीर साहिब जी ने फ़रमाया- मै तो अनपढ़ हूँ फिर तुम्हारे जैसे विद्वान के साथ शास्त्रार्थ कैसे कर सकता हूँ। "सर्वजित ने कहा- यदि आप शास्त्रार्थ नहीं कर सकते तो फिर अपना पराजय पत्र लिखकर मुझे दे दीजिये।" कबीर जी ने फ़रमाया- कि मै तो पढ़ा लिखा नहीं हूँ, तुम विजयपत्र लिख लो कि सर्वजित जीता और कबीर हारा। मै टूटे फूटे अक्षरों से उस पर हस्ताक्षर कर दूंगा। तुम सबको यह विजय पत्र दिखा देना। सर्वजित ने विजय पत्र लिखा, परन्तु लिखते समय कुछ का कुछ लिख गया। लिखना तो यह था कि सर्वजीत जीता और कबीर हारा। परन्तु लिख बैठा कबीर जीते और सर्वजित हारा। कबीर जी ने उस पर हस्ताक्षर कर दिए। सर्वजित ख़ुशी-ख़ुशी घर पहुंचा और विजय पत्र माता को दिखाया। माता विजय पत्र पढ़कर हंसी और उसे पत्र को वापस करते हुए कहा कि अच्छी तरह पढ़ इसमें क्या लिखा है। सर्वजित ने पढ़ा तो हैरान रह गया कि यह भूल उससे कैसे हो गई। वह पुनः श्री कबीर साहिब जी के पास गया और दौबारा विजय पत्र लिख कर उनके हस्ताक्षर करवाए। घर वापिस आकर माता को विजय पत्र दिया तो माता ने पुनः लौटते हुए कहा कि अच्छी तरह पढ़ इसमें क्या लिखा है। सर्वजित ने पढ़ा तो उसमे फिर वही शब्द लिखे हुए थे कि कबीर जीते और सर्वजित हारा। यह पढ़कर वह बहुत लज्जित हुआ उसका सारा अहंकार चूर-चूर हो गया। तब माता ने उसे समझाया कि तूने केवल पुस्तकी विद्या पढ़ी है अब श्री कबीर साहिब जी की शरण में जाकर आत्मिक विद्या ग्रहण कर। जिस विद्या को पढ़ लेने पर सारी विद्या अपने आप ही आ जाती है। सर्वजित ने माता की बात मानकर परमसंत श्री कबीर साहिब जी की शरण ग्रहण की और आत्म ज्ञान को प्राप्त कर अपना जनम सफल कर लिया। इस आत्म ज्ञान के विषय में ही परमसंत श्री कबीर साहिब जी ने फ़रमाया है कि-
जो यह एक न जानिया, बहु जाने का होय।
एकै ते सब होत है, सब ते एक न होय।।
जो यह एकै जानिया, तौ जानो सब जान।
जो यह एक न जानिया, तौ सबही जान अजान।।
अर्थ- "यदि इस एक विद्या अर्थात आत्मिक विद्या को ना जाना, तो अन्त बहुत सारी विद्याये जानने से क्या होगा। क्योंकि एक आत्मिक विद्या को जान लेने से सब विद्याओं का ज्ञान अपने आप हो जाता है। जबकि अन्य सब विद्याओं को जान लेने से आत्मिक विद्या का ज्ञान नहीं होता।।
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