एक बार शेखचिल्ली की तबीअत खराब हो गई। वह हकीम के पास गया। हकीम ने उसे दवाई देते हुए कहा कि अगले कुछ दिन वह सिर्फ खिचड़ी ही खाए। शेखचिल्ली के लिए यह नया शब्द था। उसने पहले कभी खिचड़ी के बारे में नहीं सुना था। उसने सोचा-कहीं रास्ते में यह शब्द भूल न जाऊँ। इसलिए बेहतर यही है कि रास्ते भर "खिचड़ी' का नाम रटते हुए जाऊँ। ऐसा सोचकर उसने हकीम से बिदा ली और जोर-जोर से "खिचड़ी-खिचड़ी' कहता हुआ चल दिया। रास्ते में काफिले को देखने के चक्र में वह रटना भूल गया। दिमाग पर बुहत जोर डालने के बाद उसे "खाचिड़ी' शब्द याद आया। अब वह "खाचिड़ी-खाचिड़ी' रटता हुआ आगेे बढ़ता गया। थोड़ी ही दूर पर एक किसान अपने खेत में बनी मचान पर बैठा चिड़ियों को उड़ा रहा था। शेखचिल्ली की आवाज़ को सुनकर उसने सोचा कि मैं सवेरे से चिड़ियों को भगा रहा हूँ और यह है कि उन्हे मेरा खेत खाने के लिए कह रहा है। वह गुस्से में मचान से उतरा और उसकी धुनाई करने लगा। शेखचिल्ली ने किसान से नाराज़गी का राज़ पूछा। किसान उसे कारण बताते हुए बोला-यदि तूने अब "खाचिड़ी' की जगह "उड़ चिड़ी' रटना शुरु नहीं किया तो मार-मारकर तेरे अंदर भूसा भर दूँगा। शेखचिल्ली ने डरकर उसकी बात मान ली और "उड़ चिड़ी' रटता हुआ आगे बढ़ गया। आगे एक शिकारी जाल बिछाए बैठा था। "उड़ चिड़ी' कहते सुन उसे लगा कि यह चिड़ियों को चेता रहा है। वह चिढ़कर उसे पीटने लगा। शेखचिल्ली बोला-अरे भाई! मुझे पीट क्यों रहे हो? शिकारी बोला-मैं तुझे नहीं पीटूँगा, यदि तू "उड़ चिड़ी' की जगह "फँस चिड़ी' कहना शुरु कर दे। मरता क्या न करता। वह तैयार हो गया और "फँस चिड़ी' कहता हुआ आगे चल दिया। आगे कुछ चोर चोरी करके आ रहे थे। उन्होने शेखचिल्ली की आवाज़ सुनकर सोचा कि यह ज़रूर कोई जासूस होगा, जो हमें पकड़वाना चाहता है। इससे पहले कि यह हमारा नुकसान करे, हम इसे ही सबक सिखा देते हैं। उन्होने उसे पकड़कर पेड़ से उलटा लटका दिया और डंडों से मारने लगे। जल्दी ही वह बेहोश हो गया। चोर मरा समझकर उसे वहीं छोड़कर भाग गए।
यह है शब्द की महिमा। मुँह से निकला एक-एक शब्द क्या गुल खिला सकता है यह आपने देख ही लिया। तभी तो कहते हैं कि जो भी बोलो सोच-समझकर बोलो। क्योंकि आपके बोले हुए एक-एक शब्द की कीमत बहुत अधिक होती है। लेकिन अधिकतर लोग इस बात को समझते नहीं। उन्हें तो लगता है कि बोलने में क्या जाता है। कौन-सा अपनी जेब से कुछ देना पड़ेगा, इसलिए जो मन में आए बोल दो। यदि आप ऐसा सोचते हैं तो गलत हैं। क्योंंकि सारा खेल बोलने पर ही टिका है, तभी तो ज़बान से निकला एक शब्द भी भारी नुकसान का कारण बन जाता है। क्योंंकि एक बार मुँह से निकला शब्द फिर कभी वापस नहीं आ सकता। फिर भले ही बाद में आप कितनी ही सफाई क्यों न देते फिरें।
ज़बान पर काबू न रखने वालों के कॅरियर में कई ऐसे क्षण आते हैं जब वे अपने बॉस के सामने खड़े हुए कह रहे होते हैं कि सर, मेरे कहने का मतलब यह नहीं था। तब बॉस हो सकता है कि आपको नासमझ मानकर माफ कर दे, लेकिन उसके दिमाग में तो वह बात बैठ ही चुकी होगी। और गाहे-बगाहे वह आपको इसका अहसास भी कराता रहेगा। इसलिए कभी भी ऐसी बात मत कहो जिसके लिए बाद में आपको सफाई देनी पड़ जाए।
दूसरी ओर आपके द्वारा बोली गई बातों से भी आपकी छवि का निर्माण होता है, आपके चरित्र का पता चलता है। इसलिए अपनी कही बात से मुकरना कोई अच्छी बात नहीं। एक-दो बार चलता है, लेकिन यदि आप वाचाल हैं तो फिर अकसर यही गलती करेंगे और मुकरेंगे। इससे आपके चरित्र पर उलटा असर पड़ता है। वैसे भी हम कोई नेता तो हैं नहीं, जो सुबह कही गई बात से शाम को बड़ी ही बेशर्मी से यह कहकर मुकर जाएँ कि मेरी बात को तोड़-मरोड़कर पेश किया गया है। हालाँकि राजनीति में भी ऐसे कई नेता आपको मिल जाएँगे, जो एक बार अपनी ज़बान फिसलने के कारण हाशिए पर डाल दिए गए।
यहाँ गौर करने लायक एक बात और है कि आप जो बोल रहे हैं और जिस रूप में बोल रहे हैं, ज़रूरी नहीं है कि लोग उस बात को उसी रूप में ग्रहण कर रहे हो। देखो न, शेषचिल्ली को खिचड़ी बोलना था और उसे एक शब्द ने अपने रूप बदल-बदल कर उसकी ही खिचड़ी बनवा दी। यानी कहा जा सकता है कि शब्द के बारे में शब्द से ज़्यादा यह महत्वपूर्ण है कि उसे किस रूप में समझा गया है। आप कह कुछ रहे हों, लोग समझ कुछ रहे हों। और हो कुछ का कुछ रहा हो। तो फिर तो गड़बड़ होनी ही है। इसलिए हम तो कहेंगे कि किसी की कही गई कोई बात यदि आपको समझ में नहीं आ रही है तो आगे रहकर एक बार फिर से पूछ लो। पूछने में किस बात की शर्म। क्र्योंकि न पूछकर बाद में जो स्थिति बनेगी वह ज़्यादा शर्मनाक होगी। साथ ही यदि आप कुछ कह रहे हो तो जिसे कह रह हो इससे भी एक बार पूछ लो कि उसने क्या समझा। इससे अर्थ का अनर्थ नहीं होगा। पूछ लोगे तो आपको भी संतुष्टि रहेगी और काम भी वैसा ही होगा जैसा आप चाहते हैं। इसलिए यदि आप बोलने से पहले शब्दों को तोल लोगे तो उन अनजानी विपरीत परिस्थितियों से बच जाओगे जो कि आपके द्वारा कहे गए शब्दों के माध्यम से उत्पन्न हो सकती हैं।
सोमवार, 17 अक्टूबर 2016
बोलने से पहले तोलो
सोमवार, 19 सितंबर 2016
अहंकार की पोटली
अहंकार की पोटली
एक सम्राट एक रथ से गुज़रता था। जंगल से आता था शिकार करके। राह पर उसने एक भिखारी को देखा,जो अपनी पोटली को सिरपर रखे हुए चल रहा था।उसे दया आ गई। बूढ़ा भिखारी था। राजपथ पर मिला होता,तो शायद सम्राट देखता भी नहीं। इस एकान्त जंगल में-उस बूढ़े के थके-माँदे पैर,जीर्ण देह,उस पर पोटली का भार-उसे दया आ गई। रथ रोका, भिखारी को ऊपर रथ पर ले लिया। कहा, कि हाँ तुम्हें जाना है, हम राह में तुझे छोड़ देंगे। भिखारी बैठ गया।सम्राट हैरान हुआ पोटली वह अब भी सिर पर रखे हुए है?उसने कहा,""मेरे भाई,तू पागल तो नहीं है? पोटली अब क्यों सिर पर रखे है?अब तो नीचे रख सकता है। राह पर चलते समय पोटली सिर पर थी,समझ में आती है। पर अब रथ पर बैठकर किसलिए पोटली सिर पर रखे है?'' उस गरीब आदमी ने कहा, ""अन्नदाता,आपकी इतनी ही कृपा क्या कम है कि मुझे रथ पर बैठा लिया। अब पोटली का भार और रथ पर रखूँ क्या यह योग्य होगा?'' लेकिन तुम सिर पर रखे रहो, तो भी भार तो रथ पर ही पड़ रहा है।
ठीक वैसी ही दशा है सन्देह और श्रद्धा की। तुम सोचते हो-सोच तो वही रहा है। तुम करते हो-कर भी वही रहा है। तुम नाहक ही बीच में निर्मित हो जातो हो। तुम यह जो पोटली सिर पर ढो रहे होअहंकार की और दबे जा रहे हो,और अशान्त,और परेशान।और रथ उसका चल ही रहा है, तुम कृपा करो। रथ पर ही पोटली भी रख दो, जिस पर तुम बैठे हो। तुम निÏश्चत होकर बैठ जाओ।श्रद्धा का इतना ही अर्थ है।श्रद्धा इस जगत में परम बोध है। सन्देह अज्ञान है। वह बूढ़ा आदमी मूढ़ था। थोड़ी सी समझ हो, तो पोटली तुम नीचे रख दोगे। सब चल ही रहा है। जब तुम नहीं थे,तुम कल नहीं रहोगे,तब भी सब चलता रहेगा।तुम क्षण भर को हो यहाँ। तुम क्यों व्यर्थ अपने को अपने सिर पर रखे हुए हो? उतार दो पोटली। जीवन,मरण दोनों उसी के हैं। सुख भी उसी का, दुःख भी उसी का। बीमारी भी उसी की,स्वास्थ्य भी उसी का। अगर तुम बीच से बिलुकल हट जाओ,तो बड़ी से बड़ी क्रान्ति घटित होती है। जिस दिन तुम कहते हो,सब तेरा, उसी दिन दुःख मिट जाता है,उसी दिन मृत्यु मिट जाती है। क्योंकि दुःख और मृत्य अस्वीकार में है।
एक बात स्मरण रखें, जो दूसरे को दुःख देता है, वह अंततः दुःखी हो जाते हैं। और जो दूसरे को सुख देता है, वह अंततः बहुत सुख को उपलब्ध होता है।इस वजह से यह कह रहा हूँ कि जो सुख देने की चेष्टा करता है,उसके भीतर सुख के केन्द्र विकसित होते हैं।फल बाहर से नहीं आते हैं, फल भीतर पैदा होते हैं। हम जो करते हैं, उसी की रिसेप्टिविटी हमारे भीतर विकसित हो जाती है।जो प्रेम चाहता है,प्रेम को फैला देऔर जो आनंद चाहता है,वह आनंद को लुटा दे।और जो चाहता है,उसके घर पर फूलों की वर्षा हो जाये, वह दूसरों के आंगनों में फूल फेंक दे,और कोई रास्ता नहीं है।करुणा का एक भाव प्रत्येक को विकसित करना ज़रूरी है साधना के लिए।इसके साथ ही प्रमुदिता-उत्फुल्लता,प्रसन्नता, आनंद का एक बोध, विषाद का अभाव। हम सब विषाद से भरे हैं। हम सब उदास लोग, थके लोग हैं।हम सब हारे हुए,पराजित,रास्ते पर चलते हैं और समाप्त हो जाते हैं। हम ऐसे चलते हैं, जैसे आज ही मर गये हैं। हमारे चलने में कोई गतिऔर प्राण नहीं है,हम सुस्त हैं,और उदास हैं, और टूटे हुए हैं,और हारेहुए हैं।यह गलत है। जीवन कितना ही छोटा हो, मौत कितनी ही निश्चित हो,जिसमें थोड़ी समझ है, वह उदास नहीं होगा
दूनी चन्द
दूनी चन्द
दूनीचन्द ने श्री गुरुनानक देव जी के चरणों में विनय की-मेरे पास सात लाख रुपये हैं,जिन में हर समय मेरा मन लगा रहता है। आप मुझे कोई ऐसी युक्ति बताएं, जिससे यह माया परलोक में मेरे साथ जा सके।
सतपुरुष तो जगत में आते ही जीवों को प्रमाद की निद्रा से जगाने और उन्हें सत्पथ पर लगाने के लिये हैं, अतएव उन्होने उसे एक सुई देते हुए फरमाया- तुम पहले हमारा एक काम करो। यह सुई संभालकर रख लो, परलोक में हम यह सुई तुम से वापस ले लेंगे।
दुनीचन्द ने सुई ले ली और अपनी स्त्री के पास जाकर बोला-महापुरुषों ने यह सुई दी है और फरमाया है कि इसे परलोक में वापिस ले लेंगे,इसलिये इस सुई को कहीं सम्भाल कर रख लो। उनकी पत्नी ने कहा-जब कि संसार की कोई भी वस्तु यहां तक कि मनुष्य की देह भी उसके साथ नहीं जाती,तो फिर आप यह सुई कैसे साथ ले जायेंगे?यह सुई उन्हें वापिस कर दीजिए। ज्ञात होता है कि यह सुई उन्होने केवल आपकी आँखें खोलने के लिए ही आपको दी है ताकिआपको इस बात का ज्ञान हो जाये कि एक सुई तक भी यहाँ से मरते समय साथ नहीं जाती। वे अवश्य ही पूर्ण महापुरुष हैं और हमारे कल्याण के लिये ही हमारे घर में पधारे हैं।इसलिये मेरी मानिये तो उनकी शरण ग्रहण कर जीवन का उद्धार कीजिये। तत्पश्चात दोनों ने श्री गुरु नानकदेव जी के चरणों में उपस्थित होकर विनय की-गुरुदेव! ये सुई मैं आपको परलोक में कैसे दे सकता हूँ क्योंकि इसे परलोक में मैं कैसे ले जा सकता हूँ। श्री गुरुनानक देव जी ने फऱमाया जैसे एकत्र किया हुआ सारा धन ले जाओगे वैसे ये सुई भी ले जाना। दूनीचन्द तुम अमीर नहीं हो तुम गरीब हो क्योंकि साथ ले जाने वाला धन तुम्हारे पास नहीं है।सम्पत्ति वही होती है जो विपत्ति में काम आये। तब श्री गुरुनानकदेव जी ने यह बाणी उच्चारण की।
लख मण सुइना लख मण रूपा लख साहा सिरि साह।।
लख लसकर लख बाजे नेजे लखी घोड़ी पातिसाह।।
जिथै साइरु लंघणा अगनि पाणी असगाह।।
कंधी दिसि न आवई धाही पवै कहाह।।
नानक ओथै जाणीअहि साह केई पातिसाह।।
अर्थः-किसी के पास लाखों मन सोना हो,लाखों मन चांदी हो,लाखों शाहों का भी वह शाह हो,लाखों की सेना हो,लाखों वादन हों,तथा उस बादशाह के पास लाखों घोड़े हों, परन्तु जहां संसार-सागर को पार करना है, जहाँ अथाह आग-पानी विद्यमान है,जहां किनारा दिखाई नहीं पड़ता, जहां लोग चीख-चीखकर शोर मचाते हैं, श्री गुरुनानक देव जी फरमाते हैं कि वहां पता चलता है कि वास्तविक अर्थों में बादशाह कौन है?बादशाह वास्तव में वही है,जो गुरु कीआज्ञानुसार नाम की कमाई करके भवसागर से पार हो जाता है। श्री गुरुनानकदेव जी के वचन सुनकर दोनों ने श्रद्धासहित उनकी स्तुति कर विनय की हम आपकी शरण हैं हमें भव से पार कीजिए।आपने हमारे ऊपर अत्यन्त कृपा की हैआज हम कृतार्थ हो गये। हमेंअपने शिष्यत्व में लीजिये।श्री गुरुनानकदेव जी ने उन्हेंनाम का सच्चा धन बख्शीश किया। आज्ञानुसार नाम की कमाई कर वे अपना जन्म सफल कर गये और लोक-परलोक संवार गये।
शुक्रवार, 19 अगस्त 2016
कमज़ोर पर न चलाएँ जोर
एक बार जंगल में एक शेर अपना शिकार खा रहा था। कि अचानक उसके मुँह में एक हड्डी फँस गई। शेर ने उसे निकालने की बहुत कोशिश की लेकिन वह सफल नहीं हुआ। अब उसे चिंता सताने लगी। वह सोचने लगा कि यदि हड्डी नहीं निकली तो वह खाएगा कैसे? वह और भी ज़ोर से प्रयास करने लगा, परंतु हड्डी को न निकलना था और न ही वह निकली। इस तरह कई दिन बीत गए। वह कुछ भी खा नहीं पा रहा था। इससे शेर बहुत कमज़ोर हो गया और उसे लगने लगा था कि अब वह कुछ ही दिनों का मेहमान है। कमज़ोरी के कारण वह एक पेड़ के नीचे बेजान-सा पड़ गया। उसी पेड़ पर एक कठफोड़वा रहता था। वह कई दिनों से शेर को देख रहा था। उसे यह पहेली समझ में नहीं आ रही थी कि शेर मुँह खोले क्यों लेटा रहता है और शिकार भी नहीं करता।
एक दिन कठफोड़वे ने शेर से पूछ ही लिया-आखिर बात क्या है? आप इस तरह क्योंं लेटे रहते हैं? शेर ने उसकी बात का जवाब देने की बजाय उसे इशारे से अपने पास बुलाया और मुँह में फँसी हड्डी दिखाई। हड्डी को देखते ही कठफोड़वे को वस्तुस्थिति समझ में आ गई। वह शेर से बोला-अच्छा! तो यह बात है। आप यदि चाहें तो मैं आपके मुँह से यह हड्डी निकाल सकता हूँ। लेकिन इसके लिए आपको मुझसे एक वादा करना होगा कि अपना शिकार खाने से पहले कुछ हिस्सा मुझे देंगे। यदि आप तैयार हैं तो कहें।
मरता क्या न करता। शेर ने सिर हिलाकर तुरंत हामी भर दी। कठफोड़वा उड़कर शेर के मुँह में जा बैठा और कई कोशिशों के बाद वह हड्डी निकालने में कामयाब हो गया। जैसे ही हड्डी निकली, वह तुरंत उड़कर पेड़ पर जा बैठा और शेर से बोला-मैने अपना काम कर दिया है, अब आप अपना वादा याद रखना। शेर उसकी बात को अनसुना कर शिकार करने निकल पड़ा।
कुछ घंटों बाद शेर के हाथ एक शिकार लगा। वह अपना वादा भूलकर उसे खाने लगा। इतने में कठफोड़वा उड़ता हुआ वहीं से निकला। उसकी नज़र शेर पर पड़ी। वह उसके पास आया और बोला-हे मित्र! ठहरो! क्या आप अपना दिया हुआ वादा भूल गए। कहाँ है मेरा हिस्सा? शेर ने कठफोड़वे की बात सुनकर उसकी ओर देखा और अनजान सा बनकर बोला-तुम कौन हो? मैं तुम्हें नहीं जानता। मैं तुम्हें अपने शिकार का हिस्सा क्यों दूँ?
उसकी बात सुनकर कठफोड़वे को झटका लगा। वह शेर को याद दिलाने की कोशिश करने लगा। उसकी बात सुनकर शेर ने उसे हिकारत भरी नज़र से देखा और हँसते हुए बोला-तुम जानते हो मैं एक ताकतवर मांसाहारी जानवर हूँ। जब तुम मेरे मुँह में थे, तब मैं तुम्हें आसानी से खा सकता था, लेकिन मैने ऐसा नहीं किया। तुम्हें मेरा अहसान मानना चाहिए। अब चलो भागों यहाँ से, वरना---।
कठफोड़वा बेचारा क्या करता। वह उदास होकर वहां से उड़कर एक पेड़ पर जा बैठा। वह सोच रहा था कि मैं कमज़ोर हूँ इसलिए यह मेरा फायदा उठाकर अपना वादा भूल गया, लेकिन मैं भी कम नहीं हूँ। मैं इसे सबक सिखाकर ही रहूँगा। कुछ समय बाद जब शेर अपना शिकार खाने के बाद आँख बंद कर सुस्ताने लगा तो कठफोड़वा उड़कर उसके पास गया। उसने अपनी लंबी नुकीली चोंच मारकर शेर की एक आँख फोड़ दी। शेर दर्द से कराह उठा। वह बोला-तुम इतने कठोर कैसे हो सकते हो? तुमने मेरी आँख फोड़ दी। वह बोला महोदय! आप जानते ही हैं कि मेरी चोंच बहुत नुकीली है। मैं आसानी से आपकी दूसरी आँख भी फोड़कर आपको अँधा कर सकता था, लेकिन मैने ऐसा नहीं किया। आपको मेरा अहसान मानना चहिए। अब चलो भागो यहाँ से, वरना---।
यह होता है किसी को भी अपने से कमज़ोर समझने का परिणाम। ताकत के मद में फँसे हम कमज़ोर पर अपना ज़ोर दिखाते चले जाते हैं और सोचते हैं कि वह हमारा क्या बिगाड़ लेगा? हम भूल जाते हैं कि समय पड़ने पर एक छोटी-सी चींटी भी हाथी को मार सकती है। इसी तरह जिस दिन कमज़ोर का जोर चलता है तो ताकतवर का भी वही होता है जो शेर का हुआ।
यहाँ कमज़ोरी या ताकत का आशय सिर्फ शारीरिक क्षमता से नहीं है। कोई भी कमज़ोर या ताकतवर किन्हीं भी अर्थों में हो सकता है, जैसे कि व्यावसायिक, प्रशासनिक, आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक आदि स्तरों पर। यदि हम दफ्तर की बात करें तो हम देखते हैं कि कुछ अधिकारी अपने सहकर्मियों की कमज़ोरी का फायदा उठाते हैं। अपना काम निकलवाने के लिए वे उन्हें तरह-तरह के प्रलोभन देते हैं और समय आने पर शेर की तरह पलट जाते हैं। यहाँ हम ऐसे अधिकारियों से कहना चाहेंगे कि आपका तरीका गलत है। इससे आप उनकी नज़रों में गिर जाते हैं। हो सकता है कोई कर्मचारी आपके सामने कुछ कह न पाए, लेकिन उसके मन में यह बात बैठ जाती है। जब कभी ऐसा अवसर आता है कि आपको उसके समर्थन की आवश्यकता होती है तो वह आपका साथ नहीं देता और आपको अप्रिय स्थिति का सामना करना पड़ता है।
इसलिए हमें किसी भी व्यक्ति को कमज़ोर नहीं समझना चाहिए और न ही किसी की मज़बूरी का फायदा उठाना चाहिए। साथ ही अपनी कही हुई बात या वादे को अवश्य पूरा करना चाहिए। ऐसा करके आप अपने सहकर्मियों के प्रिय बन जाते हैं। दूसरी ओर मौका आने पर वे अपनी पूरी क्षमता से आपका साथ देने के लिए भी तैयार रहते हैं।
मंगलवार, 16 अगस्त 2016
मुद्गल ऋषि और स्वर्ग
मुद्गल ऋषि और स्वर्ग
प्रायः यही देखने में आता है कि संसार में वास्तविकता के ज्ञाता बहुत कम हैं किसलिये मनुष्य जन्म की प्राप्ति हुई है, इस जीवन में यथार्थ में क्या करना है और इस जीवन का परम लाभ क्या है, कुछ एक परमार्थी जीवों को छोड़कर प्रायः संसार इस बात से अनभिज्ञ है। यह बात नहीं कि संसार में धार्मिक वृत्ति के और शुभ कर्म करने वाले लोगों की कमी है। नहीं-नहीं, ऐसी बात नहीं है। इस प्रकृति के लोग तो संसार में बहुत मिलेंगे, परन्तु उन्हें वास्तविकता का ज्ञान नहीं। वे केवल इतना ही जानते हैं किः-
यादृशं वपते बीजं क्षेत्रमासाद्य कर्षकः।
सुकृते दुष्कृते वापि तादृशं लभते फळ्म्।।
(महाभारत, अनुशानपर्व 6/6)
अर्थः किसान खेत में जाकर जैसा बीज बोता है, उसी के अनुसार उसको फल की प्राप्त होती है। इसी प्रकार पुण्य अथवा पाप, जैसा कर्म किया जाता है, वैसा ही फल प्राप्त होता है। इसलिये उनकी जितनी भी कार्यवाही होती है, वे जो भी शुभ कर्म-दान, यज्ञ, व्रत, जप, तप आदि करते हैं, उनके पीछे उनकी यही भावना होती है कि इन शुभ कर्मों के फलस्वरुप उनका इहलौकिक जीवन सुखी हो। उन्हें इस जीवन में अधिक से अधिक शारीरिक सुविधाओं, ऐन्द्रिक रस भोगों एवं मान-प्रतिष्ठा की प्राप्ति हो अर्थात् उनका जीवन हर प्रकार से सुखी हो और उन्हें किसी दुःख, किसी अभाव का मुख न देखना पड़े। उनकी बुद्धि, उनके विचार केवल इस जीवन तक ही सीमित हैं। न उन्हें परलोक का ज्ञान है और न ही उसकी चिंता। उन्हें तो केवल इस जीवन से काम है, इसी को ही वे महत्त्व देते हैं और इसमें अधिक से अधिक सुखभोगों की प्राप्ति के लिये ही उनके सब कर्म-धर्म होते हैं।
कुछ लोग जो ज़रा इनसे श्रेष्ठ विचारों के हैं और जो परलोक के विषय में सोचते और उसे संवारने के लिये शुभकर्म करते हैं, उनकी दौड़ भी अधिक से अधिक स्वर्ग तक होती है। स्वर्ग की प्राप्ति को ही वे अपना चरम लक्ष्य और स्वर्गीय सुखों की प्राप्ति को ही वे लोग जीवन का परमलाभ समझते हैं। उन्होंने प्रायः यही पढ़ा-सुना होता है कि मरणोपरान्त जीव को अपने कर्मानुसार स्वर्ग अथवा नरक की प्राप्ति होती है। शुभकर्म करके जीव स्वर्ग में जाता है जहां सब प्रकार के सुखभोग उपलब्ध हैं और जीव आनन्दपूर्वक अपना पारलौकिक जीवन व्यतीत करता है जबकि अशुभ अथवा पापकर्मों के फलस्वरुप नरक की प्राप्ति होती है जहां जीवात्मा को अनेक प्रकार के कष्ट एवं यातनायें भोगनी पड़ती हैं। इसलिये स्वर्गीय सुखों के लोभ और नारकीय यातनाओं के भय से ही वे सब शुभकर्म करते हैं। उनकी दृष्टि में शुभकर्मों का अधिक से अधिक लाभ स्वर्गीय सुखों की प्राप्ति ही है।
ऐसा क्यों है? इसका एक कारण तो यह है कि उन्हें अब तक सन्तों सत्पुरुषों की शुभ संगति प्राप्त नहीं हुई जिस कारण वे अब तक न केवल मनुष्य जन्म के वास्तविक मूल्य से अनभिज्ञ हैं प्रत्युत अपने उद्देश्य से भी अचेत हैं। उन्हें इस बात का ज्ञान ही नहीं कि मनुष्य-तन इतना अधिक मूल्यवान है कि इसके द्वारा स्वर्ग से भी अधिक उच्चतम लोक अर्थात मालिक के धाम की प्राप्ति की जा सकती है।
दूसरा कारण जिसलिये आम संसारी मनुष्य स्वर्ग की आकांक्षा करते हैं, यह है कि उनको स्वर्ग के विषय में बहुत कम जानकारी है। यदि उनको स्वर्ग के वास्तविक स्वरुप का ज्ञान हो जाये और उनके सम्मुख स्वर्ग का वास्तविक चित्र खींचा जाये तो हमारे विचार में वह स्वर्ग की कामना कदापि न करेंगे। स्वर्ग-प्राप्ति की इच्छा मनुष्य के मन में इसीलिये रहती है कि उसे स्वर्ग के विषय में सही जानकारी नहीं है। इसी विषय को उजागर करने के लिये और स्वर्ग के गुण-दोषों के विचारार्थ हम यहां मुद्गल ऋषि की कथा दे रहे हैं जिन्होंने स्वर्गीय सुखों की प्राप्ति होने पर भी स्वर्ग जाने से इनकार कर दिया।
प्राचीन समय की बात है कि कुरुक्षेत्र में मुद्गल नामक एक ऋषि रहते थे। वे बड़े धर्मात्मा, जितेन्द्रिय, सत्यभाषी और तपस्वी थे। वे किसी की निन्दा नहीं करते थे और न ही उनके ह्मदय में किसी के प्रति ईष्र्या-द्वेष था। वे भिक्षा न मांग कर शिल एवं उञ्छवृत्ति से ही अपना जीवन-निर्वाह करते थे। किसान खेत काट कर जब अन्न घर ले जाये, तब खेत में पड़ी हुई अन्न की बालियों को बीन कर जीवन-निर्वाह करना शिल कहलाता है। इसी प्रकार बाज़ार उठ जाने पर अथवा खेत कट जाने पर वहां बिखरे हुये अन्न के दाने बीन कर जीवन-निर्वाह करना उञ्छ कहलाता है। वे निरन्तर पन्द्रह दिनों तक एक-एक दाना बीनकर अन्न का संग्रह करते और उससे यज्ञ का अनुष्ठान करते, तत्पश्चात् भोजन करते। इस प्रकार पन्द्रह दिनों के पश्चात् उन्हें भोजन प्राप्त होता। इतने पर भी यदि उस समय उनके द्वार पर कोई अतिथि आ जाता, तो वे प्रसन्नतापूर्वक उसका स्वागत करते और उसे भोजन करवाते। कभी-कभी अधिक अतिथियों के आ जाने पर उन्हें भूखा ही रहना पड़ता, किन्तु वे धैर्यपूर्वक अपना व्रत पालन करते। इस प्रकार कठिन तपश्चर्या में रत मुद्गल ऋषि की महिमा चारों ओर फैलने लगी। कुटिया पर साधु-सन्तों का अतिथिरुप में आगमन होने से मुद्गल ऋषि को उन्हें भोजन करवाने का पुण्य लाभ तो प्राप्त होता ही, भगवच्चर्चा एवं सम्भाषण का भी सुअवसर प्राप्त होता।
ऋषि मुद्गल का नाम अन्ततः महर्षि दुर्वासा जी के कानों तक भी जा पहुँचा। उनकी ख्याति सुनकर उनकी परीक्षा हेतु वे मुद्गल ऋषि की कुटिया पर आ पहुँचे और भोजन की इच्छा प्रकट की। मुद्गल ऋषि ने उनका यथोचित आदर-सत्कार कर उनको भोजन अर्पित किया। महर्षि दुर्वासा जब परोसा हुआ सभी भोजन खा गये तब मुद्गल ऋषि ने उन्हें और भोजन दिया। धीरे-धीरे वे सारा भोजन उदरस्थ कर गये, यहां तक कि बची-खुची जूठन भी उन्होंने अपने अंगों पर मल ली। इस प्रकार सारा भोजन समाप्त कर महर्षि दुर्वासा वहां से चलते बने। मुद्गल ऋषि को उस दिन रत्ती भर भोजन भी प्राप्त न हुआ।
मुद्गल ऋषि भूखे रहकर धैर्य और शान्तिपूर्वक पन्द्रह दिन तक खेतों पर जाकर अन्न के दाने बीनते रहे। पन्द्रह दिन बीतने पर महर्षि दुर्वासा फिर उनके द्वार पर आ धमके और पूर्व की भांति सभी अन्न उदरस्थ कर गये। मुद्गल ऋषि को फिर निराहार रहना पड़ा और निराहार रहकर उन्होंने फिर दाने बीनने प्रारम्भ कर दिये। महर्षि दुर्वासा ने यह निश्चय करके कि मुद्गल ऋषि को धैर्यच्युत करके इनका व्रत भंग करना है, लगातार छःबार अपनी क्रिया दोेहराई अर्थात् नब्बे दिन तक मुद्गल ऋषि को अन्न का एक दाना भी ग्रहण न करने दिया। मुद्गल ऋषि का शरीर इन नब्बे दिनों में अन्न के बिना अत्यन्त दुर्बल हो गया था, उनके अंग-प्रत्यंग शिथिल पड़ गये थे, उनमें चलने-फिरने की भी शक्ति न रही, तथापि उन्होंने न तो अपना धैर्य ही छोड़ा और न ही उनके मन में केई विकार ही उत्पन्न हुआ। छठी बार भी जब उन्होंने उसी प्रकार शुद्ध ह्मदय से महर्षि दुर्वासा जी का आदर-सत्कार किया, तब महर्षि दुर्वासा जी प्रसन्न होकर बोले-ऋषे! भोजन से ही शरीर की रक्षा होती है। कुछ ही दिन भूखे रहने से मनुष्य का धैर्य छूट जाता है और धर्म, ज्ञान, कत्र्तव्य आदि सब कुछ भूल जाता है। किन्तु नब्बे दिन तक भूखे रहने के उपरान्त भी आप व्रत-पालन में तत्पर रहे; आपने अपना धैर्य नहीं छोड़ा। हे उत्तम व्रत का पालन करने वाले महर्षे! आप में अतिथि सत्कार, इन्द्रियसंयम, धैर्य, शम, दम आदि सभी सद्गुण विद्यमान हैं। आप सदेह स्वर्गलोक को जायेंगे। महर्षि दुर्वासा अभी ये शब्द कह ही रहे थे कि एक देवदूत अति सुसज्जित विमान लेकर मुद्गल ऋषि की कुटिया के सम्मुख आन पहुंचा। देवदूत ने अत्यन्त आदरपूर्वक मुद्गल ऋषि जी को प्रणाम करते हुये निवेदन किया-महर्षे! आप अपने शुभकर्मों के फलस्वरुप स्वर्ग जाने के अधिकारी हुये हैं। पुण्य आत्माओं को ही स्वर्गलोक की प्राप्ति होती है। मैं यह विमान लेकर
आपको लेने के लिये ही आया हूँ, इस पर विराजिये।
देवदूत के ये शब्द सुनकर मुद्गल ऋषि ने उससे कहा, हे देवदूत! स्वर्ग जाने से पहले मैं तुमसे कुछ पूछना चाहता हूँ। पहले मुझे यह बताओ कि स्वर्ग में कौन-कौन से गुण हैं और कौन-कौन से दोष? स्वर्गवासी कैसे विचार रखते हैं, कैसे विचरण करते हैं, कौन-कौन से कर्म करते हैं और क्या सुख भोगते हैं और क्या ये सुख अक्षय हैं?
इसके उत्तर में देवदूत ने जो कुछ कहा, वह पाठकों के ध्यान पूर्वक पढ़ने और मनन करने का विषय है। देवदूत बोला-मुने! जो लोग सत्कर्म करते हैं, केवल उन्हें ही स्वर्ग की प्राप्ति होती है। उन्हें देवदूत सम्मानपूर्वक अत्यन्त सुन्दर विमान में बिठलाकर स्वर्गलोक ले जाते हैं। वहां तक जाने का मार्ग भी अत्यन्त सुन्दर एवं मनमोहक है और मनुष्य को स्वर्गलोक तक अत्यन्त सुखपूर्वक ले जाया जाता है। स्वर्ग में सभी प्रकार के ऐश्वर्यभोग उपलब्ध हैं। वहां अति सुन्दर रत्नमंडित भवन हैं जो हर प्रकार की सुख-सुविधाओं से सुसज्जित हैं। प्रत्येक स्वर्गवासी के पास विचरण करने के लिये अपना-अपना विमान होता है। वहंा चारों ओर मनोहर उद्यान हैं जिसमें नाना प्रकार के पुष्प विकसित हैं जो अपनी मनोरम और भीनी-भीनी सुगन्ध से मनुष्य का चित्त हर लेते हैं। ये दिव्य पुष्प हैं जो कुम्हलाते नहीं। स्वर्ग के निवासी इनकी मालायें धारण किये रहते हैं। उद्यानों में फलों से लदे हुये अनेक वृक्ष हैं। ये फल सुमधुर और सरस होते हैं। इन वृक्षों पर भांति-भांति के सुन्दर पक्षी चहचहाते रहते हैं। स्थान-स्थान पर निर्मल और शुद्ध जल से पूर्ण सुन्दर सरोवर हैं। वहां चारों ओर मन को हरने वाली संगीत-लहरी गूँजती रहती है जो कानों को अतिप्रिय लगती है। स्वर्गवासी सुन्दर वस्त्रों और आभूषणों से सुसज्जित रहते हैं। ये वस्त्र कभी मलीन नहीं होते। स्वर्गवासी न कभी रोगी होते हैं, न उन्हें कभी बुढ़ापा सताता है। इस प्रकार वहां वे हर प्रकार के ऐश्वर्य भोग भोगते हुये आराम से रहते हैैं। हे श्रेष्ठ पुरुष! आप अपने शुभकर्मों के प्रभाव से यह स्वर्गीय सुख-सम्पत्ति प्राप्त कर लेने के अधिकारी हुये हैं, अतएव शीघ्र चलकर अपने पुष्यकर्मों द्वारा प्राप्त हुये इस स्वर्गीय वैभव का उपभोग कीजिये।
देवदूत के इतना कहने पर मुद्गल ऋषि ने कहा-हे देवदूत! आपने स्वर्ग के उज्जवल एवं गुणयुक्त पक्ष का जो सुन्दर विवरण प्रस्तुत किया है, उसने मुझे बहुत ही प्रभावित किया है। अब आप केवल इतना और बताने का कष्ट करें कि क्या स्वर्ग दोषों से सर्वथा रहित है? आपके उत्तर के पश्चात ही मैं कुछ निर्णय करुंगा।
ऋषि के मुख से ये वचन सुनकर देवदूत ने कहा-ऋषे! स्वर्ग दोषों से रहित नहीं है। उसमें अनेक दोष हैं। अब मैं आपको उनके विषय में बतलाता हूँ। हे मुने! स्वर्ग में अनेक लोक हैं। वहां पर जो लोग नीचे के स्थानों में स्थित हैं, उन्हें अपने से ऊपर के लोकों के उत्तम सुखभोग देखकर असन्तोष और सन्ताप होता है, अतएव उनके ह्मदय में उच्चलोक वासियों के प्रति स्वाभाविक ही ईष्र्या-द्वेष होता है। इसी प्रकार उच्च लोकों के वासी नीचे के लोकों के वासियों को घृणा की दृष्टि से देखते हैं। इसके अतिरिक्त जो सबसे बड़ा दोष स्वर्ग में मुझे जान पड़ता है वह यह है कि अपने सत्कर्मों का फल ही वहां भोगा जाता है; वहां कोई नवीन कर्म नहीं किया जाता। इस प्रकार स्वर्ग कर्म भूमि नहीं, भोगभूमि ही है। चूंकि वहां कोई नया कर्म नहीं किया जाता, इसलिये धीरे-धीरे जीव के पुण्य कर्म क्षीण होते जाते हैं और कर्मों का भोग समाप्त होने पर एक दिन जीव का स्वर्ग से पतन हो जाता है। पतन होने से पूर्व उनके गले में पड़ी कुसमों की मालायें कुम्हला जाती हैं, जिससे उनको अपने पतन की पूर्व सूचना मिल जाती है। उस समय एकाएक सुखभोग छिन जाने के विचार से ही उनका मन दुःख एवं विषाद से भर जाता है। उस समय उनकी जो दशा होती है, उसका वर्णन करना अत्यन्त कठिन है। पुण्यकर्मों के क्षीण हो जाने के कारण जीव को फिर से चौरासी के चक्र में भटकना पड़ता है। हे ऋषे! ब्राहृा जी के लोक तक जितने भी लोक हैं, उन सबमें ये दोष पाये जाते हैं। यह सुनकर मुद्गल ऋषि बोले- हे देवदूत! यदि कोई लोक इन दोषों से सर्वथा रहित हो तो मुझसे उसके विषय में कुछ कहिये।
तब देवदूतने कहा-ब्राहृा जी के लोक से भी ऊपर परब्राहृ परमात्मा का धाम है। वह शुद्ध ज्योतिर्मय लोक है। वहां जाकर जीव को शाश्वत और अक्षय सुख-आनन्द की प्राप्ति होती है। उस लोक की प्राप्ति हो जाने पर जीव के पुण्य क्षीण नहीं होते और न ही उसका वहां से पतन होता है। वह अविचल पद है, परन्तु वहां केवल वे जन ही जा सकते हैं जो मोह,ममता अहंकार आदि को त्यागकर और सुख-दुःख आदि द्वन्द्वों से ऊपर उठकर हर समय निष्काम भाव से मालिक के सुमिरण-ध्यान में लीन रहते हैं।
देवदूत के चुप होने पर मुद्गल ऋषि ने विचार किया कि मनुष्य पुण्यकर्म इसीलिये करता है कि उसे अक्षय सुख और शाश्वत आनन्द की प्राप्ति हो। उसे वह अविचल पदवी प्राप्त हो जिससे उसका पतन न हो और उसे पुनः चौरासी लाख योनियों का चक्र न काटना पड़े। मनुष्य को पुण्यकर्मों के फलस्वरुप यदि स्वर्गीय सुखों की प्राप्ति हो भी जाये तो उससे उसे क्या लाभ? पुण्य क्षीण हो जाने पर तो उसे फिर से चौरासी के चक्र में जाना ही पड़ेगा। अल्प समय के स्वर्गीय सुखों के पश्चात उसे फिर से नीच योनियों के दारुण कष्ट भोगने पड़ेंगे। इसलिये अपने पुण्यकर्मों के फलस्वरुप स्वर्गीय सुखों की कामना करना तो अज्ञानता ही है और अपने हाथों अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारना है। देवदूत के अनुसार स्वर्ग में केवल मनुष्य जन्म में किये हुये पुण्यकर्मों का फल ही भोगा जाता है, वहां कोई नवीन कर्म नहीं किया जाता, तब फिर कर्मयोनि तो केवल मनुष्य योनि ही है। इस दृष्टि से तो मनुष्य देवताओं से भी अधिक श्रेष्ठ है, क्योंकि वह इसमें पुण्यकर्मों के द्वारा परमलाभ अर्थात् मालिक की प्राप्ति कर सकता है, तब फिर स्वर्ग की कामना करना तो हीरा त्याग कर कांच की कामना करना ही है। यह विचार कर उन्होने देवदूत से कहा-ः
देवदूत नमस्ते ऽ स्तु गच्छ तात यथासुखम्।
महारोषेण मे कार्यं न स्वर्गेण सुखेन वा।।
पतनान्ते महद् दुःखं परितापः सुदारुणः।
स्वर्गभाजश्चरन्तीह तस्मात् स्वर्गं न कामये।।
यत्र गत्वा न शोचन्ति न व्यथन्ति चलन्ति वा।
तदहं स्थानमत्यन्तं मार्गयिष्यामि केवलम्।।
(महाभारत,वनपर्व)
अर्थः-देवदूत! तुम्हें नमस्कार है। तात! तुम सुखपूर्वक पधारो। स्वर्ग अथवा वहां का सुख महान दोष से युक्त है, इसलिये मुझे उसकी आवश्यकता नहीं है। ओह! पतन के पश्चात् स्वर्गवासी जीवों को महान दुःख एवं अनुताप होता है और वे पुनः इसी लोक में विचरते हैं, इसलिये मुझे स्वर्ग में जाने की तनिक भी इच्छा नहीं है। जहां जाकर मनुष्य कभी शोक नहीं करते, व्यथित नहीं होते तथा जहां से विचलित नहीं होते, केवल उसी अक्षयधाम की प्राप्ति का मैं यत्न करुँगा। इस प्रकार मुद्गल ऋषि ने जाने से इनकार कर दिया। तत्पश्चात् उन्होंने अपनी सम्पूर्ण चित्तवृत्तियों को एकाग्र करके मालिक के सुमिरण-ध्यान में लगा दिया और अन्त में मालिक के अक्षयधाम में स्थान प्राप्त करके शाश्वत सुख-आनन्द की प्राप्ति की और अपने मनुष्य जन्म को सार्थक किया।
हमारा भी कत्र्तव्य है कि सत्पुरुषों की शुभ संगति ग्रहण करके और उनसे मालिक के सच्चे नाम की दीक्षा लेकर उसकी कमाई करें और स्वर्गीय सुखभोगों की कामना त्यागकर मालिक के धाम में अविचल स्थान प्राप्त करने का यत्न करके अपना जीवन सफल करे
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