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रविवार, 31 जुलाई 2016

भक्तिमती रबिया



     भक्तिमती रबिया का जन्म आज से लगभग बारह सौ वर्ष पूर्व तुर्किस्तान के बसरा नामक नगर में एक अत्यन्त निर्धन परिवार में हुआ था। रबिया की तीन बहनें और थीं। चारों बहनों में रबिया सबसे छोटी थी। रबिया अभी बच्ची ही थी कि उसकी माता का देहावसान हो गया। उसके पिता प्रातः होते ही काम पर निकल जाते और जब वापस आते तो चारों ओर अन्धकार फैल चुका होता। दिन भर के थके-मांदे तो होते ही, अतः खा-पी कर चारपाई पर ढेर हो जाते। उन्हें अपने कामकाज से इतना अवकाश ही कहां था कि वे बच्चों का ख्याल करते। फलस्वरुप रबिया का बचपन माता पिता के प्यार से वंचित ही रहा। माता पिता का प्यार न मिलने से रबिया सदा उदास रहती। उसके घर के निकट ही एक उच्चकोटि के सन्त रहते थे। लोगों की उनके प्रति अत्यन्त श्रद्धा थी, अतः काफी संख्या में लोग उनकी संगति का लाभ उठाने के लिये उनकी कुटिया पर आया करते थे। कभी कभी वहां सत्संग भी होता था। अपनी उदासी दूर करने के लिये रबिया भी कभी कभी वहां चली जाया करती थी। वहां जाने पर उसके मन को बड़ी शान्ति मिलती थी। ईश्वर की महिमा करते हुये वे सन्त प्रायः ये शब्द कहा करते थे कि ईश्वर अत्यन्त कृपालु हैं।
     एक दिन लोगों के चले जाने के बाद भी रबिया वहीं बैठी रही। उसकी आँखों से अश्रु बह रहे थे। सन्त जी ने उसे अपने निकट बुलाकर उससे रोने का कारण पूछा। रबिया ने कहा-आप तो सदा यही कहते हैं कि ईश्वर अत्यन्त कृपालु हैं, फिर वे मेरे ऊपर कृपा क्यों नहीं करते? सन्त जी रबिया के घर की परिस्थिति से भलीभाँति परिचित थे। उन्होने उसके सिर पर प्यार भरा हाथ फेरते हुए कहा-वे तुम्हारे ऊपर भी अवश्य कृपा करेंगे। जब वे सभी पर कृपा करते हैं, तो फिर तुम्हारे ऊपर कृपा क्यों नहीं करेंगे? किन्तु इसके लिये तुम्हे एक काम करना होगा। रबिया ने पूछा-मुझे क्या करना होगा? ईश्वर की कृपा प्राप्त करने के लिये मैं सब खुछ करने को तैयार हूँ।
     सन्त जी ने फरमाया-तुम हर समय उन्हें याद किया करो और ह्मदय में यह समझा करो कि ईश्वर के प्रत्येक कार्य में कृपा ही कृपा भरी हुई है। यदि तुम ऐसा समझोगी तो फिर तुम ईश्वर की कृपा प्राप्त करने में अवश्य ही सफल होगी। वे अपने भक्तों पर सदा ही कृपा करते हैं। उनके वचनों की गहनता तो वह बच्ची भला क्या समझती, परन्तु उन वचनों पर विश्वास कर रबिया हर समय ईश्वर को याद करने लगी। ज्यों-ज्यों दिन बीतते गये, उसकी सुरति संसार की कामनाओं से हटती गई और ईश्वर के सुमिरण भजन में अधिकाधिक लगती गई। ईश्वर के सुमिरण भजन से न केवल उसके व्याकुल मन को शान्ति ही मिलती, प्रत्युत उसे अपने अंदर एक अनोखेआनन्द का अनुभव होता।
     जब रबिया की आयु लगभग बारह वर्ष की हुई, उसके पिता का भी देहान्त हो गया। रबिया तथा उसकी बहनों के सम्मुख अब जीवन-निर्वाह का प्रश्न उठ खड़ा हुआ, अतः सभी कोई न कोई काम करने लगीं। रबिया भी एक धनवान के घर कामकाज करने लगी। वहां से जो कुछ मिलता, उससे निर्वाह करती और शेष समय ईश्वर की याद में बिताती। इसी प्रकार दिन बीतते गए और इसके साथ ही रबिया के सुमिरण ध्यान और ईश्वर प्रेम में भी दृढ़ता आती गई। एक बार देश में भयानक अकाल पड़ा और लोग दाने-दाने को तरसने लगे। अकाल के फलस्वरुप रबिया और उसकी बहनों की नौकरी भी छूट गई। जहां अपने ही भोजन के लाले पड़े हों, वहांं दूसरे को कोई नौकरी क्या दे? लोग घर बार छोड़कर दूसरी जगह भागने लगे। चारों बहनें भी अन्यत्र जाने का निश्चय कर घर से निकल पड़ीं। मार्ग में पता नहीं किस तरह रबिया अपनी बहनों से विलग हो गई। उसने उन्हें खोजने का बहुत प्रयत्न किया। वे तो नहीं मिलीं, उलटा रबिया एक दुष्ट व्यक्ति के चक्र में फँस गई। वह व्यक्ति उससे यह वादा कर कि वह उसकी बहनों को ढूँढने में सहायता देगा, रबिया को फुसला कर दूसरी जगह ले गया और उसे एक धनी के हाथ गुलाम की तरह बेच दिया। वह धनी व्यक्ति अत्यन्त क्रोधी और निष्ठुर स्वभाव का था, अतएव रबिया के दुःखों कष्टों में और भी अधिक वृद्धि हो गई। उसे और भी अधिक कष्टों का सामना करना पड़ा। वह व्यक्ति गालियां तो बकता ही था, साधारण सी बात पर लातें और घूँसे भी बरसाने लगता। उस घर में रबिया को रात दिन कोल्हू के बैल की तरह जुतना पड़ता। वह बेचारी अबला भला कर भी क्या सकती थी? सब कुछ सहन करती हुई ईश्वर को याद करती और उसकी कृपा की याचना करती रही।
     मालिक का अत्याचार दिन प्रतिदिन बढ़ता गया। रबिया उसके अत्याचार से तंग आकर उससे पिण्ड छुड़ाने के लिये युक्ति सोचने लगी। एक रात अवसर पाकर वह मालिक की हवेली से भाग निकली। किन्तु ईश्वर की तो मौज कुछ और ही थी! हुआ यह कि वह अभी कुछ ही दूर गई थी कि अन्धकार में भागते हुए उसे ठोकर लगी जिससे वह गिर पड़ी और उसके दाहिने हाथ में सख्त चोट लगी। रबिया दर्द से व्याकुल होकर वहीं बैठ गई और ईश्वर के चरणों में प्रार्थना करने लगी- हे प्रभो! क्या तुम मेरी सुधि नहीं लोगे? क्या तुम मुझ पर कृपा नहीं करोगे? क्या मेरा जीवन यूंही कष्टों में ही व्यतीत होगा?
     आग में तपाने पर ही सोने की सब खोट निकलती है और फिर वह कुन्दन बनकर  चमकता है। ठीक इसी प्रकार दुःखों-कष्टों की अग्नि में से निकलने के उपरान्त भक्तिमान् पुरुष भी विशुद्ध कंचन की तरह चमक उठता है। प्रार्थना करते हुये एकाएक रबिया के मन में विचार उठा-रबिया! क्या तुम्हें प्रभु की कृपा पर विश्वास नहीं? यदि नहीं, तो फिर क्यों उसके सामने आशा से दामन फैलाती है? और यदि तुम्हें उसकी कृपा पर पूर्ण विश्वास है और यह मानती है कि वह कृपालु हैं, तो फिर इन कष्टों से घबरा कर दुःखी क्यों होती है? क्या ये कष्ट भी उसी की दात नहीं हैं? यदि हैं तो फिर इनसे घबराना कैसा? प्रभु की दात समझ कर क्यों नहीं इन्हें सहर्ष स्वीकार करती? तू स्वार्थ से भरी है। तूने आज तक केवल दुःखों-कष्टों की निवृत्ति के लिये ही भगवान को स्मरण किया है, उसके प्यार के लिये कभी उसे स्मरण नहीं किया। रबिया! तू अत्यन्त स्वार्थी है।
     मन में ये विचार उठते ही वह अपने को इस बात के लिये धिक्कारने लगी कि वह सन्तों के इस कथन को क्यों भूल गई कि ""ईश्वर कृपालु हैं और अपने भक्तों पर सदा कृपा करते हैं। ईश्वर की प्रत्येक कार्यवाही में कृपा ही कृपा भरी हुई है।'' क्या यह ईश्वर की कृपा नहीं कि उन्होंने उसे संसार की विषय-विलासिता से निकालकर अपनी भक्ति में लगाया है। रबिया के विचारों में ईश्वर-कृपा से पूर्ण परिवर्तन हो गया। वह ईश्वर के चरणों में पुनः प्रार्थना करने लगी, परन्तु पहली प्रार्थनाओं और इस प्रार्थना में धरती-आकाश का अन्तर था। यह प्रार्थना कष्टों की निवृत्ति के लिये नहीं, अपितु ईश्वर की कृपाओं का गुणानुवाद गाने के लिये थी। वह प्रार्थना करने लगी-हे मेरे कृपालु प्रभो! मुझ पर यह तेरी महान कृपा है कि तुमने मुझे संसार की विषय-वासनाओं की ज्वाला से निकाल कर अपनी पावन भक्ति में लगाया। मेरा रोम-रोम तुम्हारा कृतज्ञ है।
     तभी उसके कानों में ये शब्द पड़े-रबिया! चिंता न कर। तेरे सब कष्ट शीघ्र ही दूर हो जायेंगे और तेरा यश चहुँ ओर फैल जायेगा। सब लोग तुझे आदर की दृष्टि से देखेंगे और तेरा सम्मान करेंगे। मैं तुम पर अति प्रसन्न हूँ। रबिया ने आँखें खोलकर चारों ओर दृष्टि दौड़ाई, परन्तु उसे आस पास कोई दिखाई न दिया। इन शब्दों को प्रभु की कृपा समझकर वह वापस लौट पड़ी। उसने सोचा कि जब प्रभु मुझ पर प्रसन्न हैं, तो फिर कष्टों को सहन करना कौन-सा कठिन कार्य है? मेरे लिये तो वे कष्ट भी प्रभु का प्रसाद होने के कारण फूलों के सदृश हैं। रबिया मालिक के घर वापस लौट आई। उसके जीवन में आमूल परिवर्तन हो चुका था। वह हित्तचित्त से मालिक के घर का काम करने लगी, परन्तु कामकाज करते हुये भी उसकी वृत्ति हर समय ईश्वर के सुमिरण-ध्यान में ही लगी रहती थी। उस दिन से उसके मालिक के व्यवहार में भी बहुत परिवर्तन हो गया। रबिया के मुख पर उसे एक अनोखा तेज़ दिखाई देता था, अतएव मारना तो दूर उसका रबिया को कुछ कहने का भी साहस न होता था। इसी प्रकार कुछ दिन बीत गये। एक रोज़ आधी रात के समय जबकि चारों ओर नीरवता छाई थी, रबिया अपनी कोठरी में घुटनों के बल बैठी हुई ईश्वर के चरणों में प्रार्थना कर रही थी। ईश्वर की प्रेरणा से उसी समय रबिया के मालिक की नींद टूटी और रबिया की प्रार्थना के शब्द उसके कानों में पड़े। वह तुरन्त चारपाई से उठ खड़ा हुआ। कमरे के बाहर आकर वह आवाज़ सुनने लगा। आवाज़ रबिया की कोठरी की ओर से आ रही थी। वह आहिस्ता-आहिस्ता कदम रखता हुआ वहां गया। कोठरी का द्वार खुला हुआ था। परदा हटाकर वह ज्यों ही कोठरी के अन्दर घुसने लगा कि अन्दर का दृश्य देखकर वहीं ठिठक गया। कोठरी एक अलौकिक प्रकाश से आलोकित थी और रबिया घुटनों के बल बैठी हाथ उठाये प्रार्थना कर रही थी। उसने रबिया के ये शब्द सुने-हे मेरे कृपालु प्रभो! मैं चाहती तो यह हूँ कि अपने जीवन का एक-एक पल तेरी याद में, तेरे सुमिरण-भजन में बिताऊँ, परन्तु क्या करूँ? जितना मैं चाहती हूँ उतना हो नहीं पाता, क्योंकि मैं किसी की गुलाम हूँ।अच्छा! जैसी तेरी मौज।
’""राजी हैं हम उसी में जिसमें तेरी रज़ा है।''
रबिया के मालिक को तो वैसे ही कई दिनों से उसके आचार-व्यवहार में परिवर्तन दिखाई दे रहा था, आज का दृश्य देखकर तो उसे पूरा विश्वास हो गया कि रबिया कोई साधारण स्त्री नहीं अपितु कोई परम पुनीत आत्मा है जिस पर ईश्वर की विशेष कृपा है। रबिया के मुखमंडल पर एक अनोखी आभा देखकर उसके ह्मदय में श्रद्धा भी उत्पन्न हुई और भय भी। वह मन ही मन विचार करने लगा कि ऐसी पवित्र आत्मा को दासता में रखकर मैने बड़ा भारी पाप किया है। चाहिये तो यह था कि मैं इसकी सेवा करता, उलटा मैं इससे सेवा कराता रहा। केवल सेवा ही नहीं कराई, इस पर अत्याचार भी किया, इसे मारा पीटा भी। वह पश्चात्ताप करता हुआ रोने लगा। उसकी आवाज़ सुनकर रबिया का ध्यान टूटा। तब वह अत्यन्त विनीत भाव से बोला-देवी! मेरे अपराधों को क्षमा कर। मैने अब तक तुम्हें पहचाना नहीं था। आज ईश्वर की कृपा से मैने तेरा वास्तविक रुप देख लिया। आज से तुम्हें मेरी सेवा नहीं करनी पड़ेगी। तुम सुखपूर्वक इस घर में रहकर ईश्वर की भक्ति करो। आज से मैं तुम्हारी सेवा करुँगा।
     रबिया ने कहा-आपने इतने दिनों तक मुझे अपने घर में रखकर खाने-पहनने को दिया, यह आपका मुझ पर उपकार है। एक उपकार आप मुझ पर और कर दें, मुझे दूसरी जगह जाने की स्वतंत्रता दे दें। ताकि मैं अपना सारा समय ईश्वर की याद में बिता सकूँ। मालिक ने कहा- जैसी तुम्हारी इच्छा हो वैसा करो। मेरी ओर से तुम पूरी तरह स्वतन्त्र हो। रबिया ने बसरा नगर से कुछ दूर एक एकान्त स्थान पर अपनी कुटिया बनाई और अपना शेष जीवन भगवान का सुमिरण भजन करते हुये व्यतीत किया। यहाँ हम उनके कुछ विचार और वचन दे रहे हैं जिससे कि उनके जीवन के विषय में पाठकों को और अधिक जानकारी हो कि उनका जीवन कितना उच्च और आदर्शमय था।
     एक बार रबिया उदास बैठी थी। उसी समय उनका एक श्रद्धालु उनके दर्शन के लिये आया। उन्हें उदास देखकर उसने पूछा-आज आप उदास क्यों हैं? रबिया ने उत्तर दिया-आज सवेरे मेरा पाजी मन ईश्वर का सुमिरण छोड़कर स्वर्ग की ओर चला गया था। मैं यही सोच कर उदास हूँ कि ईश्वर का सुमिरण-भजन छोड़कर मेरा मन स्वर्ग के सुखों की ओर क्यों गया?
     एक बार रबिया बहुत बीमार थी। सूफियान नाम का एक साधक उसकी बीमारी के विषय में सुनकर उससे मिलने गया। रबिया की हालत देखकर उसे बड़ा दुःख हुआ। उसने कुछ कहना चाहा, परन्तु कुछ सोचकर वह चुप हो गया। रबिया ने कहा-तुम कुछ कहते-कहते रुक क्यों गये? जो कुछ कहना चाहते हो निःसंकोच कहो। सूफियान ने कहा-देवी! आप ईश्वर से प्रार्थना क्यों नहीं करतीं? वे सर्वसमर्थ हैं; वे आपका रोग एक पल में मिटा सकते हैं। रबिया ने मुस्कराते हुए उत्तर दिया-सूफियान! क्या तुम इस बात से परिचित नहीं हो कि रोग किसकी इच्छा और संकेत से होता है? क्या इस रोग में भी मेरे ईश्वर का हाथ नहीं है? सूफि यान ने कहा-जो कुछ होता है उसकी इच्छा से ही होता है। उसकी इच्छा के बिना क्या होता है? रबिया बोली-जब सब कुछ उसकी इच्छा से ही होता है, तब तुम मुझसे यह कैसे आशा करते हो कि मैं उसकी इच्छा के विरुद्ध इस रोग से छुटकारा प्राप्त करने के लिये उससे प्रार्थना करूँ? ईश्वर का हर काम कृपा से भरा होता है, इसलिये उसकी इच्छा के विरुद्ध कार्य करना क्या प्रेमी-भक्त के लिये उचित है? प्रेमी को तो उसकी इच्छा के सम्मुख नतमस्तक हो जाना चाहिये। और उसकी हर मौज को (सुख मिले या दुःख) उसका प्रसाद समझ कर अपनी झोली में डालना चाहियेे।
     रबिया ने अपना सब कुछ ईश्वर को अर्पण कर दिया था। एक प्रभु के सिवा उसके पास ऐसी कोई वस्तु नहीं थी जिसे वह अपनी समझती हो। एक बार बसरा के प्रसिद्ध सन्त हसन बसरी ने उससे पूछा-आपने ऐसी ऊँची स्थिति किस प्रकार प्राप्त की? रबिया ने उत्तर दिया-सब कुछ खोकर ही मैंने उसे पाया है। बिना खोए उसे पाना असम्भव है। किसी विचारवान ने सच ही कहा है-
उसी के वास्ते जग को भुलाया है मैंने।
सब कुछ खो कर ही उसे पाया है मैंने।।
रबिया सबके साथ प्रेम का व्यवहार करती थी, चाहे वह कोई पुण्यात्मा हो अथवा पापी। सबके साथ उसका दया का बर्ताव रहता था। एक दिन एक व्यक्ति ने रबिया से पूछा-पाप रुपी राक्षस को तो आप अपना शत्रु ही समझती हैं न? उससे तो आप घृणा करती हैं न? रबिया ने उत्तर दिया-
करुँ मैं दुश्मनी किससे अगर दुश्मन भी हो अपना।
मुहब्बत ने नहीं दिल में जगह छोड़ी अदावत की।।
ईश्वर के प्रेम में छकी रहने के कारण ह्मदय में किसी के प्रति घृणा रही ही नहीं, फिर भला कोई मेरा शत्रु कैसे हो सकता है?
     एक बार जब कुछ श्रद्धालु रबिया के दर्शन के लिये गये, तो रबिया ने एक व्यक्ति से पूछा-भाई! तुम किस प्रयोजन से ईश्वर का सुमिरण-भजन करते हो? उस व्यक्ति ने उत्तर दिया-नरक की भयानक यातनाओं से बचने के लिये। तब रबिया ने एक अन्य व्यक्ति से पूछा-और तुम किसलिये ईश्वर को याद करते हो? उसने कहा-मैने सुना है कि स्वर्ग अत्यन्त ही रमणीय स्थान है, वहां भाँति-भाँति के भोग और असीम सुख हैं। उसी स्वर्ग को पाने के लिये ही मैं भगवान की भक्ति करता हूँ।
     रबिया ने कहा-बेसमझ लोग ही भय अथवा लोभ के कारण भगवान की भक्ति किया करते हैं। भक्ति न करने से तो यह अच्छा ही है, परन्तु मान लो कि स्वर्ग या नरक-दोनों का ही अस्तित्व न होता, तो क्या फिर तुम लोग भगवान की भक्ति न करते? सच्चा भक्त ईश्वर की भक्ति लोक-परलोक की किसी भी वस्तु की प्राप्ति के लिये नहीं करता, अपितु ईश्वर को पाने के लिये ही करता है।
     रबिया इसीलिये प्रभु से प्रार्थना करती थी-हे मेरे प्रभो! तू ही मेरा सब कुछ है। मैं तेरे अतिरिक्त और कुछ भी नहीं चाहती। हे प्रभो! यदि मैं नरक के भय से तेरी पूजा करती हूँ, तो मुझे नरकाग्नि में भस्म कर दे, यदि मैं स्वर्ग के लोभ से तेरी भक्ति करती हूं, तो स्वर्ग का द्वार सदा-सर्वदा के लिये मेरे लिये बन्द कर दे और यदि मैं तेरे लिये  तेरा सुमिरण भजन करती हूँ, तो फिर अपना  प्रकाशमय सुन्दर रुप दिखलाकर मुझे कृतार्थ कर।
     एक बार एक धनी मनुष्य ने रबिया को फटे-पुराने कपड़े पहने देखकर कहा-यदि आपका आदेश हो तो आपकी इस दरिद्रता को दूर करने के लिये कुछ धन आपकी सेवा में भेंट करना चाहता हूँ। रबिया ने उत्तर दिया-सांसारिक दरिद्रता के लिये किसी से कुछ भी लेने में मुझे बड़ी लज्जा आती है। जब यह सम्पूर्ण जगत मेरे प्रभु का ही राज्य है, तब उसे छोड़कर मैं अन्य किसी से क्यों लूँ? मुझे आवश्यकता होगी तो मैं उससे ही माँग लूँगी।
     रबिया कभी-कभी प्रेमावेश में बड़े ज़ोर से चिल्ला उठती। एक बार लोगों ने उससे पूछा-आपको कोई रोग अथवा दुःख तो है नहीं, फिर आप किसलिये चिल्ला उठती हैं? रबिया ने उत्तर दिया-मुझे कोई बाहरी अथवा शारीरिक बीमारी नहीं है, जिसको संसार के लोग समझ सकें। मुझेे तो अन्तर का रोग है, जो किसी भी वैद्य अथवा हकीम के वश का नहीं है। मेरा यह रोग तो उसके दर्शन से ही जा सकता है।
     सच है-जिसे अन्तर का रोग हो, जिसके ह्मदय में प्रभु प्रेम की कसक हो, उसके रोग को भला वैद्य क्योंकर समझ सकता है? गुरुवाणी का वाक हैः-
बैदु बुलाइआ बैदगी पकड़ि  ढंढोले बांह।
भोला बैदु न जाणई करक कलेजे माहिं।।
अर्थः-वैद्य को उपचार के लिये बुलाया गया, तो वह बाँह पकड़ कर नब्ज़ देखता है। किन्तु भोला वैद्य क्या जाने कि यह रोग ह्मदय का है, कलेजे में कसक उठती है।
     एक बार पूर्णिमा की रात्रि को, जबकि चन्द्रमा की ज्योत्स्ना से सारा वातावरण आलोकित था, रबिया अपनी कुटिया के अन्दर बैठी किसी दूसरी ही सृष्टि की ज्योत्स्ना का आनन्द लूट रही थी। तभी एक परिचित स्त्री ने आकर ध्यानमग्न रबिया को झिंझोड़ते हुये कहा-रबिया! बाहर चलकर देख, कैसी सुन्दर रात है। रबिया ने उत्तर दिया-तुम एक बार मेरे ह्मदय के अन्दर झाँक कर देखो, संसार के परे की कैसी अनोखी सुन्दरता है।
     ऐसा था भक्तिमति रबिया का जीवन। हमें भी चाहिये कि उसके जीवन से प्रेरणा लें और अपना पल-पल प्रभु के सुमिरण-भजन में लगाते हुये अपना जीवन सकारथ करें।

भक्त शंकर पण्डित


भक्त शंकर पण्डित अत्यन्त भक्तिभावसम्पन्न ब्रााहृण थे। गोस्वामी तुलसीदास जी ने जिन सद्गुणों का वर्णन किया है वे सभी उनमें विद्यमान थे, तथापि यहाँ हम उस गुण का वर्णन करना चाहेंगे जिसको अपनाना जीवन में सबसे कठिन होता है और वह है-"रिपु सों बैर बिहाउ' अर्थात् शत्रु के साथ भी वैर-विरोध न करना। परन्तु शंकर पण्डित में यह गुण भी कूट-कूट कर भरा हुआ था जैसा कि उनके जीवन-चरित्र से प्रकट होता है।
     भक्त शंकरपण्डित गण्डकी नदी के तट पर स्थित एक गाँव में रहते थे। वे सुबह मुंह-अन्धेरे ही उठकर नदी-तट पर चले जाते और स्नानादि से निवृत्त होकर गाँव के बाहर स्थित मन्दिर में जाकर भगवान की पूजा तथा स्मरण-ध्यान करते। भगवान का यह भजन-पूजन लगभग नौ बजे तक चलता। तत्पश्चात् वे घर आकर भोजन करते और फिर गाँव की संस्कृत पाठशाला में बच्चों को पढ़ाने पहुँच जाते। उस गाँव के ज़मींदार ठाकुर जगपाल बड़े ही धार्मिक विचारों के थे और इस पाठशाला की स्थापना उन्होंने ही की थी, जहाँ विद्यार्थियों को मुफ्त शिक्षा के साथ-साथ दोपहर का भोजन भी मिलता था। गाँव की पाठशाला थी, इसलिए थोड़े से ही विद्यार्थी थे। भक्त शंकर पण्डित को वेतन ठाकुर जगपाल की ओर से ही मिलता था। वेतन यद्यपि बहुत अधिक नहीं था, परन्तु शंकर पण्डित की तरह चूंकि उनकी धर्मपत्नी भी भक्तिभावसम्पन्न  एवं सन्तोषी थी, इसलिए जीवन-निर्वाह सुगमता से हो जाता था।
     ठाकुर जगपाल को एक रात्रि स्वप्न में अज्ञात निर्देश हुआ कि अमुक स्थान पर पन्द्रह लाख स्वर्ण-मुद्राएं गड़ी पड़ी हैं, वह निकलवा लो। ठाकुर जगपाल ने उस जगह खुदाई करवाई तो सचमुच ही उसे पन्द्रह लाख स्वर्ण मुद्राएँ प्राप्त हुर्इं। उसने निश्चय किया कि इनमें से दस लाख स्वर्ण मुद्रायें खर्च करके भगवान का एक भव्य मन्दिर बनवाऊँगा और शेष पाँच लाख मुद्रायें अपने चारों पुत्रों को दे दूँगा। उसने अपना यह निश्चय अपने चारों लड़कों को बतलाते हुए कहा कि यह मन्दिर शंकर पंडित की देख-रेख में बनेगा, क्योंकि वे भगवान के सच्चे भक्त हैं और कर्तव्य-परायण, सन्तोषी, निर्लोभी तथा ईमानदार हैं। मैने इस विषय में उनसे परामर्श कर लिया है।
    परन्तु भगवान को कुछ और ही अभीष्ट था। मन्दिर का निर्माण प्रारम्भ करवाने से पूर्व ही ठाकुर जगपाल का देहान्त हो गया और उसके स्थान पर उसका बड़ा लड़का कुशलपाल ठाकुर बना। वह स्वभाव से बड़ा दुराचारी, विलासी और अधार्मिक था। शंकर पंडित से तो उसे बहुत ही चिढ़ थी। जब ठाकुर जगपाल बड़े आदर और विनम्रता से झुककर उन्हें प्रणाम करता था, तो यह देखकर कुशलपाल को आग लग जाती थी कि एक निर्धन ब्रााहृण के आगे उसका पिता इतना झुक रहा है। ठाकुर बनने के बाद उसने एक-दो बार पाठशाला बन्द कर देने का विचार किया, परन्तु कुछ तो लोक-लाज के कारण तथा कुछ माता के भय से पिता द्वारा स्थापित पाठशाला बन्द करने की उसकी हिम्मत न हुई। यद्यपि ठाकुर जगपाल की पत्नी और तीनों छोटे लड़के शंकर पंडित का बड़ा आदर करते थे, परन्तु कुशलपाल जब भी उन्हें देखता उसकी भृकुटि चढ़ जाती, अतएव शंकर पंडित ने ठाकुर की हवेली में जाना छोड़ दिया। वैसे भी उनकी संसार के प्रति कोई रुचि नहीं थी, वे तो भगवान के भजन-पूजन में ही आनन्द मानते थे और इसी को जीवन का सच्चा लाभ समझते थे। अब उन्होंने यह नियम बना लिया कि पाठशाला से छुट्टी मिलते ही वे सीधे घर चले जाते और थोड़ा-सा भोजन करके फिर गाँव के बाहर स्थित मन्दिर में जाकर भजन-पूजन में लीन हो जाते और सूर्यास्त के बाद ही घर वापस आते।
      कुछ दिन के पश्चात् कुशलपाल की माता का भी देहान्त हो गया। अब तो कुशलपाल पूर्णतः निरंकुश 
हो गया। अब तो रात-दिन हवेली में महफिलें जमने लगीं और वह विलासिता में गहरा डूबता चला गया और पानी की तरह पैसा बहाने लगा। कुछ ही दिनों में उसने पिता से प्राप्त अपने हिस्से का सारा धन फूँक डाला। तब उसकी नज़र पन्द्रह लाख स्वर्ण मुद्राओं के भण्डार पर गई और उसने उस धन को हड़पने का विचार किया। अपने भाइयों को वह अच्छी तरह जानता था और उसे मालूम था कि वे उसका विरोध करेंगे, अतएव कुशलपाल ने एक जाली दस्तावेज़ तैयार किया और उस पर अपने पिता के हस्ताक्षर की हूबहू नकल कर दी। उस दस्तावेज़ में यह लिखा हुआ था कि उन पन्द्रह लाख स्वर्ण मुद्राओं में से एक-एक लाख मुद्रा तीनों छोटे लड़कों को दे दी जाए और बाकी सब अर्थात् बाहर लाख मुद्राएं बड़े लड़के कुशलपाल को मिलें। वह जिस प्रकार चाहे इनको उपयोग में लाये। दस्तावेज़ तैयार हो जाने पर उसने अपने भाइयों को बुलाया और दस्तावेज़ दिखाते हुए बोला- पिता जी का विचार यद्यपि पहले मन्दिर बनवाने का था, परन्तु मरते समय उनका यह विचार बदल गया था और तभी यह दस्तावेज़ लिखा गया था।
     यह कहकर उसने भाइयों की ओर देखा जिनके चेहरे से अविश्वास स्पष्ट झलक रहा था। यह देखकर कुशलपाल घबरा गया और घबराहट में प्रभु-प्रेरणा से उसके मुख से निकल गया कि यह हस्ताक्षर पिता जी ने शंकर पण्डित की उपस्थिति में किये थे। तीनों भाई कुशलपाल के स्वभाव से भी और शंकर पंडित के स्वभाव से भी भलीभाँति परिचित थे। शंकर पंडित पर उनकी श्रद्धा भी थी। जब कुशलपाल ने ये शब्द कहे कि यह हस्ताक्षर पिता जी ने शंकर पंडित की उपस्थिति में किये हैं, तो वे बोले-यदि पंडित जी कह देंगे कि पिता जी ने उनके सामने इस पर हस्ताक्षर किये हैं, तो हम लोग इस दस्तावेज़ को मान लेंगे। यह कहकर तीनों भाई वहाँ से चले गये। कुशलपाल ने उनके सम्मुख कह तो दिया कि यह हस्ताक्षर पिता जी ने शंकर पंडित की उपस्थिति में किये थे, परन्तु अब उसको यह सोचकर भय लगने लगा कि शंकर पंडित ने यदि यह बात न मानी तो क्या होगा? परन्तु फिर उसने सोचा-""मानेगा कैसे नहीं। मुझे मिलने वाले धन में से मैं आधा उसको दे दूँगा। धन तो बड़ों-बड़ों को झुका देता है, फिर वह तो कंगाल है। इतना धन देखकर तो वह कुछ भी कहने को तैयार हो जायेगा।'' परन्तु थोड़ी देर बाद ही उसके मन में पुनः यह विचार उठ खड़ा हुआ-""इस क्षेत्र के सभी लोगों का यह कहना है कि वह बड़ा निर्लोभी, ईमानदार और सत्यवादी है। यदि वह प्रलोभन में न आया और उसने मेरी बात मानने से इनकार कर दिया तो?''
     ""तो फिर मैं उसे जीवित नहीं छोड़ूँगा।'' यह सोचकर उसका मुख कठोर हो गया।
दूसरे दिन कुशलपाल उस समय भक्त शंकर पंडित के घर जा पहुँचा, जब वे भोजन करके पाठशाला जाने के लिये तैयार थे। कुशलपाल ने अत्यन्त श्रद्धापूर्वक उन्हें प्रणाम किया। यह देखकर शंकर पंडित को बड़ा आश्चर्य हुआ। उन्होंने कुशलपाल को एक चारपाई पर बैठने के लिए कहा, तत्पश्चात् पूछा-ठाकुर साहिब! सब कुशलमंगल है?
     कुशलपाल ने उत्तर दिया-जी हाँ! सब कुशल है। मैं आपके पास एक खास काम से आया हूँ। तत्पश्चात् उसने दस्तावेज़ के विषय में सारी बात बतलाकर दस्तावेज़ उनके हाथों में थमा दिया। शंकर पंडित ने ध्यानपूर्वक दस्तावेज़ पढ़ा और बड़े ही ध्यान से हस्ताक्षर देखे, फिर बोले-ठाकुर जगपाल जी के हस्ताक्षरों जैसे हस्ताक्षर बनाने की पूरी कोशिश की गई है, परन्तु ये हस्ताक्षर उनके कदापि नहीं है। मैं उनकी लिखावट अच्छी तरह पहचानता हूँ। यह दस्तावेज़ जाली है।
     कुशलपाल ने कहा-पंडित जी! यह आप कैसी बातें कर रहे हैं? दस्तावेज़ मेरे पक्ष में है, यदि आपकी दृष्टि में यह जाली है तो इसका अर्थ यह हुआ कि मैने जानबूझ कर यह जाली दस्तावेज़ तैयार करवाया है। शंकर पंडित बोले-ठाकुर साहिब! दस्तावेज़ किसी ने भी तैयार किया हो, परन्तु यह बात मैं निश्चित रुप से कह सकता हूँ कि हस्ताक्षर जाली है। यह सुनकर कुशलपाल का चेहरा उतर गया। शंकर पंडित ने उसे समझाते हुए कहा-ठाकुर साहिब! पाप से प्राप्त धन अनर्थ का मूल है। इससे मनुष्य में काम,क्रोध, लोभ, मोह तथा अहंकार तो ज़ोर पकड़ ही जाते हैं, असत्य भाषण, हिंसा, वैर, लम्पटता, इन्द्रिय-लोलुपता, जुआ खेलना तथा मदिरा-पान आदि अनेकों दुर्गुण भी मनुष्य के अन्दर प्रविष्ट हो जाते हैं और मनुष्य पूरी तरह अधर्म में प्रवृत्त हो जाता है जिससे जीवन में उसे कभी सुख-शान्ति प्राप्त नहीं होती। इन पाप कर्मों के फलस्वरुप वह संसार में अपयश का भागी तो बनता ही है, परलोक में भी नरकों की यातनाएँ झेलता है। इसलिए आप इस पाप से बचिये और पिता जी की इच्छा को पूरा कीजिए ताकि संसार में आपका यश हो।
     कुशलपाल की बुद्धि तो लोभ ने हर ली थी, अतः उसे शंकर पंडित का यह उपदेश तनिक न भाया। तब उसने दूसरा पासा फेंका और कहने लगा-पंडित जी! मैं आपका बहुत आदर करता हूँ और आपको निर्धन देखकर मुझे बहुत कष्ट होता है। यदि आप केवल एक बार सबके सामने कह दें कि यह हस्ताक्षर पिता जी के हैं तो मैं अपने हिस्से में से आधा धन आपको दे दूँगा। तब आपको जीवन में कोई अभाव नहीं रहेगा और आप निश्चिन्त होकर भगवान की सेवा पूजा और भजन-ध्यान कर सकेंगे।
     भक्त शंकर पंडित बोले-ठाकुर साहिब! अब आप यहाँ से पधारने की कृपा करें। धन का लोभ देकर आप मुझसे झूठ बुलवाना चाहते हैं। ऐसा कदापि नहीं हो सकता। मैं निर्धन अवश्य हूं, परन्तु लोभी नहीं हूँ। मेरे भगवान पाप का धन खाने वाले का भजन-पूजन और सेवा स्वीकार नहीं करते, न ही पाप का यह धन बच्चों को खिलाकर मैं उन्हें अधर्मी एवं दुराचारी बनाना चाहता हूँ। मेहनत और ईमानदारी से कमाई हुई रुखी-सूखी खाकर ही हम प्रसन्न हैं। हमें पाप का धन नहीं चाहिए। अब आप जा सकते हैं। शंकर पंडित के ये वचन सुनकर कुशलपाल जल उठा और क्रोध पूर्वक बोला-कंगाल को इतना अभिमान? आपको पिता जी ने बहुत सिर चढ़ा रखा था, इसीलिए आपने ऐसी धृष्टता करने का साहस किया है। किन्तु याद रखियेगा, मेरा नाम कुशलपाल है। मेरे आदेश का पालन करने में ही आपकी कुशल है। मेरी अवज्ञा करके आप जीवित नहीं रह सकते। शंकर पंडित बोले-ठाकुर साहिब! मैं निर्धन अवश्य हूँ, परन्तु आपकी तरह धन के बदले धर्म का त्याग करने वाला नहीं हूँ। शेष रही आपकी धमकी की बात तो जीवित रखना और मारना भगवान के हाथ में है।
         जाको राखे साइयां मार सके न कोय।   बाल न बांका कर सके, जो जग बैरी होय।
भगवान की इच्छा के विरुद्ध आप मेरा कुछ भी अनिष्ट नहीं कर सकते। हाँ! यदि भगवान ने आपके हाथों ही मेरी मृत्यु लिखी है, तो फिर भगवान की इच्छा पूरी होनी ही चाहिए। परन्तु मैं अब भी आपको यही सत्परामर्श दूँगा कि आप इस पापमय विचार को अपने मन से निकाल दें। भगवान आपको सद्बुद्धि दें और आपका कल्याण करें। कुशलपाल क्रोध में बोला-आपके आशीर्वाद की मुझे आवश्यकता नहीं है। आप मेरे लिए नहीं, अपने लिये भगवान से प्रार्थना करें। यह कहकर वह पैर पटकता हुआ वहाँ से चला गया। उसने शंकर पंडित का वध करने का मन ही मन निश्चय कर लिया।
     पहले लिखा जा चुका है कि शंकर पंडित पाठशाला में छुट्टी होने पर सीधे घर आते थे और हल्का-सा भोजन करके गाँव के बाहर स्थित मन्दिर में चले जाते थे, जहां वे भगवान का भजन-पूजन तथा सुमिरण-ध्यान करते थे। सूर्यास्त होने के लगभग एक-डेढ़ घंटे बाद ही वे घर लौटते थे। मन्दिर और गाँव के बीच में बिल्कुल सुनसान जगह थी। सायंकाल होते ही कुशलपाल छिपते-छिपाते वहां जा पहुंचा और एक वृक्ष की आड़ में खड़ा हो गया। उसने हाथ में एक तेज़ धार वाला छुरा पकड़ रखा था। सूर्यास्त हुआ और धीरे-धीरे अन्धकार ने धरती पर अपना अधिकार जमा लिया। उस अन्धकार में भक्त शंकर पंडित भगवान्नाम का जाप करते हुये गाँव की ओर चले आ रहे थे। जैसे ही वे उस वृक्ष के निकट पहुँचे, कुशलपाल ने छुरे से उनकी छाती पर वार किया और वहाँ से भाग खड़ा हुआ। छुरा लगते ही शंकर पंडित बड़ा ज़ोर से चिल्लाये और फिर मूर्छित हो गये।
     शंकर पंडित ने मूÐच्छत होने पर एक अनोखा ही दृश्य देखा। क्या देखते हैं कि एक बड़ा ही सुन्दर स्थान है जहाँ भगवान हीरे-मोती जड़ित स्वर्ण सिंहासन पर विराजमान हैं और मन्द-मन्द मुसकराते हुए उसे आशीर्वाद प्रदान कर रहे हैं। कुछ देर तक तो वे भगवान के दर्शन करते रहे, फिर भगवान अलोप हो गये। भगवान के अलोप होते ही शंकर पंडित छटपटाने लगे और उनकी मूचर््छा टूट गई। होश आने पर उन्होंने देखा कि उनके हाथ पर छुरे का जख्म है। हुआ वास्तव में यह कि कुशलपाल ने तो अपनी तरफ से छुरा शंकर पंडित की छाती में भोंका था, परन्तु जैसे ही उसने छुरे का वार करने के लिए हाथ ऊपर उठाया, उसकी चमक शंकर पंडित की आँखों में कौन्ध गई और उन्होने वार से बचने के लिए हाथ आगे कर लिए थे। इसलिए छुरा छाती में न लगकर हाथ में लगा था। शंकर पंडित घर आये और कपड़ा गीला करके हाथ पर बाँध लिया। प्रातः लोगों के पूछने पर उन्होने कहा-रात को गिर गया था, थोड़ा घाव हो गया है, ठीक हो जायेगा। परन्तु ग्रामवासी उनका बड़ा आदर करते थे। वे उन्हें वैद्य के पास ले गये। वैद्य ने ज़ख़्म साफ करके पट्टी कर दी और सबको तसल्ली देते हुए कहा। घबराने की कोई आवश्यकता नहीं है। कुछ ही दिनों में घाव ठीक हो जायेगा।
     उधर कुशलपाल के साथ क्या हुआ? छुरा घोंप कर जब वह भागा तो कुछ दूर जाकर ठोकर लगने से गिर पड़ा और मूÐच्छत हो गया। उस अवस्था में उसने क्या देखा कि कुछ भयानक आकृति वाले व्यक्तियों ने उसे पकड़ लिया है और यह कहते हुए डंडों से मार रहे हैं कि तूने भगवान के भक्त को जान से मारने की जो कोशिश की है, यह उस पाप का दण्ड है। वे बड़ी देर तक उसे मारते रहे और वह चिल्लाता रहा। अन्ततः उसे अधमरा करके वे चले गये। तभी वह होश में आ गया। उसका सारा शरीर एक-एक अंग सचमुच ही दुःख रहा था और उसमें उठने की भी शक्ति न थी। वह सारी रात दर्द से कराहता रहा। सूर्य उदय से पहले जैसे-तैसे वह उठा और हवेली में पहुँचा। उसके पूरे शरीर पर मार के नीले-नीले निशान थे। रह-रहकर उसे वे भयानक आकृतियाँ दिखाई पड़ती और वह भय से कांप उठता। वैद्य के कई दिन तक उपचार करने पर वह चलने और फिरने के योग्य हुआ।
     शंकर पंडित के विषय में कुशलपाल को ज्ञात हो गया था कि छुरा उनकी छाती में न लगकर उनके हाथ पर लगा था और यह भी कि उन्होने यह बात किसी पर प्रकट नहीं की कि उन पर किसी ने छुरे से हमला किया था। यह सब सुनकर कुशलपाल को अपने किये पर बड़ी ग्लानि हुई और वह शंकर पंडित के घर जा पहुँचा और सम्पूर्ण वृत्तान्त सुनकर पश्चाताप करता हुआ उनके चरणों में गिर पड़ा और रोते हुए बोला-पंडित जी! मैं बड़ा अधम हूँ, बड़ा पापी हूँ जो मैने आप जैसे भगवान के सच्चे भक्त को दुःख दिया है। मैं आपसे बार-बार क्षमा मांगता हूँ। पंडित जी ने उसे उठाकर गले से लगाते हुए कहा-ठाकुर साहिब! आपने तो मेरा भला ही किया है, क्योंकि आपके इस कृत्य के कारण ही मुझे भगवान के दर्शन पाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। भगवान आपका कल्याण करें। कुशलपाल का चित्त अब शुद्ध हो गया था और उसके स्वभाव में आमूल परिवर्तन हो गया था। अतएव भक्त शंकर पंडित के मार्गदर्शन में उसने भगवान का भव्य मन्दिर तो बनवाया ही, पूर्ण महापुरुषों की शरण ग्रहण कर उसने सच्चे नाम का उपदेश भी ले लिया। इस प्रकार भक्ति के मार्ग पर चलकर उसने लोगों से आदर-सम्मान तो पाया ही, अपना परलोक भी संवार लिया।
      कथा का अभिप्राय यह है कि एक सच्चा भक्त अपने  वैरी के साथ भी कभी वैर नहीं करता, अपितु सदा उसके कल्याण एवं हित की ही कामना करता है। इस प्रकार वह अपना  कल्याण तो करता ही है, उसके 
संसर्ग में आने वालों का जीवन भी सुधर एव सवंर जाता है।

शनिवार, 30 जुलाई 2016

मुझे थप्पड़ खा कर ज़बरदस्ती लेना पड़ा

शेख सादी साहिब धन चोर ले गये
शेख सादी साहिबअपने समय में माने हुए व्यक्ति थे। फकीरों साधु-सन्तों की संगति से उन्होंने सन्तोष रूपी शिक्षा को दृढ़ता से पल्ले बाँध लिया। भगवान की कृपा से घर में धन-माल सब कुछ था परन्तु इसके लिये उन्हें अहंकार नहीं था।कोई सम्बन्धी कहता कि मियाँ!इतना क्या करोगे? उत्तर देते कि जिसका है वही सम्भाल लेगा मुझे क्या चिन्ता? शेख सादी साहिब तोअपनी मस्ती में मस्तदुनियाँ का कार्य-व्यवहार करके हुएफकीरों की संगति में समय व्यतीत करते हुए जीवन का लाभ ले रहे थे।
     कुछ समय बीता।कुछ धन सन्तों की सेवा-टहल में खर्च कर दिया और शेष को चोर चुराकर ले गए। किसी मित्र ने कहा-मियाँ! अब कैसे बसर होगा?उत्तर मिला कि जैसे पहले था वैसे अब हूँ,मेरा धन तो कहीं नहीं गया।उसीअनुरूप ही फकीरों की सेवा टहल जो पहले धन से करते थे अब तन से करने लगे। इसी पर सन्तोष था कि ऊँट तो उनके पास है जिससे आने जाने में असुविधा नहीं थी।
          जो कुंजे कनाअत में है तकदीर पर शाकिर।
          है जौक  बराबर  उन्हें कम और जियादा।।
जो सन्तोषी है,वे भाग्य पर भरोसा रखते हैं। उन्हें कम और ज्यादा सभी बराबर है।उन्हें जो मिलजाए उसी पर सब्रा करते हैं। एक बार यह घटना घटित हुई कि एक सौदागर ऊँटों पर कुछ लादकर ले जा रहा था। उसने अपना धन माल सुरक्षा की दृष्टि से एक बहुत ही बूढ़े लद्दू ऊँट पर लाद दियाऔर उस पर टूटी-फूटी काठी रख दी और उस काठी में अशर्फियों की थैली रख दी। ऐसा उसने इसलिये किया ताकि बूढ़े ऊँट पर किसी की दृष्टि न पड़े।वह सौदागर जंगल से गुज़र रहा था कि अकस्मात् युद्ध में शत्रु से लूटा माल लेकर कुछ लोगआ रहे थे, उन्होंने सौदागर से सब ऊंट व माल छीन लिए।उनमें वह बूढ़ा ऊँट भी था।सभी सरदार अन्य ऊंटों पर सवार हो गएऔर एक सरदार अभी कुछ दूर बूढ़े ऊँट पर जा ही रहा था कि उधर से शेख सादिसाहिबअपने ऊंट पर सवार मिल गए। वह ऊँट भी अच्छा था और काठी भी नई थी।सरदार ने""आव न देखा ताव''बूढ़े ऊंट से उतर कर शेख सादि साहिब के अच्छे ऊँट को छीन लियाऔरअपना बूढ़ा ऊंट उन्हें दे दिया और कहा कि चल बैठ इस ऊंट परऔर चला जा।वह सरदार शेख सादि साहिब के ऊँट को लेकर चला गया। शेख सादिसाहिब बूढ़े ऊँट को लेकरअपने घर आ गए।और कहने लगे किअच्छा हुआ परमात्मा ने अब इसकी सेवा टहल करने को दिया है।ज्यों ही ऊंट से काठी उतारकर एकओर रखने लगे कि झनझनाती स्वर्ण मोहरें थैली में से गिर पड़ींऔर ऊंट से चीथड़ों की कमानी उतारी तो ढेर धन उसमें छिपा पाया।उन्होने आकाश की ओर देखकर कहा-वाह भगवान!सच है,जिसे देता है छप्पर फाड़कर देता है।और मुझे थप्पड़ खा कर ज़बरदस्ती लेना पड़ा।भगवान जो कुछ करता हैअच्छाही करता है।
 

मंगलवार, 26 जुलाई 2016

अमानत में ख्यानत




     बहुत समय पहले की बात है, मालवा के राजसिंहासन पर राजा शक्तिसिंह का शासन था। अपने नाम के ही अनुरुप वह अत्यन्त शक्तिशाली था और आसपास के सभी राजा उसकी शक्ति का लोहा मानते थे। शक्तिशाली होने के कारण उसमें अहंकार का आ जाना एक स्वाभाविक बात थी। एक दिन राजा शक्तिसिंह के मन में शिकार खेलने की इच्छा हुई। इच्छा उठने की देर थी कि सारथि को आदेश हुआ कि रथ तैयार करो, राजा साहिब शिकार पर जायेंगे। सारथि ने तत्काल शिकार के लिए आवश्यक सामान रथ में रखकर घोड़े जोते। राजा शक्तिसिंह ने रथ में बैठकर वन की ओर प्रस्थान किया। जैसे ही उसने वन में प्रवेश किया, एक अति सुन्दर हरिण छलांगें मारता हुआ रथ के आगे से निकला। राजा ने तुरन्त सारथि से कहा-""कितना सुन्दर हरिण है। इसको जीवित पकड़ना है, रथ इसके पीछे लगा दो।''
     सारथि ने रथ हरिण के पीछे लगा दिया। यह देखकर हरिण तेज़ी से भागा। राजा ने सारथि से कहा-""रथ तेज़ करो, शिकार हाथ से जाने न पाये।'' सारथि ने घोड़ों को सरपट दौड़ाया, परन्तु हरिण तो अपने प्राण बचाने के लिए उस समय घोड़ों से भी तेज़ दौड़ रहा था। यह देखकर राजा ने पुनः कहा-""घोड़े और तेज़ करो।'' सारथि ने घोड़े और तेज़ किये, परन्तु हरिण अब भी बहुत आगे था। शक्तिसिंह सारथि पर नाराज़ होने लगा। तब सारथि बोला-""राजन्! घोड़े तो अपनी शक्ति के अनुसार पूरे वेग से भाग रहे हैं, अब इससे तेज़ भागने की इनमें सामथ्र्य नहीं है। हाँ! यदि इस समय वामी घोड़े होते तो फिर शिकार निश्चय ही आपके हाथ में था।''
     सारथि से वामी घोड़ों का नाम सुनकर शक्तिसिंह हैरान हुआ। उसकी अश्वशाला में एक से बढ़कर एक घोड़े मौजूद थे, परन्तु वामी घोड़ों का नाम तो उसने आज तक न सुना था। यह नाम उसके लिए बिल्कुल नया था। उसने सारथि को रथ रोक देने का आदेश दिया। जब रथ रुक गया तो राजा ने सारथि से पूछा-"" वामी घोड़ों से तुम्हारा क्या अभिप्राय है? हमने तो आज तक इन घोड़ों के बारे में नहीं सुना।'' सारथि ने उत्तर दिया-""राजन्! इसी वन के दूसरे छोर पर महर्षि वामदेव जी का आश्रम है। उनके पास दो ऐसे घोड़े हैं जो हवा से बातें करते हैं। चूँकि वे घोड़े महर्षि वामदेव जी के पास हैं, इसलिये लोग उन्हें वामी घोड़े कहते हैं।''
     राजा ने कहा-""तो फिर अपना रथ महर्षि जी के आश्रम की ओर मोड़ दो। हम वे घोड़े देखना चाहते हैं।'' सारथि ने रथ का रुख मोड़ दिया। कुछ ही देर बाद रथ महर्षि जी के आश्रम पर पहुँच गया। महर्षि वामदेव जी ने राजा का स्वागत-सत्कार कर कुशल-क्षेम पूछा और फिर आश्रम पर आने का कारण। राजा ने हाथ जोड़कर कहा-""आपकी कृपा से सब कुशल-मंगल है। आज हम इधर शिकार के लिए आए थे कि एक हरिण हमारे रथ के आगे से निकला। हरिण बहुत सुन्दर था। हम उसे जीवित पकड़ना चाहते थे, परन्तु उसकी गति के समक्ष हमारे घोड़े पिछड़ गए। उस समय सारथि से हमें ज्ञात हुआ कि आपके पास हवा से बातें करने वाले दो घोड़े हैं। आप वे घोड़े हमें कुछ समय के लिए दे दें। शाम को वे घोड़े हम आपको वापस कर देंगे।''
     महर्षि वामदेव जी बोले-""राजन्! मेरे पास जो घोड़े हैं, वे वरुण देवता के हैं। आप चूँकि स्वयं चलकर यहाँ आए हैं, इसलिए हम आपको इनकार नहीं करते, परन्तु ये घोड़े शाम को हर हालत में यहाँ पहुँच जाने ज़रूरी हैं।'' राजा ने शाम को घोड़े पहुँचा देने का वादा किया और महर्षि जी से घोड़े लेकर शिकार के लिए चला गया। शाम हुई, परन्तु तब तक राजा का मन बेईमान हो चुका था, अतः उसने सारथि से कहा-""घोड़े महल की ओर ले चलो।''
     सारथि ने घूमकर राजा की ओर देखा, परन्तु कुछ बोला नहीं। उसने रथ महल की ओर मोड़ दिया। जब 
शाम को घोड़े वापस न आये तो महर्षि वामदेव जी समझ गये कि राजा घोड़ों को अपने साथ ले गए होंगे। उन्होंने अपने एक शिष्य को राजा के पास भेजा, परन्तु राजा ने टालमटोल कर उसे वापस भेज दिया। तब महर्षि जी स्वयं राजा के पास गये। पहले तो राजा ने टालमटोल की कि घोड़े थके हुये हैं, आपको बाद में पहुँचा दिये जायेंगे, परन्तु जब महर्षि जी ने घोड़े तत्काल उनके हवाले कर देने के लिए ज़ोर दिया तो राजा शक्तिसिंह ने घोड़े वापस देने से साफ साफ इनकार करते हुए कहा-""ये घोड़े राजाओं के रखने योग्य हैं, आप ऋषियों का इनसे क्या काम?''
     महर्षि वामदेव जी ने कहा-""राजन्! यह तो अमानत में ख़्यानत है। यह ठीक नहीं है।''
     राजा ने अहंकार से कहा-""तो फिर आपसे जो हो सकता है कर लीजिये, ये घोड़े आपको किसी तरह भी नहीं मिलेंगे।''
     राजा का यह कोरा उत्तर सुनकर महर्षि वामदेव जी धरती की ओर देखने लगे। तत्काल ही एक कृत्या धरती फोड़कर बाहर आई। कृत्या उस शक्ति को कहते हैं जो मन्त्र के अनुष्ठान द्वारा उत्पन्न की जाती है। उस कृत्या ने पलक झपकते ही शक्तिसिंह का सिर धड़ से अलग किया और फिर धरती में समा गई। महर्षि जी घोड़े लेकर वापस अपने आश्रम चले गए। घोड़े भी हाथ से गए और अमानत में ख़्यानत करने का फल भी शक्तिसिंह ने पाया मृत्यु के रुप में।
     यह कथा है तो छोटी-सी, पर है बड़ी शिक्षाप्रद। यदि हम संसार की रचना को देखें तो संसार की सारी रचना काल की रचना है और संसार के सब पदार्थ काल की सम्पत्ति हैं जो जीव को थोड़े समय के लिए इस्तेमाल करने को मिले हैं। किन्तु काल की इस सम्पत्ति पर जब मनुष्य अपना अधिकार जमा बैठता है और उसे अपना समझने और कहने लगता है तो वह अमानत में ख़्यानत करने का भारी अपराध कर बैठता है। इसका फल यह होता है कि ये सब सामान तोे अन्ततः काल उससे छीन ही लेता है, काल के दण्ड का भागी भी मनुष्य बन जाता है। इन पदार्थों को अपना समझ बैठने और इनमें सुरति फँसाने के फलस्वरुप काल उसे चौरासी के चक्र में घसीट ले जाता है, जहाँ उसे बार-बार काल का ग्रास बनना पड़ता है।
     इसलिये महापुरुषों का उपदेश है कि संसार के इन सामानों को आवश्यकता के अनुसार बेशक उपयोग में लाओ, रिश्तेदारों और सम्बन्धियों से जीवन-निर्वाह करते हुए उचित व्यवहार भी करो परन्तु इन्हें अपना समझने और बनाने का यत्न कभी न करो। न ये सामान तुम्हारे हैं, न कभी तुम्हारे बन सकते हैं। तुम्हारी अपनी वस्तु तो केवल-केवल प्रभु का सच्चा नाम है जो पूर्ण सतगुरु से प्राप्त होता है। सत्पुरुषों के वचन हैं किः-
आपन  तनु नहीं जाको गरबा। राज मिलख नहीं आपन दरबा।।
आपन नहीं का कउ लपटाइओ। आपन नामु सतिगुर ते पाइओ।।
सुत  बनिता  आपन नहीं भाई।  इसट मीत आप  बापु न माई।।
सुइना  रुपा  फुनि  नहीं दाम।  हैवर  गैवर  आपन नहीं काम।।
(गुरुवाणी)
सत्पुरुष श्री गुरु अर्जुनदेव जी महाराज फरमाते हैं कि ऐ मनुष्य! जिस शरीर का तुझे अभिमान है, वह तेरा अपना नहीं है। राज्य, भूमि और धन भी तेरा अपना नहीं है। पुत्र,स्त्री, भाई, मित्र, पिता और माता इनमें से भी सदा के लिए तेरा कोई अपना नहीं है। सोना, चांदी, दौलत, हाथी और घोड़े-ये भी तेरे अपने नहीं हैं और अन्त समय तेरे काम नहीं आ सकते। फिर तू इनसे क्यों लिपटा हुआ है अर्थात् इन्हें क्यों अपना समझ रहा और इमें सुरत फँसाये हुए हैं। तेरा अपना तो केवल "नाम' ही है जिसकी प्राप्त सद्गुरु से होती है। इसलिए नाम से अपनी सुरति जोड़ो और काल के फंदे से सदा के लिए आज़ाद हो जाओ।

शनिवार, 23 जुलाई 2016

जैसा सोचोगे , वैसा बनोगे


     एक बार देवर्षि नारद जी हमेशा की तरह घूमते-घूमते उज्जयिनी पहुँचे। वहाँ उनका एक मित्र रहता था। उन्होने सोचा के बहुत दिन हो गए हैं, क्यों न आज अपने मित्र से भेंट की जाए। जब वे मित्र के घर पहुँचे तो उसे पहचान ही नहीं पाए। जब पहचाने तो बोले-मित्र! यह क्या दशा बना रखी है? जब हम पिछली बार मिले थे, तब तुम हट्टे-कट्टे  नौजवान थे। और अब अपने शरीर को देखो, जैसे सूखकर काँटा हो गए हो। इसका कारण क्या है?
     इस तरह नारद ने उस पर प्रश्नों की बौछार कर दी। जब नारद के सभी प्रश्न खत्म हो गए तो वह बोला-मित्र! तुम सही कहते हो। लेकिन अब वे दिन लद गए जब मैं जवान था, कुँवारा था। अब मैं शादीशुदा हूँ, बाल-बच्चेदार हूँ। मेरी आर्थिक स्थिति भी ठीक नहीं रही। घर-गृहस्थी की ज़िम्मेदारी में आदमी की हालत ऐसी ही हो जाती है। परन्तु तुम मेरी बातों को कैसे समझोगे, तुम तो ब्राहृचारी हो। सांसारिक परेशानियों से तुम्हारा क्या लेना-देना। खैर, छोड़ो, और बताओ कैसे आना हुआ? उसकी बात का नारद ने कोई उत्तर नहीं दिय। वे मित्र की हालत देखकर व्यथित थे और उसकी सहायता करना चाहते थे। लेकिन उनके पास उसे देने के लिए कुछ नहीं था। अचानक उन्हें एक उपाय सूझा। वे बोले-ये सब चलता रहेगा। चलो हम स्वर्गलोक घूमकर आते हैं।
     इस पर वह बोला- लेकिन, मेरी पत्नी और बच्चे। नारद बोले-कुछ समय के लिए उन्हें भूल जाओ। थोड़ा समय अपने मित्र के साथ भी तो बिताओ। हम दोनों जल्दी ही लौट आएँगे। नारद की बात पर वह सहमत हो गया और दोनों स्वर्गलोक में पहुँचे। वहाँ एक अत्यंत खूबसूरत बाग था। नारद उसे एक वृक्ष के नीचे इंतज़ार करने को कहकर देवराज इंद्र के महल में चले गए। नारद जी के जाने के बाद वह वहाँ के सौंदर्य को निहारने लगा। जब बहुत देर हो गई और नारद जी नहीं लौटे तो वह बैठा-बैठा थक गया। अचानक उसके मन में एक विचार उठा-इतनी सुंदर जगह पर यदि बिस्तर भी होता तो लेटने में कितना आनंद आता। उसका विचार अभी पूरा भी नहीं हुआ था कि उसने देखा कि वह एक आरामदायक बिस्तर पर लेटा हुआ है। अपने आपको बिस्तर पर पाकर वह आश्चर्यचकित हुआ लेकिन फिर उसने सोचा कि यह स्वर्ग है, शायद कोई चमत्कार हुआ होगा।
     कुछ समय बाद उसके मन में विचार आया कि काश! कोई आकर मेरे पैर दबा दे तो कितना आराम मिले। पलक झपकते ही वहाँ कई सुंदर अप्सराएँ आ गर्इं। कोई उसके हाथ दबाने लगी तो कोई पाँव। कुछ देर तो वह आनंद में रहा, लेकिन अचानक उसे विचार आया कि यदि मेरी पत्नी यह सब देख ले तो वह निश्चित ही मुझे पीटने लगे। फिर क्या था, उसकी बीबी सामने खड़ी थी हाथ में बेलन लिए। उसने उसके विचार के अनुसार पीटना भी शुरू कर दिया। वह बीबी से डरकर भागा तो सामने से नारद जी आ रहे थे। वे अंदर से छुपकर सब देख रहे थे। दरअसल वे जान बूझकर उसे कल्पवृक्ष के नीचे बैठाकर गए थे ताकि वह अपनी सभी मनोकामनाएं पूरी कर ले और वे उसे वापिस उसके घर छोड़ आएँ। नारद उससे बोले-बड़े ही मूर्ख हो तुम। सोचना ही था तो कुछ अच्छा सोचते जिससे तुम्हारा और तुम्हारे परिवार का कल्याण होता। यहाँ सोचा भी तो बीबी से पिटने के बारे में। स्वर्ग में बैठकर भी तुम्हारी सोच नहीं बदली। मैं पहले ही कह रहा था कि कुछ समय के लिए अपनी परेशानियों को भूल जाओ। यदि भूल जाते तो शायद तुम्हें इस तरह भागना नहीं पड़ता।
     नारद के उस मित्र जैसी हालत उन सभी लोगों की होती है, जो अपने घर की परेशानियों को आफिस और आफिस की परेशानियों को घर ले जाते हैं। या फिर इसे इस तरह समझें कि हम परेशानियों का बोझा इस तरह से ढोते हैं कि हम कहीं भी जाएं, वे हमारा पीछा नहीं छोड़तीं। इससे न केवल हम खुद परेशान रहते हैं, बल्कि अपने आसपास के माहौल को भी तनाव भरा बना देते हैं। इसलिए हमें इस प्रवृत्ति पर काबू पाना ज़रूरी है, वरना यह विक्रम के बेताल की तरह पीठ पर लदी हर जगह पहुँच जाएगी। अतः जहाँ की चीज़ हो, उसे वहीं तक सीमित रहने दो। आफिस से निकलो तो वहां की परेशानियाँ भूलकर और घर से निकलो तो घर की।
     दूसरी बात, नकारात्मक विचारों से सफलतता मिलना उतना ही असंभव है, जितना कि बबूल के पेड़ पर आम का लगना। हम अपने नकारात्मक विचारों के जाल में इस तरह उलझते जाते हैं कि चाहकर भी उससे मुक्त नहीं हो पाते। केवल सोच की वजह से ही वह व्यक्ति उस स्थान से खाली हाथ लौट आया, जहाँ पर उसे दुनियाँ भर की खुशियाँ मिल सकती थी। इसलिए जीवन में आगे बढ़ने की सोच रहे लोगों के लिए यह ज़रूरी है कि पहले अपनी सोच का दायरा बढ़ाएँ क्योंकि सोच में इतनी शक्ति होती है कि आप जैसा सोचते हैं, वैसा ही बन सकते हैं। यानी कल्पवृक्ष स्वर्ग में नहीं, हमारे भीतर ही है जो मन में उत्पन्न विचारों के अनुसार फल देता रहता है। इसलिए ज़रूरी है कि आप विचारों को नियंत्रित करें, विचार आपको नहीं।
 

गुरुवार, 21 जुलाई 2016

यदि उड़ने नहीं दोगे तो वह उड़ जाएगा

भवन निर्माण की कला में निपुण कारीगर की प्रसिद्धि सुनकर उसके नगर के राजकुमार ने उसे एक बेहद खूबसूरत महल निर्माण का कार्य सौंपा। वह पूरी लगन और मेहनत से महल के निर्माण में लग गया। जब निर्माण कार्य अंतिम स्थिति में था, तो राजकुमार महल देखने आया। उसकी खूबसूरती देखकर वह मंत्रमुग्ध हो गया। राजकुमार ने कारीगर की खूब प्रशंसा की। अंत में उसने उससे पूछा- "क्या ऐसा महल तुमने किसी और के लिए भी बनाया है?' कारीगर ने कहा- "नहीं राजकुमार।' राजकुमार ने कहा-अति उत्तम।
     इसके बाद राजकुमार अपने एक दरबारी संजिक से बोला-" मैं ऐसा दूसरा महल कभी बनने भी नहीं दूँगा।' संजिक बोला-"वह कैसे?' राजकुमार ने कहा- "है एक तरीका।' ऐसा कहकर वह कुटिल मुस्कान बिखेरता हुआ आगे बढ़ गया। संजिक उसका आशय समझ गया। वह सोचने लगा कि एक श्रेष्ठ कलाकार को मारना उचित नहीं। अवसर देखकर वह कारीगर से मिला और उससे पूछा- "क्या महल तैयार हो चुका है?' कारीगर ने कहा- "जी, हुज़ूर।' संजिक ने कहा- "कई बार व्यक्ति की खूबी ही उसकी जान की दुश्मन बन जाती है। इसलिए तुम सचेत रहना।' ऐसा कहकर वह चला गया। अगले दिन जब राजकुमार ने कारीगर को बुलाकर पूछा कि महल पूरा हो गया या अभी काम बाकी है, तो कारीगर बोला- "कुमार, अभी तो एक ऐसा काम बाकी है, जिसकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता। इसके लिए मुझे अच्छी गुणवत्ता की लकड़ी की ज़रूरत है। साथ ही यह काम मैं एकान्त में करूँगा ताकि कोई देख न ले। आप इसकी व्यवस्था करा दें।' ऐसा ही किया गया। कारीगर अपने काम में जुट गया। उसने उस लकड़ी से एक विमान का निर्माण किया। इस बीच राजकुमार को कुछ संदेह हुआ। उसने चारों ओर से महल को घेर लिया। स्थिति को भाँपकर कारीगर ने अपनी पत्नी और बच्चे को विमान में बिठाया और उड़कर दूसरे राज्य में पहुँच गया। इसके बाद उसने और भी कई शानदार महल खड़े किए।
     दोस्तो, कहते हैं प्रतिभा तभी फलीभूत होती है जब उसे चातुर्य का साथ मिल जाए, क्योंकि चतुरता ही प्रतिभा को कार्यान्वित करने वाला, उसे बढ़ाने वाला यंत्र होता है। यदि कारीगर में प्रतिभा के साथ चतुराई न होती तो निश्चित ही वह अपनी जान से हाथ धो बैठता। यानी इससे यह बात स्थापित होती है कि व्यक्ति में उसकी तरह ही प्रतिभा के साथ चातुर्य गुण भी होना चाहिए। चातुर्य गुण का सीधा संबंध बुद्धि से है। यानी प्रतिभावान व्यक्ति बुद्धिमान भी है तो उसे आगे बढ़ने से कोई नहीं रोक सकता। यदि कोई उसकी प्रतिभा को दबाने, कुचलने की कोशिश करेगा तो वह सफल नहीं हो पाएगा।
     दूसरी ओर, आप बहुत-सी ऐसी प्रतिभाओं को जानते होंगे, जो एक सीमा से ज्यादा आगे बढ़ ही नहीं पार्इं। इनमें से किसी की खूबियों को देखकर लोग दावे करते होंगे कि देखना यह बहुत आगे जाएगा। वह आगे की तो छोड़ो, जहाँ था वहाँ से भी पीछे चला गया। इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं। लेकिन अकसर जो कारण अहम होता है वह है उस राजकुमार जैसा कोई व्यक्ति, जिसके मन में उसकी खूबी को देखकर सकारात्मक विचार आने की बजाए नकारात्मक विचार आए होंगे और उसने उसकी प्रतिभा को बढ़ाने, उसका उपयोग करने की बजाए उसे दबाना शुरु कर दिया होगा।
     ऐसा क्यों होता है? ऐसा इसलिए होता है कि कई बार व्यक्ति की प्रतिभा को देखकर लोग खुश तो बहुत होते हैं, लेकिन साथ ही उन्हें यह भय भी सताने लगता है कि यदि यह हमें छोड़कर किसी और के लिए काम करनेे लगा तो नुकसान हो जाएगा। ऐसे में बिना बात के आशंकित होकर वे उस व्यक्ति के पर काटने लगते हैं, जिससे वह ज्यादा न उड़ सके यानी आगे न बढ़ सके। लेकिन इससे होता उल्टा है। जब बात असहनीय हो जाती है तो वह उड़ जाता है यानी कहीं और जाकर बेहतर तरीके से काम करने लगता है, जहाँ कि उसकी प्रतिभा की कद्र होती है।
     इसलिए उचित यही है कि कोई यदि पूरी निष्ठा से आपके लिए अच्छा काम कर रहा है तो उसे प्रोत्साहित करें, उसे आगे बढ़ाएँ, वह और भी अच्छा करेगा। जिसका सीधा लाभ आपको और आपकी संस्था को होगा। तब वह भी सफलता की उड़ान भरेगा और आप भी। आज हम आपसे इतना ही कहना चाहेंगे कि आप भी अपनी प्रतिभा का चतुराई के साथ उपयोग करें और सफलता की ऊँची से ऊँची उड़ान भरें।

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