भक्त बन्धु महान्ति
भक्त सूरदास जी का कथन है किः-
तुम तजि और कौन पै जाऊँ?
काके द्वार जाइ सिर नाऊँ, पर हथ कहाँ बिकाउँ।
ऐसो को दाता है समरथ, जाके दिये अघाउँ।।
अंत काल तुम्हे सुमिरन गति, अनत कहूँ नहिं दाउँ।।
रंक सुदामा कियौ अजाची, दियौ अभय पद ठाउं।।
कामधेनु चिंतामनि दीन्हौ, कल्पवृच्छ तर छाउँ।।
भव समुद्र अति देखि भयानक, मन में अधिक डराउँ।
कीजै कृपा सुमिरि अपनौ प्रन, सूरदास बलि जाउँ।।
अनन्य प्रेमी भक्तों का जीवन बिल्कुल ऐसा ही होता है जैसा कि भक्त सूरदास जी ने उपरोक्त वाणी में लिखा है। वे एक मात्र सर्वेश्वर भगवान को ही अपना मीत, सुह्यद, हितैषी और आश्रय मानते हैं और एकमात्र भगवान का ही उन्हें सहारा होता है। संसार के रिश्ते-नातों को वे स्वार्थ पर आधारित कच्चे रिश्ते मानते हैं, इसलिए वे न तो कष्ट पड़ने पर कभी उनका द्वार खटखटाते हैं और न ही सहायता की कभी उनसे आशा और अपेक्षा रखते हैं। ऐसे ही भगवान के अनन्य प्रेमी भक्त थे-बन्धु महान्ति। संसार में उनका यदि कोई सम्बन्धी, सुह्यद और मित्र था, तो वे थे-स्र्वेश्वर भगवान। भक्त बन्धु महान्ति उड़ीसा प्रान्त के ग्राम याजपुर के रहने वाले थे। घर में पाँच प्राणी थे-बन्धु महान्ति, उनकी पत्नी और तीन बच्चे-एक पुत्र दो कन्याएँ। भक्त बन्धु महान्ति यद्यपि निर्धन थे, परन्तु थे बड़े ही सन्तोष प्रिय। उनकी पत्नी भी भक्तिमती और सन्तोष प्रिय थी। बन्धु महान्ति के पास थोड़ी-सी खेती की भूमि थी, उससे जो कुछ प्राप्त होता था, उसी से जैसे-तैसे परिवार का निर्वाह होता था। यदि कोई साधु अथवा अतिथि द्वार पर आ जाता तो बड़े ही आदर सत्कार और प्रेंमभाव से पहले उसे भोजन कराया जाता, तदुपरान्त बच्चों को भोजन कराकर फिर बन्धु महान्ति और उनकी पत्नी भोजन करते। अपना अधिकतर समय बन्धु महान्ति भगवान की पूजा-आराधना और भजन-सुमिरण में व्यतीत करते।
संसार में रहते हुये संसार की ज़िम्मेवारियों को निभाना और परिवार का भरण-पोषण करने के लिये धनोपार्जन करना आवश्यक है, इसमें कोई सन्देह नही, परन्तु इसे ही जीवन का ध्येय और लाभ समझ लेना और इसी में ही जीवन के स्वर्णिम अवसर को व्यतीत कर देना-यह नितान्त भूल है। जीवन का परम लाभ तो भगवान का भजन-सुमिरण करने में ही है। गुरुवाणी का वाक हैः-
भजहु गोबिंद भूलि मत जाहु। मानस जन्म का एही लाहु।।
अर्थः-""ऐ मनुष्य! परमात्मा का भजन-सुमिरण करना मत भूलो, क्योंकि मनुष्य जन्म का एकमात्र लाभ यही है।'' भक्त बन्धु महान्ति अपनी इस निर्धनता की स्थिति में भी सन्तुष्ट रहते हुए जीवन का परम लाभ प्राप्त करने में लगे हुए थे। जब वे भगवान के सुमिरण-ध्यान में बैठते तो शरीर की सुध-बुध भूल जाते। न उन्हें दिन का पता चलता, न रात का। उनकी पत्नी जब उन्हें चेत कराती तो उनकी बाह्र चेतना लौटती।
भक्त बन्धु महान्ति के दिन इसी प्रकार बीत रहे थे कि उस क्षेत्र में भीषण अकाल पड़ा। कुएं, तालाब आदि सूख गए। जल के बिना खेत उजाड़ हो गए। अन्न तो खेतों में क्या होना था, सूखी धरती में घास तक न उगी। लोग दाने-दाने को तरसने लगे। बन्धु महान्ति कुछ दिन तक तो घर में रखे अन्न से निर्वाह करते रहे, परन्तु कब तक? शीघ्र ही अन्न समाप्त हो गया। अब अन्न कहां से आए? जब चारों तरफ अन्न के बिना त्राहि-त्राहि मची हो तो उधर भी अन्न कहाँ से मिले? स्थिति यह हो गई कि बन्धु महान्ति तथा उनके परिवार को निरन्तर तीन दिन तक कुछ भी खाने को न मिला। बच्चे भूख के मारे बिलख-बिलख कर रोने लगे। माता से बच्चों का भूख से तड़पना और बिलखना न देखा गया। उसने बन्धु महान्ति से कहा-""स्वामी! आप तो जानते ही हैं कि मेरे माता-पिता और भाई तो स्वर्गवासी हो चुके हैं, अन्य कोई सम्बन्धी भी मेरा नहीं है जिससे इस विपदा की घड़ी में कुछ सहायता माँगूं परन्तु क्या आपके भी कोई बन्धु-बान्धव, सम्बन्धी अथवा मित्र नहीं है? यदि कोई सम्बन्धी हो तो उनके पास चलिये, बच्चों का दुःख मुझसे देखा नहीं जाता। आज तीन दिन से उनके मुँह में अन्न का दाना तक नहीं गया।''
बन्धु महान्ति बोले-""इस संसार में मेरा केवल एक ही सम्बन्धी, सुह्यद और मित्र है, परन्तु उनके यहाँ पहुँचने में तो पाँच छः दिन लग जायेंगे। हाँ! हम लोग यदि उनके पास पहुँच गये तो वे अवश्य ही हम दीनों की सहायता करेंगे। उनका तो नाम ही दीनबन्धु है।'' स्त्री ने बन्धु महान्ति के कथन का तात्पर्य तो न समझा, परन्तु उनके कथन से कुछ आश्वस्त होते हुए बोली-""यहां भूखों मरने से तो चलना ही ठीक है। कुछ सहायता मिलेगी तो बच्चों का पेट तो भरेगा।'' यह कहकर वह तुरन्त चलने को तैयार हो गई। लड़के को पिता ने कन्धे पर बैठाया, छोटी लड़की को माता ने गोदी में लिया और बड़ी लड़की उनके साथ पैदल चलने लगी। मार्ग में पेड़ों के पत्ते आदि खाते हुए वे सब छठे दिन संध्या के समय जगन्नाथपुरी जा पहुँचे और सीधे श्री जगन्नाथ जी के मन्दिर गए। सिंहद्वार पर बड़ी भीड़ थी, अतः बन्धु महन्ति अपने परिवार के साथ मन्दिर के बाहर दक्षिण की ओर एक जगह जा बैठे। स्त्री ने कहा-""आप यहाँ आकर क्यों बैठ गए? आपके सम्बन्धी कहाँ रहते हैं? आप वहाँ क्यों नही चलते?''
बन्धु महान्ति ने कहा-""अब तो रात होने वाली है। इस समय उनसे भेंट होना मुश्किल है। आज की रात तो पानी पीकर जैसे-तैसे गुज़ारा करो; कल उनसे भेंट करके उन्हें सारी स्थिति बताऊँगा।''स्त्री यह सुनकर चुप हो रही, इस आशा में कि सुबह जब ये अपने सम्बन्धी से मिलेंगे तो उनके सारे संकट दूर हो जायेंगे। किन्तु बन्धु महान्ति के ह्मदय की अवस्था कुछ और ही तरह की थी। उनके मन में न तो धन की इच्छा थी, न ही अन्न की और न ही किसी अन्य पदार्थ की। वे जब घर से चले थे तो यह सोचकर नहीं चले थे कि दीनबन्धु भगवान से पेट की भूख मिटाने के लिए याचना करेंगे। वे तो यह सोचकर यहाँ आए थे कि मुझे तथा मेरे परिवार को नीलाचल भगवान के दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त होगा। शरीर तो एक दिन छूटना ही है, यदि भगवान की इस पवित्र नगरी में छूटे तो इससे बड़ा सौभाग्य और क्या होगा? यह सोचकर वे भाव-विह्वल हो गए और मन ही मन भगवान के चरणों में विनय करने लगे-""प्रभो! तुम तो सर्वान्तर्यामी हो, घट-घट की जानने वाले हो। मेरी तो प्रभो! बस यही प्रार्थना है कि तुम्हारे चरणों की प्रीति के अतिरिक्त मुझे और कुछ नहीं चाहिये। संसार की कोई भी कामना यदि मेरे मन में मौजूद हो तो उसे अपनी कृपा से मेरे मन से निकाल दो।''
स्त्री और बच्चे सो गए, परन्तु बन्धु महान्ति बैठे-बैठे भगवान का सुमिरण करने लगे। उधर श्री जगन्नाथ जी के मन्दिर में रात की सेवा के बाद द्वार बन्द कर दिये गए। सेवक गण सो गए, परन्तु दीन बन्धु भगवान को नींद कहाँ थी? उन का एक अनन्य प्रेमी, जिसे केवल उन्हीं का ओट-आसरा था, जो अपना सम्बन्धी, सुह्यद, मित्र सब कुछ उन्हीं को मानकर यहाँ आया था, जिसे उनकी दीनबन्धुता पर अटल विश्वास था, वह भक्त परिवार सहित भूखा हो तो दीनबन्धु को नींद कैसे आती? सब के सो जाने पर वे उठे, ब्रााहृण का वेष धारण कर भण्डार घर में गए और रत्न थाल को व्यंजनों से सजाकर मन्दिर के दक्षिण द्वार के बाहर आए और पुकारने लगे-""बन्धु! ओ बन्धु।''
बन्धु महान्ति ने आवाज़ सुनी। आवाज़ सुनकर उनकी स्त्री भी जाग गई। उसने कहा-""आपको कोई आवाज़ दे रहा है।'' बन्धु महान्ति ने कहा-""यहाँ मुझे कौन पुकारेगा? यहां मेरी जान-पहचान का कौन है? फिर
मैं तो किसी से मिला भी नहीं। कोई और बन्धु होगा।'' इतने में फिर आवाज़ आई-""बन्धु! ओ बन्धु।''
किन्तु बन्धु महान्ति ने यह सोचकर कि किसी और को आवाज़ दी जा रही है, कोई उत्तर न दिया। इतने में फिर आवाज़ आई-""ओ याजपुर के बन्धु महान्ति! क्या तुम मेरी आवाज़ नहीं सुन रहे हो?'' बन्धु महान्ति की स्त्री बड़े उतावलेपन से बोली-""यह तो कोई आपको ही बुला रहा है।''
बन्धु महान्ति मन ही मन विस्मित होते हुए शीघ्रता से द्वार के निकट पहुँचे जहां भगवान ब्रााहृण रुप में थाल पकड़े खड़े थे। उन्हें देखते ही भगवान ने कहा-""तुम्हे कितनी देर से आवाज़ें दे रहा हूँ, क्या तुम्हें सुनाई नहीं देता। थाल पकड़े-पकड़े मेरे हाथ दर्द करने लगे। लो! यह थाल संभालोऔर आज की रात इससे काम चलाओ। कल से तुम्हारे रहने ओर भोजनादि का सब प्रबन्ध हो जायेगा।''
आज के भौतिकवादी को इस बात पर शायद विश्वास न आये, परन्तु भगवान के प्रेमी भक्त इस बात को भलीभाँति जानते हैं कि जब-जब भी भक्तों पर कष्ट आता है, वे भक्तों की सहायता करते हैं, क्योेंकि उनका तो विरद है किः- अनन्य भक्त प्रेमी जो केवल, मेरे आश्रय रहते हैं।
निष्कामभाव से नित्य निरन्तर, सदा ही मुझे सुमिरते हैं।
ऐसे अनन्य प्रेमी भक्तों का, ध्यान सदा मैं रखता हूँ।
उनकी रक्षा और सहायता अर्र्जुन स्वयं मैं करता हूँ।।
अर्थः-जो अनन्य प्रेमी मुझ परमेश्वर को नित्य-निरन्तर स्मरण करते हुए निष्कामभाव से भजते हैं, उन नित्य-निरन्तर मेरा स्मरण-भजन करने वाले प्रेमी भक्तों की सहायता और रक्षा का दायित्व मैं स्वयं वहन करता हूँ।
बन्धु महान्ति अपलक नेत्रों से ब्रााहृण वेषधारी भगवान की ओर आश्चर्यमय दृष्टि से देखने लगे, क्योंकि उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि इस ब्रााहृण को उनका नाम-पता कैसे मालूम हुआ। वे अभी इसी ऊहापोह में थे कि भगवान पुनः बोले-""अरे जल्दी थाल पकड़ो, टुकर-टुकर क्या देख रहे हो?'' बन्धु महान्ति पर जैसे किसी ने जादू कर दिया हो। उन्होंने बिना कुछ पूछे थाल पकड़ लिया और स्त्री-बच्चों के पास पहुँच गए। उन्होंने अपनी स्त्री से कहा-""कदाचित् मन्दिर का कोई पुजारी था। पता नहीं, वह मुझे कैसे जानता है? मैंने तो उसे पहचाना नहीं। यह प्रसाद का थाल दिया है और कहा है कि आज की रात इससे काम चलाओ।''
बन्धु महान्ति की पत्नी ने तुरन्त बच्चों को जगाया। सब ने भरपेट भोजन किया। भोजनोपरान्त थाल
अच्छी तरह मांज कर स्त्री ने बन्धु महान्ति को दे दिया। वे थाल लौटाने द्वार पर गए तो द्वार अन्दर बन्द पाया। उन्होंने दो-तीन बार द्वार खटखटाया, परन्तु जब कोई उत्तर न मिला तो वापस लौट आए और थाल को अपने अंगोछे में लपेटकर अपने सिर के नीचे रख कर सो गये।
रात बीती, सुबह हुई। मन्दिर के भण्डारी ने जब भण्डारगृह खोला तो सन्न रह गए। वस्तुएं इधर-उधर बिखरी पड़ी थीं और भगवान के भोग का रत्नथाल गायब था। हल्ला मच गया, कुछ ही क्षणों में रत्नथाल की चोरी का समाचार चारों ओर फैल गया, कोतवाल भी सिपाहियों के साथ वहाँ आ पहुँचा, खोज शुरु हो गई और अन्ततः थाल सहित बन्धु महान्ति पकड़ा गया। सिपाहियों ने पूरे परिवार को बन्दी बना लिया और उनसे पूछताछ शुरु हुई। बन्धु महान्ति ने रात की सारी घटना सच-सच बता दी, परन्तु उसकी बात पर विश्वास कौन करता? फल यह हुआ कि सबको हथकड़ी-बेड़ी पहनाकर कारागार में डाल दिया गया। किन्तु बन्धु महान्ति को इससे न तो दुःख हुआ और न ही क्षोभ। उन्होंने इसे भगवान की इच्छा समझ कर शिरोधार्य किया। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्री कृष्ण जी अर्जुन के प्रति कथन करते हैं किः-
दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः।
वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते।।
यः सर्वत्रानभिश्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम्।
नाभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता।। 2/56-57
अर्थः-""दुःखों की प्राप्ति होने पर जिसके मन में उद्वेग नहीं होता,सुखों की प्राप्ति में जो सर्वथा निःस्पृह है तथा जिसके राग, भय और क्रोध नष्ट हो गये हैं, ऐसा मुनि स्थिरबुद्धि कहा जाता है।''
’""जो पुरुष सर्वत्र स्नेह रहितहुआ शुभ अथवा अशुभ वस्तु अथवा स्थिति को प्राप्त होकर न प्रसन्न होता है और न द्वेष करता है, उसकी बुद्धि स्थिर है।''
अस्तु, कारागार में बन्द कर दिये जाने पर भी बन्धु महान्ति को दुःख न हुआ। वे प्रभु-चरणों में प्रार्थना करने लगे-""हे प्रभो! तुम्हारा प्रत्येक विधान मेरे लिये मंगलमय है। यह दण्ड भी मेरे किसी पूर्वकृत पापकर्म का फल है जिसे भुगताकर हे प्रभो! आप मेरे कर्मों का खाता समाप्त कर रहे हो। तुम्हारी इच्छा पूर्ण हो।''
सारा दिन भक्त बन्धु महान्ति अपने परिवार सहित कारागार में बन्द रहे। रात हुई। पुरी के नरेश प्रतापरुद्र पुरी से कुछ दूर "खरदा' नामक स्थान पर अपने महल में शयन कर रहे थे। उन्होंने स्वप्न में देखा कि भगवान श्री जगन्नाथ जी उनसे बड़े रुष्ट होकर कह रहे हैं-""मेरा एक भक्त बन्धु महान्ति अपनी स्त्री और बच्चों सहित याजपुर से पैदल चलकर कई दिनों के बाद जैसे-तैसे यहाँ पहुँचा था और परिवार सहित यहाँ मन्दिर के बाहर पड़ा था। मन्दिर के किसी कर्मचारी ने उसकी बात भी न पूछी। पुरी में तुम्हारा कैसा प्रबन्ध है कि बाहर से आने वाले भक्तों को न तो कोई भोजन पूछता है और न ही उनके रहने की कोई व्यवस्था करता है?
बन्धु महान्ति मेरा अनन्य भक्त है और केवल मेरे ही आश्रित है, अतः मैं उसे अपने रत्नथाल में प्रसाद दे आया। लेकिन तुम्हारे सिपाहियों ने उसे रत्नथाल की चोरी के अपराध में पकड़ लिया। उसने यद्यपि सब कुछ सच-सच बता दिया, परन्तु किसी ने उसकी बातों पर विश्वास नहीं किया और उसे परिवार सहित हथकड़ी-बेड़ी पहनाकर कारागार में बन्द कर दिया गया। तुम अभी-अभी जाओ, उसे कारागार से मुक्त करो और उसे मन्दिर के हिसाब-किताब करने वाले के पद पर नियुक्त कर दो। आज के बाद मन्दिर का सब हिसाब-किताब वही संभालेगा। उसके निवास आदि का भी उचित प्रबन्ध कर दो।''
इन वचनों के बाद भगवान का स्वरुप अन्तर्धान हो गया और पुरी-नरेश की आँख खुल गई। उन्होंने तुरन्त अपने अंग-रक्षकों से घोड़ा तैयार करने को कहा। घोड़े पर सवार होकर वे पुरी पहुँचे और सीधे कारागार में गए। बन्धु महान्ति की हथकड़ी-बेड़ी खुलवाई और हाथ जोड़कर बोले-""यहाँ के लोगों ने जो आपको कष्ट दिया है, उसके लिये मैं आपसे क्षमा माँगता हूँ। यह सुनकर बन्धु महान्ति को बड़ा संकोच हुआ। वे कहने लगे-""आप यहाँ के राजा हैं, हमारे माननीय हैं, आप ऐसा न कहिये।''
पुरी-नरेश भक्त बन्धु महान्ति को परिवारसहित अपने स्थान पर ले गए और उनका बड़ा आदर-सत्कार किया। फिर मन्दिर के दक्षिण की ओर उनके रहने का प्रबन्ध कर दिया और मन्दिर के हिसाब-किताब का काम उन्हें सौंप दिया। उसके बाद पुरी-नरेश ने मन्दिर में जाकर भगवान के दर्शन किये और भक्त जी को जो कष्ट हुआ, उसके लिये क्षमा माँगी।
भक्त बन्धु महान्ति उस दिन से वहीं रहने लगे। उन्होंने अपना शेष जीवन भगवान की सेवा-पूजा-आराधना में ही व्यतीत किया और अपना जनम सफल किया। कहते हैं कि श्री जगन्नाथ जी के मन्दिर के आय-व्यय का हिसाब बहुत समय तक उनके वंशज ही करते रहे। हमें भी चाहिये कि इस गाथा से शिक्षा ग्रहण करें और एकमात्र अपने इष्टदेव के ही आश्रित हो रहें, केवल उनका ही आसरा मन में हो। जब हम पूरी तरह उन्हीं के आश्रित हो जायेंगे तो फिर हमारे इष्टदेव स्वयं हमारे ज़िम्मेवार हो जायेंगे; फलस्वरुप हमारे सारे कारज संवर जायेंगे।
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