भक्त नामदेव जी
भक्त नामदेव जी छीपी के लड़के थे। छीपी उन्हें कहते हैं जो कपड़ों पर रंग-बिरंगी बूटियां छापा करते हैं। ऐसा भी कहा गया है कि वे दर्ज़ी थे। महाराष्ट्र में दर्ज़ी को सींपी कहा जाता है। अभी वे अल्पायु के ही थे कि उनके माता-पिता परलोक सिधार गए, इसलिये बच्चे का पालन-पोषण नाना-नानी करने लगे। उनके नाना वामदेव जी भक्तिभाव सम्पन्न थे। नित्यप्रति प्रभात में उठकर वे ठाकुर जी की पूजा-आराधना किया करते, भजन गाते और ठाकुर जी को दूध का भोग लगवाकर तत्पश्चात् भोजन करते। नामदेव जी चूँकि अभी छोटे थे, इसलिये नाना-नानी यह सोचकर उन्हें जल्दी न उठाते कि कहीं उनकी पूजा में विघ्न न पड़े। जब वामदेव जी पूजा से निवृत्त
हो जाते, उसके बाद ही नामदेव जी को उठाया जाता।
एक दिन अकस्मात् नामदेव जी की आँख शीघ्र खुल गई। नाना-नानी को कमरे में न देखकर वे रोने लगे। उनके रोने की आवाज़ सुनकर नानी दौड़ती हुई वहाँ आई और उन्हें गोदी में लेकर प्यार से बोली-मत रो बेटा! तेरे नाना जी ठाकुर जी की पूजा कर रहे हैं। तेरे रोने से पूजा में विघ्न पड़ेगा। नामदेव जी चुप हो गए। नानी उन्हें बिठाकर अपने काम में लग गई। तब नामदेव जी उस कमरे में गए, जहँा उनके नाना पूजा कर रहे थे और एक ओर छिपकर नाना को पूजा करते हुए देखने लगे। उस दिन से उनका प्रतिदिन का यह नियम हो गया कि वे प्रभात में ही जाग जाते और नाना को पूजा करते हुए देखते। शनैः शनैः उनके ह्मदय में भक्ति के संस्कार बलवती होने लगे।
एक दिन जब वामदेव जी पूजा से निवृत्त हुए, तो नामदेव जी बोले-नाना जी! मैं भी ठाकुर जी की पूजा करूंगा और उन्हें दूध का भोग लगवाऊँगा। वामदेव जी ने उत्तर दिया, हाँ-हाँ अवश्य करना। जब मैं कहीं बाहर जाऊँगा, तो तुम पूजा भी करना और भोग भी लगवाना। उस दिन से नामदेव जी सदा इसी प्रतीक्षा में रहने लगे कि कब नाना जी बाहर जाएँ और कब उन्हें ठाकुर जी की पूजा का अवसर मिले। अन्ततः एक दिन ऐसा अवसर आ ही गया। वामदेव जी को किसी आवश्यक कार्य से बाहर जाना पड़ा। उन्होने जाते समय मूर्ति साथ रख ली। यह देखकर नामदेव जी बोले-नाना जी! आप ठाकुर जी को कहाँ ले जा रहे हैं?
वामदेव जी ने कहा-मैं कुछ दिनों के लिये बाहर जा रहा हूँ, वहीं ठाकुर जी की पूजा करूँगा। नामदेव जी बोले-आप जाओ, आपकी अनुपस्थिति में ठाकुर जी की पूजा मैं करुँगा। आपने मुझसे पहले कहा भी था कि जब कभी मैं बाहर जाऊंगा, तो ठाकुर जी की पूजा तुम करना। वामदेव जी बच्चे की बात सुनकर हँसने लगे और ठाकुर जी की मूर्ति निकालकर आले में रख दी और कहने लगे-प्रातः उठकर स्नानादि से निवृत्त होकर ठाकुर जी को स्नान कराना, उनकी पूजा करना, तत्पश्चात् उन्हें भोग लगवाना। ठाकुर जी को भोग लगवाने के उपरान्त ही खाना-पीना, पहले मत खा लेना।
वामदेव जी चले गए और नामदेव जी की प्रसन्नता का ठिकाना न रहा। बहुत दिनों की प्रतीक्षा के उपरांत ठाकुर जी की पूजा का अवसर उनके हाथ आया था। इसी प्रसन्नता में उन्हें नींद न आई। लेटे-लेटे भी यही विचार उनके मन में आते रहे कि कब सुबह होगी और कब मैं पूजा करुँगा। इन्हीं विचारों में करवटें बदलते रहे। अभी कठिनाई से आधी रात ही बीती थी कि नानी को जगाकर बोले-नानी,नानी! चल, ठाकुर जी को उतार दे, मैं पूजा करूँगा। नानी ने प्रेम से समझाया-बेटा! अभी तो आधी रात है, आधी रात को पूजा थोड़े ही करते हैं। अभी सो जा, प्रातः उठ कर पूजा करना।
नामदेव चुप हो गये। सोने का प्रयत्न किया, परन्तु आँखों में नींद कहाँ? जैसे तैसे रात्रि व्यतीत हुई। रोज़ नानी उन्हें जगाया करती थी, आज उन्होने नानी को जगाया। सर्दी के दिन थे फिर भी शीतल जल से स्नान किया। नानी उनके भक्तिभाव को देखकर प्रसन्न हुई। उसने ठाकुर जी की मूर्ति को आले से उतार कर चौकी पर रख दिया। नामदेव जी ने नानी से कहा-तुम जाओ! मैं अकेले पूजा करूँगा। ठाकुर जी के भोग के लिए दूध दे जाओ।
नानी ने एक कटोरे में दूध डालकर उनके निकट रख दिया और स्वयं घर के कामकाज में व्यस्त हो गई। नामदेव जी ने ठाकुर जी को स्नान कराया, वस्त्र तथा आभूषण पहनाए, तिलक लगाया, तुलसीदल अर्पित किए और फिर पूजा करने लगे। पूजा के उपरांत भोग लगवाने की बारी आई, अतः दूध का कटोरा आगे रखकर बोले-लो ठाकुर जी, भोग लगाओ! कटोरा ठाकुर जी के आगे रखकर वे प्रतीक्षा करने लगे। किंतु मूर्ति टस से मस न हुई। जब दस-पन्द्रह मिनट इसी प्रकार बीत गए, तो नामदेव जी ठाकुर जी को मनाते हुए बोले-ठाकुर जी! भोग क्यों नहीं लगाते? क्या दूध कम है? अच्छा! तुम यह तो पियो, मैं नानी से और माँग लाऊँगा।
किन्तु ठाकुर जी ने न तो दूध ही पिया और न ही उनकी बात का कोई उत्तर ही दिया। उनको क्या पता था कि मूर्ति न तो कभी दूध पीती है और न ही कभी बोलती है। उन्होंने तो नाना की बात पर विश्वास कर यही समझा कि ठाकुर जी वास्तव में ही दूध का भोग लगाते हैं। यही है बालसुलभ विश्वास कि नाना की बात को उन्होने पूर्णतया सत्य मान लिया। उनके मन में यह विचार तक नहीं आया कि नाना ने उनसे झूठ बोला होगा। उन्होने अपने मन में यही समझा कि मेरी पूजा में कोई कमी रह गई है, इसीलिए ठाकुर जी भोग नहीं लगा रहे। और इसी विश्वास के कारण अन्ततः वे प्रभु के दर्शन करने में सफल हुए। सन्तों ने सत्य ही कहा है किः-
दोहाः- बिनु बिस्वासै भक्ति नहीं, तेहि बिनु द्रवहिं न राम।
राम कृपा बिनु सपनेहु, जीव न लहि बिरुााम।।
अर्थः-बिना विश्वास के भक्ति नहीं होती और उसके बिना भगवान प्रसन्न नहीं होते तथा जब तक उनकी प्रसन्नता एवं कृपा नहीं उतरती, तब तक जीव को सपने में भी शान्ति प्राप्त नहीं होती।
जब ठाकुर जी ने दूध का भोग न लगाया, तो नामदेव हाथ जोड़कर विनय करने लगे, ठाकुर जी! मैं अभी बालक हूँ, आपकी पूजा करना नहीं जानता। मुझपर दया करो और दूध पी लो। किन्तु मूर्ति वैसे ही निश्चल रही। अब तो नामदेव जी बहुत घबराये और लगे रोने और रो-रोकर ठाकुर जी के चरणों में प्रार्थना करने। इसी प्रकार काफी समय बीत गया। इधर नानी को नामदेव जी का ध्यान आया। वह नामदेव के पास आकर बोली-चल बेटा! दूध पी ले। नामदेव जी बोले-जब तक ठाकुर जी भोग नहीं लगायेंगे, मैं भी कुछ नहीं खाऊँगा।
नानी ने उन्हें समझाने का बहुत प्रयत्न किया कि ठाकुर जी सचमुच भोग थोड़ा-ही लगाते हैं, परन्तु वह उनके विश्वास को डगमगा नहीं पाई। बहुत समझाने पर भी जब वे अपनी बात पर अड़े रहे, तो नानी बड़बड़ाती हुई चली गई कि जब भूख सतायेगी तो भोग लगाना भूलकर अपने आप दूध माँगोगे। नामदेव जी घंटों रोते रहे, भूखे-प्यासे प्रार्थना करते रहे और ठाकुर जी को मनाते रहे, परन्तु मूर्ति टस से मस न हुई। नामदेव जी ने मन में सोचा-ठाकुर जी नाना जी के हाथ से दूध पी लेते थे, परन्तु मेरे हाथ से नहीं पीते। मैं बड़ा ही अभागा हूं। जब नाना जी आकर पूछेंगे कि ठाकुर जी को भोग लगवाया था, तो मैं उन्हें क्या मुँह दिखाऊँगा? उनके सामने लज्जित होने से तो यही अच्छा है कि मैं प्राण दे दूँ।
मन में यह विचारकर वे रसोई घर से छुरी उठा लाए और चाहा कि गला काट लें कि उसी समय भगवान प्रकट हो गए और एक हाथ से नामदेव जी का छुरी वाला हाथ पकड़कर दूसरे हाथ से कटोरा उठाया और दूध पीने लगे। इस प्रकार अपने अविचल विश्वास के कारण वे भगवान को साक्षात् प्रकट करने में सफल हो गए।
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