विनय से बढ़कर कुछ नहीं
बहुत समय पहले नदी और वायु में घनिष्ठ मित्रता थी। दोनों हिमालय से सागर तक की यात्रा साथ-साथ करते थे। एक बार दोनों सागर के तट पर किसी विषय पर चर्चा कर रहे थे। चर्चा करते-करते अचानक दोनों में विवाद शुरु हो गया। सागर ने जब उनके बीच विवाद होते देखा तो उसे बहुत आश्चर्य हुआ। जाकर देखता हूँ कि झगड़े की जड़ क्या है? ऐसा विचार कर सागर उन दोनों के पास आया और पूछा,"' क्या बात है? क्यों तुम दोनों मूर्खों की तरह झगड़ रहे हो?''
सागर की बात सुनकर पहले तो दोनों ने उसे प्रणाम किया, फिर नदी बोली-श्रीमान्! अच्छा हुआ आप आ गए। आप हमसे अनुभवी और बड़े हैं। आप ही हमारा विवाद सुलझा सकते हैं। हमारे बीच विवाद शक्ति को लेकर है। मैं कहती हूँ कि मैं वायु से ज्यादा शक्तिशाली हूँ, लेकिन वायु मेरी बात नहीं मान रहा है। अब आप ही बताएं मेरे विकराल रूप का भला कोई सामना कर सकता है? मैं चाहूँ तो सब कुछ बहाकर ले जा सकती हूँ।
इसके पहले कि सागर कुछ कहता, वायु बीच में ही बोल पड़ा,""किस आधार पर तुम अपने को शक्तिशाली कहती हो। तुम्हारी तो अपनी सीमाएँ हैं। तुम एक निश्चित दायरे में ही अपनी शक्ति का प्रदर्शन कर सकती हो, जबकि मैं तो सर्वव्यापी हूँ। मैं आँधी-तूफान पैदा कर अपने प्रचंड वेग से सारी सृष्टि को तहस-नहस कर सकता हूँ। कोई अज्ञानी भी इस बात का फैसला कर सकता है कि कौन अधिक शक्तिशाली है?
सागर ने दोनों की बात को ध्यान से सुना और उसे समझते देर नहीं लगी कि इन दोनों को अपनी शक्ति पर अहंकार हो गया है। यदि इनका विवाद अभी सुलझाया नहीं गया तो ये अपनी शक्ति का प्रदर्शन कर जान-माल को हानि पहुँचाएंगे। वह विचारमग्न हो गया, क्या किया जाए? अचानक उसकी दृष्टि घास पर पड़ी और उसे तुरंत एक उपाय सूझा। वह बोला, ""अधिक शक्तिशाली का निर्णय तो प्रतियोगिता से ही संभव है। क्या तुम उसके लिए तैयार हो?'' इस पर दोनों तत्काल बोले-हाँ-हाँ, हम तैयार हैं। बताएँ हमें क्या करना है।
सागर बोला-तुम दोनों को मुझे नरम-नरम घास लाकर देनी होगी। विजेता वही होगा जो मुझे घास लाकर देगा। सागर की बात सुनकर उन्हें लगा कि यह तो बहुत आसान काम है। पहले नदी की बारी आई। वह सागर के लिए नरम घास लेने निकल पड़ी। उसने घास को देखते ही अपनी गति बढ़ा दी। लेकिन जैसे ही नदी की लहर घास के नज़दीक आई, घास ने झुककर उसे अपने ऊपर से निकल जाने दिया। फिर क्या था, दोनों के बीच जैसे मुकाबला शुरु हो गया हो। नदी जितना बेग बढ़ाती, घास उतना ही झुक जाती। अंततः नदी थक-हारकर खाली हाथ ही लौट आई।
अब वायु की बारी थी। वायु ने नदी की हालत देखकर पहले ही अपना वेग तेज़ कर दिया। उसकी गति किसी भी तेज़ आँधी-तूफान से ज्यादा थी। बड़े-बड़े पेड़-पौधे उखड़कर गिरने लगे, लेकिन जैसे ही वह घास के पास पहुँचा, घास झुक गई और वायु का झोंका उसके ऊपर से गुज़र गया। इस तरह अनेक प्रयत्नों के बाद भी उसे सफलता नहीं मिली। वायु भी नदी की तरह पराजित होकर वापस आ गया।
अब दोनों हारे हुए खिलाड़ी की तरह सागर के सामने सिर झुकाए खड़े थे। उन्हें देखकर सागर बोला-देखा, तुम तो कितनी बड़ी-बड़ी बातें कर रहे थे। एक नरम घास ने ही तुम्हारे सिर झुका दिए। ऐसा लग रहा है, जैसे तुम उसकी विनम्रता के आगे नतमस्तक हो। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि अब शक्तिहीन हो गए हो। तुम दोनों अभी भी शक्तिशाली हो। बस कमी थी तो विनम्रता की और अब वह तुम्हारे अंदर दिखाई पड़ रही है। सागर की बात सुनकर दोनों उसके कदमों में झुक गए और बोले- आज से आप हमारे गुरु हैं। सागर बोला, नहीं, मैं नहीं, यह घास तुम्हारी गुरु है, जिसने गुरुर तोड़कर तुम्हें सही अर्थों में शक्तिवान बनाया है।
सही कहा सागर ने, विनय के आगे सब झुकते हैं। एक योग्य व्यक्ति जो समर्थ और साधन संपन्न होते हुए भी अहंकारी नहीं होता है वही सही मायनों में विनम्र या विनयशील होता है। इस गुण से आप सभी के चहेते बनते हैं। प्रबंधन ही नहीं, जीवन के हर क्षेत्र में यह उपयोगी है। यह वह गुण है, जो जीवन में आने वाली सभी बाधाओं का सामना करने की शक्ति देता है। कुछ लोग विनम्रता को कमज़ोरी मानते हैं, जबकि यह तो महानता का लक्षण है। झुकते वही हैं, जिनके पास कुछ होता है। इस संबंध में अकसर उदाहरण दिया भी जाता है फल से लदे वृक्षों का। यह सही भी है। आज के जमाने में अगर अकड़ दिखाओगे तो टिक नहीं पाओगे। जो अपने सहयोगियोंं पर रौब दिखाता है, वह दिल नहीं जीत पाता। इसलिए लोगों के बीच यदि अपनी जगह बनानी है यानी आप सुपात्र बनना चाहते हो तो विनयशील बनो। क्योंंकि विनय से ही पात्रता को प्राप्त किया जा सकता है।
हम किसी भी आयु के हों, नम्रता का गुण हमारे अंदर सदैव रहना चाहिए। क्योंकि बड़ों के प्रति यह हमारा "कत्र्तव्य' है, हम उम्रों के प्रति "विनीत' का सूचक और छोटों के प्रति "शालीनता' का परिचायक है। विनयशीलता ऐसा गुण है जिसमें सुरक्षा के साथ ही सफलता भी निहित है। इसलिए जीवन हो या कैरियर, अपनी सुरक्षा चाहते हो तो विनय को साथ लेकर चलो। अतः आज का मंत्र है- ' विनम्र बनो' क्योंकि इससे बढ़कर दूसरा गुण नहीं।
शनिवार, 16 जुलाई 2016
Story
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें (Atom)
"1929 का वो समुद्री राज: आसमान में दिखा विशाल चमकता 'क्रॉस' जिसे विज्ञान ने भी माना अनसुलझा!"
1929: अटलांटिक महासागर का वो 'चमकता क्रॉस' – एक अनसुलझी समुद्री पहेली 1929: अटलांटिक का 'क्रूसिफॉर्म' रहस्य (The Deep Dive)...
-
तुंगुस्का फाइल्स: क्या वह सच में एक एस्टेरॉयड (Asteroid) था या दुनिया से छिपाया गया कोई बड़ा राज? 30 जून 1908, सुबह के 7:17 बजे। साइबेरिया क...
-
1. 1909: रहस्यमयी हवाई जहाजों का आतंक (The New Zealand Airship Wave) 1: इंसानी तकनीक से कोसों आगे बात 1909 की है। उस समय इंसानी हवाई जहाज (A...
-
फ़ातिमा का सच: आस्था का 'चमत्कार' या ब्रह्मांड का कोई 'संकेत'? 13 अक्टूबर 1917 का दिन इतिहास के पन्नों में एक ऐसी रहस्यमयी ...
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें