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शनिवार, 23 जुलाई 2016

जैसा सोचोगे , वैसा बनोगे


     एक बार देवर्षि नारद जी हमेशा की तरह घूमते-घूमते उज्जयिनी पहुँचे। वहाँ उनका एक मित्र रहता था। उन्होने सोचा के बहुत दिन हो गए हैं, क्यों न आज अपने मित्र से भेंट की जाए। जब वे मित्र के घर पहुँचे तो उसे पहचान ही नहीं पाए। जब पहचाने तो बोले-मित्र! यह क्या दशा बना रखी है? जब हम पिछली बार मिले थे, तब तुम हट्टे-कट्टे  नौजवान थे। और अब अपने शरीर को देखो, जैसे सूखकर काँटा हो गए हो। इसका कारण क्या है?
     इस तरह नारद ने उस पर प्रश्नों की बौछार कर दी। जब नारद के सभी प्रश्न खत्म हो गए तो वह बोला-मित्र! तुम सही कहते हो। लेकिन अब वे दिन लद गए जब मैं जवान था, कुँवारा था। अब मैं शादीशुदा हूँ, बाल-बच्चेदार हूँ। मेरी आर्थिक स्थिति भी ठीक नहीं रही। घर-गृहस्थी की ज़िम्मेदारी में आदमी की हालत ऐसी ही हो जाती है। परन्तु तुम मेरी बातों को कैसे समझोगे, तुम तो ब्राहृचारी हो। सांसारिक परेशानियों से तुम्हारा क्या लेना-देना। खैर, छोड़ो, और बताओ कैसे आना हुआ? उसकी बात का नारद ने कोई उत्तर नहीं दिय। वे मित्र की हालत देखकर व्यथित थे और उसकी सहायता करना चाहते थे। लेकिन उनके पास उसे देने के लिए कुछ नहीं था। अचानक उन्हें एक उपाय सूझा। वे बोले-ये सब चलता रहेगा। चलो हम स्वर्गलोक घूमकर आते हैं।
     इस पर वह बोला- लेकिन, मेरी पत्नी और बच्चे। नारद बोले-कुछ समय के लिए उन्हें भूल जाओ। थोड़ा समय अपने मित्र के साथ भी तो बिताओ। हम दोनों जल्दी ही लौट आएँगे। नारद की बात पर वह सहमत हो गया और दोनों स्वर्गलोक में पहुँचे। वहाँ एक अत्यंत खूबसूरत बाग था। नारद उसे एक वृक्ष के नीचे इंतज़ार करने को कहकर देवराज इंद्र के महल में चले गए। नारद जी के जाने के बाद वह वहाँ के सौंदर्य को निहारने लगा। जब बहुत देर हो गई और नारद जी नहीं लौटे तो वह बैठा-बैठा थक गया। अचानक उसके मन में एक विचार उठा-इतनी सुंदर जगह पर यदि बिस्तर भी होता तो लेटने में कितना आनंद आता। उसका विचार अभी पूरा भी नहीं हुआ था कि उसने देखा कि वह एक आरामदायक बिस्तर पर लेटा हुआ है। अपने आपको बिस्तर पर पाकर वह आश्चर्यचकित हुआ लेकिन फिर उसने सोचा कि यह स्वर्ग है, शायद कोई चमत्कार हुआ होगा।
     कुछ समय बाद उसके मन में विचार आया कि काश! कोई आकर मेरे पैर दबा दे तो कितना आराम मिले। पलक झपकते ही वहाँ कई सुंदर अप्सराएँ आ गर्इं। कोई उसके हाथ दबाने लगी तो कोई पाँव। कुछ देर तो वह आनंद में रहा, लेकिन अचानक उसे विचार आया कि यदि मेरी पत्नी यह सब देख ले तो वह निश्चित ही मुझे पीटने लगे। फिर क्या था, उसकी बीबी सामने खड़ी थी हाथ में बेलन लिए। उसने उसके विचार के अनुसार पीटना भी शुरू कर दिया। वह बीबी से डरकर भागा तो सामने से नारद जी आ रहे थे। वे अंदर से छुपकर सब देख रहे थे। दरअसल वे जान बूझकर उसे कल्पवृक्ष के नीचे बैठाकर गए थे ताकि वह अपनी सभी मनोकामनाएं पूरी कर ले और वे उसे वापिस उसके घर छोड़ आएँ। नारद उससे बोले-बड़े ही मूर्ख हो तुम। सोचना ही था तो कुछ अच्छा सोचते जिससे तुम्हारा और तुम्हारे परिवार का कल्याण होता। यहाँ सोचा भी तो बीबी से पिटने के बारे में। स्वर्ग में बैठकर भी तुम्हारी सोच नहीं बदली। मैं पहले ही कह रहा था कि कुछ समय के लिए अपनी परेशानियों को भूल जाओ। यदि भूल जाते तो शायद तुम्हें इस तरह भागना नहीं पड़ता।
     नारद के उस मित्र जैसी हालत उन सभी लोगों की होती है, जो अपने घर की परेशानियों को आफिस और आफिस की परेशानियों को घर ले जाते हैं। या फिर इसे इस तरह समझें कि हम परेशानियों का बोझा इस तरह से ढोते हैं कि हम कहीं भी जाएं, वे हमारा पीछा नहीं छोड़तीं। इससे न केवल हम खुद परेशान रहते हैं, बल्कि अपने आसपास के माहौल को भी तनाव भरा बना देते हैं। इसलिए हमें इस प्रवृत्ति पर काबू पाना ज़रूरी है, वरना यह विक्रम के बेताल की तरह पीठ पर लदी हर जगह पहुँच जाएगी। अतः जहाँ की चीज़ हो, उसे वहीं तक सीमित रहने दो। आफिस से निकलो तो वहां की परेशानियाँ भूलकर और घर से निकलो तो घर की।
     दूसरी बात, नकारात्मक विचारों से सफलतता मिलना उतना ही असंभव है, जितना कि बबूल के पेड़ पर आम का लगना। हम अपने नकारात्मक विचारों के जाल में इस तरह उलझते जाते हैं कि चाहकर भी उससे मुक्त नहीं हो पाते। केवल सोच की वजह से ही वह व्यक्ति उस स्थान से खाली हाथ लौट आया, जहाँ पर उसे दुनियाँ भर की खुशियाँ मिल सकती थी। इसलिए जीवन में आगे बढ़ने की सोच रहे लोगों के लिए यह ज़रूरी है कि पहले अपनी सोच का दायरा बढ़ाएँ क्योंकि सोच में इतनी शक्ति होती है कि आप जैसा सोचते हैं, वैसा ही बन सकते हैं। यानी कल्पवृक्ष स्वर्ग में नहीं, हमारे भीतर ही है जो मन में उत्पन्न विचारों के अनुसार फल देता रहता है। इसलिए ज़रूरी है कि आप विचारों को नियंत्रित करें, विचार आपको नहीं।
 

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