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गुरुवार, 14 जुलाई 2016

Story

भक्त रघु केवट


जगन्नाथ पुरी भारत का एक प्रसिद्ध तीर्थ है। जगन्नाथपुरी से लगभग तीस किलोमीटर की दूरी पर एक गाँव है-पीपलीचटी। भक्त रघु उसी ग्राम का निवासी था। परिवार में उसके अतिरिक्त उसकी पत्नी और वृद्धा माता थी। रघु का यह नित्यप्रति का नियम था कि सुबह सवेरे ही जाल उठाता और मछलियां पकड़ने के लिए घर से निकल जाता। पकड़ी हुई मछलियों को बेचकर वह अपने परिवार का पालन करता था। कर्मों का हिसाब-किताब भी कुछ अजीब है। पता नहीं कौन से पापकर्मों के परिणामस्वरुप उसे मछुआरे के घर में जन्म लेना और मछली पकड़ने का यह धन्धा करना पड़ा था। दूसरी ओर ऐसे परिवार में जन्म लेने के उपरान्त भी रघु के ह्मदय में भगवान की भक्ति थी जो केवल पूर्व जन्मों के पुण्य संस्कारों के फलस्वरुप ही प्राप्त होती है। इस भक्ति के संस्कारों के कारण वह हर समय भगवान के पवित्र नाम का जाप करता रहता था। भक्ति के संस्कारों के कारण ही उसका ह्मदय भी अत्यन्त कोमल था। जब वह मछलियाँ पकड़ने के लिए जाल फेंकता और उसके जाल में फँसकर मछलियां तड़पने लगतीं, तो उसका ह्मदय द्रवित हो जाता और मन ही मन वह बहुत ही व्याकुल हो जाता। अपने इस धन्धे पर, जिसमें उसे नित्यप्रति ही अनेकों जीवों की हत्या करनी पड़ती थी, उसे बहुत ही ग्लानि होती। वह इस धन्धे को छोड़ने की सोचता, परन्तु अन्य कोई काम वह जानता नहीं था, अतः अपने और परिवार के पालन-पोषण की समस्या उसके सामने खड़ी हो जाती जिससे वह फिर मछलियाँ पकड़ने के लिये बाध्य हो जाता।
     एक दिन एक सन्त उधर आ निकले, जहाँ तालाब पर रघु मछलियाँ पकड़ने में व्यस्त था। रघु के संस्कार देखकर उन्होंने उसे नाम-दीक्षा दे दी। अब रघु प्रातः स्नान आदि से निवृत्त होकर विधि अनुसार नाम का सुमिरण करने लगा। धीरे-धीरे सत्संग में भी उसकी रुचि बढ़ने लगी,फलस्वरुप जहाँ कहीं भी कथा-कीर्तन होता, वह वहाँ पहुँच जाता। इससे धीरे-धीरे उसके मन की मलिनता धुल गई और वह शुद्ध-निर्मल हो गया। सत्संग के प्रभाव से उसके मन में यह बात भी बस गई कि सभी जीवों में मालिक की ज्योति विद्यमान है। ऐसा निश्चय होने पर उसे अपने धन्धे से घृणा हो गई। अब मछिलयां पकड़ने का यह धन्धा करना उसके लिए असम्भव हो गया, अतएव उसने यह काम छोड़ दिया। घर में जो थोड़ा धन-अन्न संचित था, कुछ ही दिनों में चुक गया, परिणामस्वरुप घर में भूखों मरने की नौबत आ गई। रघु अपनी स्त्री और वृद्धा माता को भूख से व्याकुल देखकर परेशान हो गया। वह भगवान के चरणों में प्रार्थना करने लगा- हे प्रभो! मुझे मार्ग दिखाओ कि ऐसी स्थिति मे मैं क्या करुँ? कैसे सबका पेट भरूँ? मैं स्वयं तो प्राण दे सकता हूँ, परन्तु अपनी पत्नी और वृद्धा माता को भूख से तड़पते हुए कैसे देखूँ?
     अन्ततः माता और स्त्री का दुःख उससे देखा न गया। अन्य कोई उपाय न देखकर उसने पुनः जाल उठाया और मछलियां पकड़ने के लिये तालाब पर जा पहुँचा। यद्यपि इस कार्य को पुनः करने में वह अत्यन्त ग्लानि का अनुभव कर रहा था, परन्तु वह विवश था, क्योंकि अन्य कोई काम उसे आता नहीं था जिससे वह धनोपार्जन कर सके। तालाब पर पहुंचकर उसने भगवन्नाम का सुमिरण करते हुए जाल फेंका। थोड़ी ही देर में लाल रंग की एक बड़ी मछली जाल में आ फंसी। जैसे ही रघु ने जाल बाहर निकाला, वह तड़पने लगी। उसे इस प्रकार तड़पते देखकर रघु का ह्मदय छटपटा उठा, परन्तु फिर तुरन्त ही उसे भूख से तड़पती अपनी वृद्धा माता तथा पत्नी की याद हो आई। उसने अपना जी कड़ा किया और मछली को हाथों में पकड़कर कहने लगा-हे मत्स्य रुप में भगवान! मैं तुमको मारना नहीं चाहता, परन्तु क्या करुँ। तुम्हीं ने मुझे मछुआरे के घर जन्म दिया है, जिनका धंधा ही मछलियां पकड़ना है। मैने भी बचपन से केवल यही काम अपने पूर्वजों से सीखा है, अन्य कोई काम मुझे आता ही नहीं। अतः पेट भरने के लिए जीव-हत्या करने के लिए मैं विवश हूँ, मुझे क्षमा करना।
    रघु ने ये शब्द कहे थे कि उसे मछली के अन्दर से यह आवाज़ आती हुई सुनाई दी-नारायण! मेरी रक्षा करो, रक्षा करो। यह आवाज़ सुनते ही रघु स्तब्ध रह गया। मछली की करुण पुकार ने उसका ह्मदय परिवर्तित कर दिया। उसे ऐसा प्रतीत हुआ मानो मछली के अन्दर से स्वयं भगवान ही बोल रहे हों, फलस्वरुप हर्षातिरेक से उसका रोम-रोम हर्षित हो उठा। उसने तुरन्त ही मछली को तालाब में छोड़ दिया। मछली को पुनर्जीवन मिला। उसकी सारी छटपटाहट समाप्त हो गई। खुशी से भरी हुई वह जल में तीव्र गति से तैरने लगी-कभी नीचे जाती, कभी ऊपर आती, कभी दायें घूमती, कभी बायें। यह देखकर रघु प्रभु-प्रेम में ऐसा डूब गया कि उसके दोनों नेत्रों से अश्रुधारा प्रवाहित होने लगी। वह वहीं बैठा-बैठा भगवान के चरणों में प्रार्थना करने लगा। प्रभो! मछली के भीतर से तुम्हीं ने मुझे "नारायण' का मधुर नाम सुनाया है। अब या तो दर्शन दो या प्राण लो। जब तक मुझे दर्शन नहीं होंगे, मैं यहाँ से नहीं उठूँगा, यह मेरा प्रण है।
     प्रेम में वह इस बात को पूरी तरह भूल गया कि वह स्वयं तो कई दिन से भूखा है ही, उसकी माता और स्त्री भी घर में कई दिन से भूख से तड़प रही हैं। उस समय उसकी वृत्ति पूरी तरह भगवान में केन्द्रित हो गई थी। रघु को बैठे-बैठे तीन दिन हो गए। वह प्रेम में मग्न नेत्र मूंदे निरन्तर प्रभु-नाम का सुमिरण करने में तल्लीन था। इन तीन दिनों में उसने जल भी ग्रहण नहीं किया। ऐसे प्रेमी से फिर भगवान कब तक दूर रहते। वे एक ब्रााहृण के वेष में वहाँ प्रकट हो गए और रघु को कंधे से झकझोरते हुए उच्च स्वर में बोले-अरे! तुम कौन हो जो यहाँ इस निर्जन स्थान पर बैठे हुए आँसू बहा रहे हो? तुम्हारा नाम क्या है और कहाँ के रहने वाले हो? ब्रााहृण की आवाज़ से रघु का ध्यान टूटा और उसने आँखें खोलीं। सामने एक ब्रााहृण को खड़े देखकर उसने दोनों हाथ जोड़कर प्रणाम किया, फिर बोला-महाराज! मेरा नाम और धाम पूछकर आप क्या करेंगे? आपको मुझसे क्या लेना-देना है? आप अपने रास्ते जाइये और मुझे मेरे हाल पर छोड़ दीजिए।
     ब्रााहृण ने मुसकराते हुए कहा-मैं तो अपने रास्ते चला ही जाऊँगा, परन्तु तुम ज़रा इस बात पर तो विचार करो कि क्या मछली भी कभी मनुष्य की बोली बोल सकती है? तुम इस भ्रम में क्यों पड़े हो कि मछली में से स्वयं भगवान ही बोले हैं? मछली में भी कभी भगवान मौजूद हो सकते हैं? मछली तो एक साधारण जीव है। जब मछली में भगवान हैं ही नहीं, तो तुम्हें उनके दर्शन कैसे हो सकते हैं? इस भ्रम को त्यागो और घर वापस जाओ, यहाँ बैठकर अपना समय व्यर्थ मत करो। ब्रााहृणरुपधारी भगवान की बातें रघु बड़े ध्यान से सुन रहा था। वह सोचने लगा कि इस ब्रााहृण को मछली वाली बात कैसे पता चली। हो न हो, ये मेरे भगवान ही हैं, जिन्होंने ब्रााहृण का रुप धारण कर रखा है। वह हाथ जोड़कर कहने लगा-मछली की बात आपको कैसे पता चली? आप अवश्य ही भगवान हैं। मैने चूँकि अनेकों जीवों की हत्या करके बहुत पाप किये हैं, इसीलिए आप ब्रााहृण वेष में यहाँ पधारे हैं। नाथ! मेरे पापकर्मों की ओर न देखकर अब शीघ्र ही मुझे दर्शन देने की कृपा करें। यह कहते हुए और नेत्रों से जल प्रवाहित करते हुए वह ब्रााहृणरुपधारी भगवान के चरणों में लिपट गया। रघु की ऐसी प्रेमभरी अवस्था देखकर भगवान साक्षात् चतुर्भुज रुप में उसके सामने प्रकट हो गए। भगवान के दर्शन कर रघु का जीवन धन्य हो गया।
     तत्पश्चात् भगवान ने उसे भक्ति का आशीर्वाद दिया और वर माँगने को कहा। रघु ने हाथ जोड़कर विनय की-प्रभो! आपने अपने योगि-दुर्लभ दर्शन देकर और भक्ति का आशीर्वाद देकर सभी कुछ तो मुझे दे दिया,अब बाकी क्या रहा। फिर भी एक वरदान माँगता हूँ। वह यह कि मछुआरे के परिवार में जन्म लेने के कारण मछलियाँ पकड़ना ही मेरा पैतृक धंधा है। आप मुझे यही वरदान दें कि मेरा यह धंधा छूट जाए ताकि मेरे द्वारा किसी जीव की हिंसा न हो। हर समय मैं आपका भजन-सुमिरण-ध्यान करता रहूँ और आपका स्मरण-ध्यान करते हुए ही मेरा शरीर छूटे। भगवान ने रघु को आशीर्वाद देते हुए कहा ""तथास्तु'' और फिर अन्तर्धान हो गए।
     अब रघु की जीवन-धारा ही बदल गई। वह भगवान के नाम का उच्च स्वर से जाप करते हुए घर आया। उसकी बिरादरी के वयोवृद्ध लोग उसे डाँटने लगे कि वह इस प्रकार अपनी वृद्धा माता और स्त्री को अनाथ छोड़कर किधर चला गया था। यदि गाँव के लोग इनके भोजन का प्रबन्ध न करते, तो दोनों भूख से तड़प-तड़पर कर मर जातीं। अब आगे से ऐसा मत करना।
     गाँववालों ने उसकी वृद्धा माता तथा स्त्री के लिए भोजन का प्रबन्ध किया, रघु ने इसे भगवान की कृपा ही माना। अब वह प्रातः उठकर और नित्यकर्म से निवृत्त होकर भगवान का भजन करता, तत्पश्चात् कीर्तन करता हुआ गाँव में घूमता। भगवान की प्रेरणा से बिना मांगे ही लोग उसे भोजन-वस्त्र आदि दे देते, जिससे उसका तथा उसके परिवार का भरण-पोषण बड़ी सुगमता से होने लगा। उसकी माता तथा उसकी स्त्री भी अब भजन-सुमिरण करने लगीं। रघु तो हर समय ही भगवान के भजन-ध्यान में लीन रहने लगा। नाम-जप करते करते वह प्रायः तन-बदन की सुधि को बैठता।
     एक दिन रघु जब भजन-ध्यान में लीन था, उसे ऐसा लगा मानो भगवान श्री जगन्नाथ उससे भोजन माँग रहे हैं। उसने घर में जो रुखा-सूखा भोजन था, थाली में रखा और झोंपड़ी का द्वार अन्दर से बन्द करके भोजन ग्रहण करने के लिए भगवान के चरणों में प्रार्थना करने लगा। भक्त के प्रार्थना करने पर भगवान तुरन्त वहाँ प्रकट हो गये। और भक्त रघु के हाथ से भोग लगाने लगे,क्योंकि भगवान तो प्रेमी भक्त की भावना पर ही रीझते हैं, स्वादिष्ट पक्वान्नों पर नहीं।
     इधर भगवान अपने प्रेमी भक्त रघु की झोंपड़ी में भोग लगा रहे थे, उधर उसी समय पुरी में भगवान श्री जगन्नाथ जी के भोग-मण्डप में पुजारी ने भोग का थाल सजाया जिसमें अनेक प्रकार के भोज्य-पदार्थ थे। यह भोग-मण्डप भगवान श्री जगन्नाथ जी के मन्दिर से अलग है, जहां एक दर्पण लगा हुआ है। उस दर्पण में भगवान श्री जगन्नाथ जी के श्री विग्रह का प्रतिबिम्ब पड़ता है। उसी प्रतिबिम्ब को नैवेद्य चढ़ाया जाता है। पुजारी जब भोग लगाने लगा,तो यह देखकर हैरान रह गया कि दर्पण में प्रतिबिम्ब नहीं पड़ रहा है। भगवान श्री जगन्नाथ जी के श्री विग्रह तथा दर्पण के मध्य कोई रुकावट भी नहीं थी और दर्पण भी यथावत् अपने स्थान पर रखा था, फिर भी उसमें श्री विग्रह का प्रतिबिम्ब नहीं पड़ रहा था। पुजारी ने बार-बार आँखें मलीं, परन्तु फिर भी जब उसे प्रतिबिम्ब दिखाई न दिया, तो वह घबरा गया। वह तुरन्त भागा-भागा पुरी नरेश के पास गया और दर्पण में श्री विग्रह का प्रतिबिम्ब न पड़ने की सूचना देते हुए बोला-राजन्! नैवेद्य में कुछ दोष मालूम पड़ता है, तभी भगवान श्री जगन्नाथ जी उसे स्वीकार नहीं कर रहे हैं। अब जैसा आपका आदेश हो, वैसा ही किया जाए।
     पुरी-नरेश भी अत्यन्त भक्ति-भाव सम्पन्न थे। वे तुरन्त मन्दिर में पहुँचे। अभी भी भगवान का प्रतिबिम्ब दर्पण में नहीं पड़ रहा था। भोग का थाल चूँकि नरेश की ओर से ही जाता था, अतः उन्हें बहुत दुःख हुआ। वह कहने लगे-न जाने मुझसे अनजाने में क्या अपराध हो गया है, जो भगवान आज भोग स्वीकार नहीं कर रहे हैं। दुःखी ह्मदय से वह पश्चाताप करते हुए गरुड़-ध्वज के पास जाकर भूमि पर लेट गये। लेटते ही भगवान की प्रेरणा से उन्हें झपकी आ गई। स्वप्न में क्या देखते हैं कि भगवान उन्हें सम्बोधित करके कह रहे हैं-राजा! तुम दुःखी मत हो, तुम्हारा कोई अपराध नहीं है। मैं पुरी में हूँ ही नहीं, तो प्रतिबिम्ब किसका पड़े। मैं तो इस समय पीपलीचटी ग्राम में अपने प्रेमी भक्त रघु केवट की झोंपड़ी में मौजूद हूँ और उसके हाथ से भोजन कर रहा हूँ।  यदि तुम मुझे यहाँ बुलाना चाहते हो तो फिर मेरे भक्त को उसके परिवार सहित यहां ले आओ और उसके
रहने तथा भोजनादि की सब व्यवस्था कर दो।
     पुरी नरेश की नींद टूटी। वे तुरन्त अपने कुछ सेवकों को साथ लेकर पीपलीचटी ग्राम पहुँचे और पूछते-पूछते रघु केवट की झोंपड़ी पर जा पहुँचे। द्वार अन्दर से बन्द था। सेवकों के कई बार पुकारने पर भी जब द्वार न खुला, तो उन्होंने बल लगाकर द्वार खोल दिया। नरेश अन्दर प्रविष्ट हुए, परन्तु अन्दर का दृश्य देखते ही भौंचक्के रह गये। क्या देखते हैं कि रघु प्रेम में मग्न है और उसके सामने अलौकिक प्रकाश फैला हुआ है। तभी वह अलौकिक प्रकाश लुप्त हो गया। रघु जल-विहीन मछली की तरह व्याकुल हो छटपटाने लगा। यह देखकर पुरी-नरेश को रोमांच हो आया। उन्होंने भक्त रघु को कन्धेे से हिलाते हुए पुकारा-रघु! रघु! आवाज़ सुनकर रघु को चेत हुआ। पुरी नरेश को सम्मुख देखकर वह उनके पैर छूने के लिए झुका, परन्तु नरेश ने शीघ्रता से उसे अपने सीने से लगा लिया और बोले-पैर तो मुझे तुम्हारे स्पर्श करने चाहियें, क्योंकि तुम भगवान के प्यारे हो और तुम पर भगवान की असीम कृपा है।
     तत्पश्चात् नरेश ने समस्त वृत्तान्त भक्त रघु को कह सुनाया। भगवान की मौज समझकर रघु ने पुरी जाना स्वीकार कर लिया। अपनी वृद्धा माता तथा पत्नी के साथ जैसे ही रघु पुरी पहुँचा, भोग-मण्डप में रखे दर्पण में भगवान श्री जगन्नाथ जी का प्रतिबिम्ब पड़ने लगा। पुरी-नरेश ने मन्दिर से दक्षिण की ओर भक्त रघु तथा उसके परिवार के रहने आदि का सब प्रबन्ध कर दिया। भक्त रघु, उसकी माता तथा उसकी स्त्री ने अपना शेष जीवन वहीं रहकर भगवान का भजन-सुमिरण करते हुए व्यतीत किया और इस प्रकार तीनों ने अपना मानुष जन्म सफल किया।
     इसलिए हमारा कत्र्तव्य है कि अपने जीवन को भजन सुमिरण में लगाकर यह जन्म भी सफल करें और प्रभु की प्रसन्नता प्राप्त करके अपना परलोक भी संवार लें।

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