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गुरुवार, 14 जुलाई 2016

BHAGAT KUBA STORY

भक्त कूबा जी (प्रेम भक्ति का आदर्श)

     प्रेम अपने आपमें अति पवित्र वस्तु है। प्रेम आकाश और अग्नि के समान सर्वदा ही निर्मल और विशुद्ध रहता है। प्रेम के आसन पर काम-क्रोध-लोभ-मोह और अहंकारादि में से किसी का भी अधिकार नहीं है। इनमें से किसी ने भी प्रेम के व्यापार में हस्तक्षेप किया तो प्रेमी इनको रौंद कर आगे बढ़ जाता है। यदि कोई इन में से वहां आ टपके तो वहां प्रेम न होकर कुछ और बन जाएगा। उसे मोह-आसक्ति-लगाव जैसा नाम दे देंगे। प्रेम और कामना इन दोनों का कोई साहचर्य नहीं। प्रेम सदा ही निष्काम होता है। प्रेम में देना ही देना, त्याग ही त्याग और नित्य प्रसन्नता निवास करती है। प्रेम में प्रतिशोध लेने का कोई भाव नहीं रहता।
     आकाश से बरसता हुआ जल जैसे स्थान भेद के अनुसार अलग अलग नाम धारण कर लेता है जैसे ताल-तलैया-कूप-सरिता-झील सरोवर का पानी-वैसे ही प्रेम भी पात्र-भेद के अनुसार अनेक नामों से पुकारा जाता है। प्रेम जब माता-पिता के हाथों से सन्तान को दिया जाता है इसका नाम "वात्सल्य' हो जाता है। छोटों के प्रति प्रेम दर्शाया जाय तो वह "स्नेह' कहता है। बड़ों के लिये प्रेम किया हुआ "आदर' नाम ले लेता है। गुरुजनों को प्रकट किया हुआ प्रेम "श्रद्धा' का रुप ले लेता है और यही प्रेम जब सांसारिक पदार्थों को छोड़कर भगवान की ओर अथवा परमेश्वर-स्वरुप श्री सद्गुरु देव जी के चरणों में किया जाता है उसे "भक्ति' का नाम दे देते हैं।
     प्रेम की भावना प्रत्येक प्राणी के ह्मदय देश में किसी न किसी कोनेमें दुबकी पड़ी होती है। प्रेम ही आनन्द है। घृणा करने वाला पुरुष कभी किसी को प्रिय नहीं लगता। भक्ति का लक्षण ही यह है कि वह हर एक चराचर से प्यार करे। प्रेम से ही भगवान् की प्राप्ति होती है। प्रेमी ही परमात्मा को अति प्रिय होता है। गीता में भगवान् स्वयं फरमाते हैं किः-
""यो मद् भक्तःस मे प्रियः''--मेरा भक्त मुझ को प्रिय है।
""भक्तिमान्मे प्रियो नरः-'' -- भक्त पुरुष मुझे प्रिय है।
     हर एक जीव के अऩ्दर प्रेम की भावना विद्यमान है। इसी प्रेम की कीली पर समस्त विश्व चक्र घूम रहा है। जब प्रेम की लहरें मन में हिलोरें लेती हैं तो चित्त आनन्द में झूम उठता है। प्रेम एक ऐसी वीणा है जिसके मधुर ताल पर ही जीव अपने तन-मन व धन को न्यौछावर कर देता है। यही मनुष्य को जीना सिखाता है। शर्त यह कि प्रेम की धारा उचित दिशा की तरफ बहती हो। जिस सौभाग्यशाली जीव की प्रेम सरिता अपने इष्टदेव के चरणों में बहती हो वह अपने जीवन को पवित्र बना लेता है। विश्व को निर्मल करता है और जन समाज का पथ प्रदर्शक बन जाता है। मालिक की ओर अनन्य भाव से किया हुआ प्रेम ही भक्ति कहलाता है और ऐसा भक्त पुरुष ही प्रभु को सर्वदा प्रिय लगता है। ऐसे प्रेमी भक्त जनों की गाथाएँ ही विश्व के साहित्य को पवित्र करने वाली होती है। ऐसे ही एक भक्त की कहानी पाठकों के कल्याण के लिये यहाँ दी जाती है।
     राजपुताने के किसी ग्राम में कूबा नाम के एक भक्त रहते थे। कूबा जी जाति के कुम्हार थे। परिवार में आपकी केवल "पुरी' नाम की धर्मशीला पत्नी थी। मिट्टी के बर्तन बनाकर बेचना उन का पैतृक व्यवसाय था। सौभाग्य से आपको महापुरुषों की संगति प्राप्त हो गई। तब से वे थोड़ा समय व्यवहार में देकर जीवन निर्वाह करते और अधिक समय सन्तों के सत्संग व उनकी सेवा शुश्रुषा में लगाते। हर्ष-शोक, लोभ व चिन्ता आदि से वे मुक्त थे। वे सदा ही आनन्द मग्न रहते। गृह पर आये हुए सन्त महात्माओं की सेवा करने में भी उन्हें बड़ी रुचि थी। उनकी इस निष्काम भक्ति और सन्त सेवा के कारण उनका यश चारों ओर फैल गया। कुछ ईष्र्यालु लोग उनकी कीर्ति को सहन न कर सके यद्यपि उन्हें इस बात का कोई दुःख न था।
     भक्त वत्सल भगवान् अपने भक्त कूबा जी के द्वारा भक्ति का प्रचार कराना चाहते थे। आपने इसके लिये एक लीला रची। दो साधुओं का एक दल भजन कीर्तन करता हुआ कूबा जी के ग्राम में पहुँचा। साधुओं ने गाँव के लोगों से कहा कि भाइयो! साधुओं की मण्डली भूखी है कोई उदार पुरुष हम लोगों के लिये भोजनादि का प्रबन्ध करा दे तो अच्छा है। ईष्र्यावान् लोगों की बन आई, उन्होने उन साधुओं को भक्त कूबा जी के घर पता बता दिया। परन्तु भगवान तो भक्त के अधीन होते हैं और वे भक्ति की महिमा को और भी बढ़ाते हैं।
     साधु मण्डली कूबा जी के घर पहुंची और वहां जाकर उन्होने  प्रभु नाम की धुन लगाई। प्रभु-प्रेमी कूबा जी नाम-ध्वनि सुनकर पुलकित हो उठे। द्वार पर आई हुई साधु मण्डली को देखकर उन का ह्मदय द्रवित हो गया। आपने सबको साष्टांग दण्डवत् करके कहा-"" आज मेरा अहोभाग्य है जो आप जैसे महानुभावों के दर्शन हुए। कृपा करके कोई सेवा इस दास को दीजिये। महन्त ने कहा कि साधू बड़े भूखे हैं इनके लिये भोजन का प्रबन्ध होना चाहिये। कूबा जी ने उन के आदेश को सहर्ष शिरोधार्य किया परन्तु घर पर तो एक छटांक भर भी अन्न न था। कूबा जी ने मन ही मन अपने इष्टदेव का स्मरण किया। उन्हें एक उपाय सूझा। वे एक महाजन के पास जाकर कहने लगे-""सेठ साहिब! मेरे घर दो सौ महात्मा अतिथि आये हैं उनके लिये भोजन का सामान दीजिये। सामान का मूल्य आप जिस रुप में जितना चाहेंगे मैं सब चुका दूँगा।''
     महाजन ने कूबा जी को निर्धन जानते हुए भी उसे भोजन सामग्री देना स्वीकार कर लिया। परन्तु शर्त यह कि मुझे एक कुँआं खुदवाना है और तुम उसे खोदने में पूरी सहायता करोगे तो मैं इस सामग्री के दाम न लूँगा। भक्त कूबा ने शर्त मान ली और महाजन से सारी रसद आटा-दाल आदि लाकर भोजन तैयार किया। समूची साधू-मण्डली को भोजनादि से तृप्त कर दिया। साधु जन भी प्रसन्न होकर उसे आशीर्वाद देते हुए वहां से विदा हुए।
     अपने वचन के अऩुसार भक्त कूबा जी और उनकी पति परायणा पत्नी पुरी दोनों ही महाजन के कुएं की सेवा में जुट गये। कूबा कूआं खोदता और पुरी मिट्टी बाहर फैंकती। इस प्रकार परिश्रम करते हुए उनको सफलता मिली और कुएं में जल निकल आया। सत्य है ""हिम्मत मर्दां, मददे खुदा'' पानी अत्यन्त मधुर था परन्तु नीचे रेतीली जगह होने से ऊपर की दीवारों को कोई दृढ़ सहारा न रहा-फल यह हुआ कि एक दिन जब कूबा जी नीचे उस कुएं को और अधिक चौड़ा कर रहे थे कि ऊपर की कच्ची दीवारें नीचे धमाके से साथ जा गिरीं। अब तो पत्नी लगी चिल्लाने उसकी चीत्कार सुनकर ग्राम के लोग इक्ट्ठे हो गये। महाजन भी वहाँ आ पहुँचे। कूबा जी मिट्टी के ढेर के नीचे दब गये थे। यह देख सब बड़े ही दुःखी हुए। इतना मलबा हटाने में कई दिन लग जाने थे। लोगों ने समझ लिया कि कूबा जी के जीवित रहने की कोई आशा नहीं। उन्होने भक्त की पत्नी को ढाढ़स दिया और कहा कि यह सब विधाता के खेल हैं। जीव कोई क्या कर सकता है? तुम पतिदेव की आशा छोड़कर भगवान के भजन में लग जाओ। पुरी भी निराश और विवश होकर घर चली गई।
     इतने में भीड़ में से एक ने कहा,"" वह तो बड़ा भक्त था। उस पर ईश्वर का इतना कोप क्यों हुआ?''
दूसरे किसी ईष्र्यालु पुरुष ने कहा कि ""धर्म धर्म चिल्लाने वाले मनुष्यों की यही दुर्गति हुआ करती है।'' तीसरे ने कहा-""रखा क्या है भगवान की भक्ति में।'' इस प्रकार मूर्ख लोग प्रभु की महिमा को न जानते हुए मनमानी चर्चा करने लगे। वे तो पहले ही कूबा जी से डाह किया करते थे परन्तु वह परमात्मा भक्त-वत्सल, न्यायकारी और दयालु हैं। उनकी महिमा का कोई अन्त नहीं। इस सत्यता को वे मन्दमति जीव क्या समझें। सभी लोग कूबा जी को उस दशा में छोड़ कर और उन्हें मरा हुआ मान कर चले गये।
      गाँव के लोग इस दुर्घटना को भूल गये। एक वर्ष भी व्यतीत हो गया। बरसात में  पानी और मिट्टी के बहकर आने से वह गड्ढा भी भर गया। एक बार उधर से कुछ यात्री गुज़रे। रात पड़ जाने से उन पथिकों ने वहीं पर ही डेरा डालने का निश्चय किया। अकस्मात ही आधी रात को उन्हें उसी धरती के अन्दर से करताल-वीणा और मृदंग के साथ हरि कीर्तन करने की ध्वनि सुनाई दी। वे तो विस्मित से हो गये और सारी रात ही उस मधुर संकीर्तन को सुनते रहे। प्रभात होते ही उन लोगों ने रात का सारा का सारा वृत्तान्त गाँव वालों को सुनाया। पहले तो ग्रामवासी माने नहीं परन्तु जब वे वहाँ कुएं पर आये और धरती से कान लगाकर सुनने लगे तो उन्हें भी हरि कीर्तन के स्वर सुनाई दिये। अब तो यह समाचार दावानल की भाँति चारों ओर फैल गया। समीपवर्ती सभी लोग बाल-वृद्ध-तरुण-युवक-नर और नारियां वहां एकत्र होने लगे। नगरी के राजा भी ऐसी अनोखी बात सुनकर अपने मन्त्रिमण्डल सहित वहाँ आ पहुँचे। राजा ने भी वह संकीर्तन-ध्वनि श्रवण की और तुरन्त ही अपने आदमी लगाकर उस मिट्टी को उठाने का आदेश दे दिया। स्वल्प काल में ही सारी मिट्टी हटा दी गई और भीतर का दृश्य जब लोगों की आँखों में आया तो वे चकित रह गये।
     जन समाज ने क्या देखा कि कूबा जी तो समाधि में लीन हैं उनके चारों ओर एक दिव्य प्रकाश फैला हुआ है। प्रतीत ऐसा होता है कि कोई अलौकिक ज्योतिष्पुञ्ज सिंहासन पर समासीन है और आसपास विराजमान दिव्य विभुतियां अपनी सुरीली और निराली स्वर लहरियों से पृथ्वी-आकाश को गुँजा रही हैं। इस असाधारण और अद्भुत छटा को देखकर भक्त जनों के मुख से सहसा ""धन्य धन्य'' की ध्वनि आने लगी और ईष्र्यालु लोगों को भी असीम विस्मय हुआ और उन्होने भी कूबा जी की ऐसी विचित्र लीलाओं को देखकर यह मान लिया कि हम बड़ी भूल पर थे और मन ही मन अपनी अवज्ञाओं के लिये उनसे क्षमा याचना कर ली।
     जन-समूह का कलरव सुनकर कूबा जी के भी नेत्र खुल गये लोगों ने उन्हें बड़ी भक्ति भावना से बाहर निकाला। अब तो सर्वत्र यही चर्चा होने लगी कि ये कोई असाधारण पुरुष हैं और प्रेम भक्ति के अनुकरणीय आदर्श निकले हैं।
     ऐसे सच्चे भक्तों की कथाओं को पढ़-सुनकर मनुष्य में भी त्याग की भावना उत्पन्न होती है कि कैसे भक्त कूबा जी ने अत्यन्त निर्धन होते हुए भी इतनी विशाल साधु-मण्डली के लिए भोजन का प्रबन्ध किया और प्रण के पक्के ऐसे निकले कि प्राणों को संकट में डाल दिया पर कुआं खोदने के व्रत को पूर्ण करने में लगे रहे। निन्दकों की कटु व्यंगोक्तियों को भी ताक पर रखते हुए अपने प्रभु भक्ति के धर्म पर आँच नहीं आने दी। परिणाम यह हुआ कि उनके इष्टदेव जी ने भी उनकी कुएं में पूरी सुरक्षा की जिससे सर्व साधारण पर उनकी एकनिष्ठ प्रेम भक्ति का सिक्का बैठ गया।
     भक्त जब संसार से सब नाते तोड़कर एकचित्तता से अपने इष्टदेव भगवान का बन जाता है तो भगवान भी उसी के हो जाते हैं। भक्त के ह्मदय में किसी प्रकार की सांसारिक अभिलाषा शेष नहीं रहती वह तो एकमात्र प्रभु का प्यार ही चाहता है। सत्य हैः-
बे फनाए ख़ुद मुयस्सर, नेस्त दीदारे ख़ुदा।
मे फ़िरोशद ख़ेशरा, अव्वल ख़रीदारे ख़ुदा।।
     जब तक मनुष्य अपनी अहन्ता का नाश नहीं कर लेता तब तक उसे मालिक का दीदार नहीं मिलता। प्रभु के मिलाप के लिये अत्यावश्यक है कि वह अपने आप को उसके नाम पर मिटा दे। प्रेम भक्ति की मन्ज़िल पर पहुँचने का यही एक सुगम मार्ग है। ""हर उसके हो जात हैं जो हर का हो जाय।

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