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गुरुवार, 14 जुलाई 2016

Story


भक्त पद्मनाभ

     बहुत समय पहले की बात है, चक्रपुष्करिणी नामक तीर्थ-स्थान पर एक ब्रााहृण रहते थे, जिनका नाम था पद्मनाभ। हर समय भगवान का सुमिरण, चिंतन और ध्यान करना, बस! यह उनकेजीवन का ध्येय था और यही दिनचर्या। संसार के प्रति ह्मदय में पूर्ण वैराग्य था। माता-पिता बाल्यकाल में ही भगवान को प्यारे हो गए थे, अतः भक्त पद्मनाभ ने वैराग्य की अवस्था में घर-बार का त्याग कर दिया था। अब उनके लिए धरती बिछौना थी और आकाश ओढ़ने की चादर। खाने को यदि कुछ मिल जाता तो ठीक, अन्यथा पेड़ों के पत्ते खाकर पानी पी लेते। कभी-कभी तो वे बिना खाये-पीये ही रह जाते, क्योंकि भगवान के सुमिरण-भजन में मग्न रहने के कारण उन्हें अपने तन-बदन की भी सुधि न रहती। भगवान का निरन्तर सुमिरण-ध्यान करते करते शनैः शनैः उनकी यह स्थिति हो गई कि भगवान के दर्शनों के लिए वे छटपटाने लगे। इस व्याकुलता की अवस्था में उनके मन में अनेक प्रकार के विचार उठा करते। कभी वे सोचते कि भगवान तो कृपा के सागर हैं, अतः वे मुझ दीन पर अवश्य ही कृपादृष्टि करेंगे और अपने सुन्दर मनोहर दर्शन देकर मुझे कृतार्थ करेंगे। जब वे मुझे दर्शन देंगे तो मैं उनके चरणों पर अपना सिर रख दूँगा और प्रेम के अश्रुकणों से उनके चरण भिगो दूँगा। वे क्षण कितने सौभागी होंगे मेरे लिए। स्वर्णिम अवसर होगा वह मेरे जीवन का। भगवान के दर्शन करके मेरी जन्म-जन्मान्तर की साध पूरी हो जायेगी। यदि भगवान प्रसन्न होकर मुझसे वरदान माँगने को कहेंगे तो मैं भगवान के चरणों में यही विनती करुँगा कि आपके सिवा मुझे कुछ नहीं चाहिए।
     ऐसा सोचते-सोचते भक्त पद्मनाभ प्रेम-विभोर हो जाते, उनका शरीर पुलकित हो जाता और नेत्रों से प्रेंमाश्रुओं की झड़ी लग जाती। प्रेम की यह अवस्था बहुत समय तक बनी रहती और वे संसार को तथा अपने को भूलकर भगवान की याद में निमग्न हो जाते। कभी-कभी ऐसा होता कि बिल्कुल इसके विपरीत विचार उनके मन में उठ खड़े होते और वे सोचने लगते-""कहाँ मुझ जैसा अधम, पापी, मलिन-ह्मदय, साधनहीन मनुष्य और कहाँ पवित्र से भी पवित्र सकल सृष्टि के स्वामी देवाधिदेव भगवान। मुझ जैसे मलिन ह्मदय को भला वे क्यों दर्शन देने लगे? मेरी न तो भक्ति की कमाई है, न जप है, न तप है, न ही संयम और न ही कोई अन्य साधना है, फिर मेरे किस साधन पर रीझ कर वे मुझे दर्शन देंगे? किसी साधना के बिना ह्मदय को पवित्र-निर्मल किए भगवान के दर्शनों की अभिलाषा करना तो दुराशामात्र ही है।'' यह सब सोचकर उनका ह्मदय व्यथा से रो उठता।
     भगवान के दर्शनों के बिना उन्हें अपना जीवन व्यर्थ जान पड़ता। निराशा की यह स्थिति कभी-कभी इतनी कष्टदायक हो जाती कि वे मूÐच्छत होकर गिर पड़ते और मूच्र्छा की अवस्था में ही पुकारने लगते-""हे प्रभो! हे मेरे स्वामी! क्या मुझ अभागे को इस जीवन में आपके दर्शन नहीं होंगे? मैं जैसा भी हूँ, प्रभो!आपका हूँ। क्या आप मुझे नहीं अपनायेंगे?'' वे कई-कई घंटे अचेत पड़े रहते और अचेतनता की इस अवस्था में न जाने क्या-क्या प्रार्थना करते रहते।
     संसार में लोगों की प्रायः यही धारणा है कि बिना कठिन तप के भगवान के दर्शन नहीं होते। और तप का अर्र्थ उनकी दृष्टि में क्या है? ज्येष्ठ के महीने में जबकि गर्मी से धरती तपायमान होती है और लू के झोंके शरीर को झुलसा रहे होते हैं, उस भीषण गर्मी में दोपहर  के समय जब सूर्य अपने पूरे तेज़ पर हो, अपने चारों ओर प्रचंड अग्नि जलाकर बीच में घंटों बैठना अथवा पौष-माघ का महीना हो और भीषण सर्दी पड़ रही हो, उस सर्र्दी की ऋतु में शीतल जल में घंटों खड़े रहकर शरीर को कष्ट देना उनकी दृष्टि में तप है और उनके विचार में ऐसा कठिन तप करके ही भगवान को प्रसन्न किया जा सकता है। किन्तु ऐसे तप से क्या भगवान रीझते हैं? ऋद्धि-सिद्धि तो ऐसे तप से चाहे प्राप्त हो जायें, परन्तु भगवान ऐसी क्रियाओं पर प्रसन्न होते अथवा रीझते कदापि नहीं। भगवान के भजन-सुमिण के बिना जो समय व्यतीत हुआ, उस पर पश्चातापपूर्ण अश्रु बहाना और भगवान के विरह की ज्वाला में अपने मन को जलाना जिससे मनमें विद्यमान सारी मलिनता और संसार की स्म्पूर्ण कामनायें दग्ध हो जाये, केवल-केवल एक भगवान के दर्शनों की लालसा शेष रह जाये-ऐसे तप से भगवान प्रसन्न होते हैं। भक्त पद्मनाभ भी ऐसे ही तप में संलग्न थे। उनकी अवस्था इस तप से इस प्रकार की हो गई थी जैसी कि सन्त दयाबाई जी ने अपनी वाणी में वर्णन की हैः-
जनम जनम के बीछुरे, हरि अब रह्रो न जाय।
क्यों मन कूं दुख देत हो, बिरह तपाय तपाय।।
और एक दिन वह आ भी गया जबकि उनकी यह तपस्या पराकाष्ठा को पहुँच गई। अब उनके लिए भगवान के दर्शन किये बिना जीना असम्भव था। उन्होने ह्मदय की गहराइयों से प्रार्थना की,""हे प्रभो! अब मुझे और अधिक मत तरसाओ। तुम्हारे दर्शन किये बिना अब जीवित रहना कठिन है। तुम्हारे बिना प्रभो! अब यह जीवन विष से भी अधिक कटु मालूम पड़ता है। यदि तुम्हारे दर्शन न हों तो फिर यह जीवन भला किस काम का? इसका तो न रहना ही ठीक है। प्रभो! मुझे संसार की अन्य कोई वस्तु नहीं चाहिए, मुझे केवल तुम्हारे दर्शनों की अभिलाषा है, तुम्हारी भक्ति की इच्छा है। एक बार तुम कह दो प्रभो! कि तुमने मुझे स्वीकार कर लिया, बस! फिर मैं तुमसे कुछ नहीं माँगूँगा। तुम तो अत्यन्त कृपालु हो प्रभो! क्या मुझ दीन पर कृपा नहीं करोगे? एक बार, केवल एक बार मुझ पर कृपा कर दो नाथ।''
     इस प्रकार प्रार्थना करते-करते भक्त पद्मनाभ केनेत्रों से प्रेमाश्रुओं की झड़ी लग गई थी। तभी भगवान वहाँ प्रकट हो गए और वह स्थान एक दिव्यज्योति से आलौकित हो उठा भक्त पद्मनाभ ने देखा,भगवान सामने खड़े मन्द-मन्द मुसकरा रहे हैं और उसे आशीर्वाद दे रहे हैं। भगवान के दर्शन करके भक्त पद्मनाभ का ह्मदय गद्गद हो गया, शरीर पुलकायमान हो गया और वे अपलक नेत्रों से भगवान के दर्शन करने लगे। कुछ देर तक तो वे अपनी सुधबुध भूलकर भगवान के दर्शन करते रहे, फिर भगवान की स्तुति करने लगे। उनकी स्तुति से भगवान अति प्रसन्न हुए। भगवान तो भक्त के ह्मदय की बात भलीभांति जानते थे कि भक्त पद्मनाभ को संसार के भोगपदार्थों की तो बात दूर, मुक्ति की भी इच्छा नहीं है। इसलिए भगवान ने उनसे वरदान मांगने के लिए नहीं कहा, अपितु उन पर कृपावृष्टि करते हुए वचन फरमाये-""हे महाभाग पद्मनाभ! मैं जानता हूँ कि तुम्हारे ह्मदय में केवल मेरे दर्शनों की ही इच्छा है; लोक परलोक में सुखों की, यहँा तक कि मुक्ति-सुख की भी इच्छा तुम्हारे मन में नहीं है। तुम्हें तो मेरी भक्ति में, मेरा सुमिरण-भजन करने में ही सुख मिलता है, अतएव मैं तुम्हें वरदान देता हूँ कि तुम बहुत काल तक भक्ति-भजन और सुमिरण-ध्यान का सुख प्राप्त करके अन्त में मेरे धाम में निवास करोगे। जब तक तुम्हारा जीवन रहेगा, मैं सदा तुम्हारे ह्मदय में रहूँगा, तुम जब चाहोगे, मेरे दर्शन कर सकोगे।'' यह कहकर भगवान अन्तर्धान हो गए। तत्पश्चात् पद्मनाभ भक्ति-भजन में ही अपना एक-एक क्षण व्यतीत करने लगे।
     इस प्रकार कई वर्ष बीत गए। एक दिन वे भगवन्नाम का सुमिरण कर रहे थे कि एक भयंकर राक्षस ने उन्हें दबोच लिया। भक्त पद्मनाभ तो संसार और शरीर से विरक्त थे, अतएव उन्हें अपने शरीर का तनिक भी मोह नहीं था। मरणोंपरान्त किस लोक में और किस योनि में जाना पड़ेगा, इसकी भी उन्हें कोई चिन्ता नहीं थी। फिर भी राक्षस के आक्रमण करने पर वे यह सोच कर चिंतित हो उठे कि राक्षस द्वारा भक्षण कर लिए जाने पर भगवान के सुमिरण-भजन के अलौकिक सुख से वे इसी क्षण वंचित हो जायेंगे। किन्तु भगवान ने तो बहुत काल तक भजन-सुमिरण करने का वरदान दिया था, तो क्या----। वे इसी सोच में थे कि तभी भगवान का
प्रिय आयुध चक्र सुदर्शन अपने पूरे तेज़ से वहाँ प्रकट हो गया।
     वह राक्षस वास्तव में एक गन्धर्व था, जिसका नाम था सुन्दर। सोलह वर्ष पहले महर्षि वशिष्ठ जी के शाप से वह राक्षस हो गया था। बाद में उसके प्रार्थना करने पर महर्षि वशिष्ठ जी ने कहा था-हमारा शाप तो मिथ्या हो नहीं सकता। राक्षस तो तुम्हें बनना ही पड़ेगा, परन्तु आज से सोलह वर्ष बाद तुम भगवान के प्रिय भक्त पद्मनाभ पर आक्रमण करोगे तब सुदर्शन चक्र द्वारा तुम्हारा उद्धार होगा। सोलह वर्ष पूरे हो चुके थे, अतः सुदर्शन चक्र ने उस राक्षस का सिर धड़ से अलग कर दिया और वह राक्षस तत्क्षण गन्धर्व हो गया। उसने सुदर्शन चक्र की स्तुति की और फिर अपने लोक को चला गया।
    तत्पश्चात् भक्त पद्मनाभ ने भी सुदर्शन चक्र की अनेक प्रकार से स्तुति की। सुदर्शन चक्र ने कहा-""भक्तवर! तुम भगवान के प्रिय भक्त हो और भगवान की तुम पर अत्यन्त कृपा है। तुम निर्भय होकर भगवान की पूजा-अर्चना और उनका सुमिरण-भजन करो। अब कोई तुम्हारी पूजा-अर्चना में विघ्न नहीं डालेगा।'' भगवान की कृपा का अनुभव करके भक्त पद्मनाभ आत्मविभोर हो गए और अपना शेष जीवन सुमिरण-भजन में व्यतीत कर अन्त में इस पाँचभौतिक शरीर को त्यागकर भगवान के धाम में चले गए। इस प्रकार उन्होंने अपना मानुष जन्म सफल एवं सकारथ किया। हमें भी चाहिये कि उनके जीवन से प्रेरणा लें और भजन-भक्ति में अपना जीवन व्यतीत कर भगवान की कृपादृष्टि के पात्र बनें।

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