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मंगलवार, 19 जुलाई 2016

ऊँचाई का आधार, श्रेष्ठ मूल्य और संस्कार

ऊँचाई का आधार, श्रेष्ठ मूल्य और संस्कार

बहुत समय पहले की बात है। महाराष्ट्र में किसी जगह एक गुरु का आश्रम था। दूर-दूर से विद्यार्थी उनके पास अध्ययन करने के लिए आते थे। उसके पीछे कारण यह था कि गुरु जी नियमित शिक्षा के साथ व्यावहारिक शिक्षा पर भी बहुत ज़ोर देते थे। उनके पढ़ाने का तरीका भी अनोखा था। वे हर बात को उदाहरण देकर समझाते थे जिससे शिष्य उसका गूढ़ अर्थ समझकर उसे आत्मसात कर सकें। वे शिष्यों के साथ विभिन्न विषयों पर शास्त्रार्थ भी करते थे ताकि जीवन में यदि उन्हें किसी से शास्त्रार्थ करना पड़े तो वे कमज़ोर सिद्ध न हों।
     एक बार एक शिष्य गुरु के पास आया और बोला-गुरु जी! आज मैं आपसे शास्त्रार्थ करना चाहता हूँ। गुरुजी बोले ठीक है, लेकिन किस विषय पर? शिष्य बोला- आप अकसर कहते हैं कि सफलता की सीढिंयाँ चढ़ चुके मनुष्य को भी नैतिक मूल्य नहीं त्यागने चाहिए। उसके लिए भी श्रेष्ठ संस्कारों रूपी बंधनों में बँधा होना आवश्यक है। जबकि मेरा मानना है कि एक निश्चित ऊँचाई पर पहुँचने के बाद मनुष्य का इन बंधनों से मुक्त होना आवश्यक है, अन्यथा मूल्यों और संस्कारों की बेड़ियाँ उसकी आगे की प्रगति में बाधक बनती हैं। इसी विषय पर मैं आपके साथ शास्त्रार्थ करना चाहता हूँ।
     शिष्य की बात सुनकर गुरु जी कुछ सोच में डूब गए और बोले-हम इस विषय पर शास्त्रार्थ अवश्य करेंगे, लेकिन पहले चलो चलकर पतंग उड़ाएं और पेंच लड़ाएँ। आज मकर संक्रान्ति का त्यौहार है। इस दिन पतंग उड़ाना शुभ माना जात है। गुरु जी की बात सुनकर शिष्य खुश हो गया। दोनों आश्रम के बाहर मैदान में आकर पतंग उड़ाने लगे। उनके साथ दो अन्य शिष्य भी थे जिन्होने चकरी पकड़ी हुई थी। जब पतंगे एक निश्चित ऊँचाई तक पहुँच गई तो गुरु जी शिष्य से बोले- क्या तुम बता सकते हो कि ये पतंगें आकाश में इतनी ऊँचाई तक कैसे पहुँची? शिष्य बोला-जी गुरु जी! हवा के सहारे उड़कर ये ऊँचाई तक पहुँच गई। इस पर गुरु जी ने पूछा- अच्छा तो फिर तुम्हारे अनुसार इसमें डोर की कोई भूमिका नहीं है? शिष्य बोला-ऐसा मैने कब कहा? प्रारंभिक अवस्था में डोर ने कुछ भूमिका निभाई है, लेकिन एक निश्चित ऊँचाई तक पहुँचने के बाद पतंग को डोर की आवश्कता नहीं रहती। अब तो और आगे की ऊँचाईयाँ वो हवा के सहारे ही प्राप्त कर सकती है। अब देखिये गुरु जी! डोर तो इसकी प्रगति में बाधक ही बन रही है न? जब तक मैं इसे ढील नहीं दूँगा, यह आगे नहीं बढ़ सकती। देखिए इस तरह मेरी आज की बात सिद्ध हो गई। आप स्वीकार करते हैं इसे?
     शिष्य के प्रश्न का गुरु जी ने कुछ जवाब नहीं दिया और बोले-चलो अब पेंच लड़ाएँ। इसके पश्चात् दोनों पेंच लड़ाने लगे। ऐसा लग रहा था जैसे आसमान में पेंच नहीं लड़ रहे बल्कि दोनों के बीच पतंगों के माध्यम से शास्त्रार्थ चल रहा हो। अचानक एक गोता देकर गुरु ने शिष्य की पतंग को काट दिया। कुछ देर हवा में झूलने के बाद पतंग ज़मीन पर आ गिरी। इस पर गुरु जी ने शिष्य से पूछा-पुत्र! क्या हुआ? तुम्हारी पतंग तो ज़मीन पर आ गिरी। तुम्हारे अनुसार तो उसे आसमान में और भी ऊँचाई को छूना चाहिए था। जबकि देखो मेरी पतंग अभी भी अपनी ऊँचाई पर बनी हुई है, बल्कि डोर की सहायता से यह और भी ऊँचाई तक जा सकती है। अब क्या कहते हो तुम? शिष्य कुछ नहीं बोला। वह शांत भाव से सुन रहा था। गुरु जी ने आगे कहा-दरअसल तुम्हारी पतंग ने जैसे ही मूल्यों और संस्कारों रूपी डोर का साथ छोड़ा, वो ऊँचाई से सीधे ज़मीन पर आ गिरी।
     यही हाल हवा से भरे गुब्बारे का भी होता है। वह सोचता है कि अब मुझे किसी और चीज़ की ज़रूरत नहीं और वह  हाथ से छूटने की कोशिश करता है। लेकिन जैसे ही हाथ से छूटता है, उसकी सारी हवा निकल जाती है और वह ज़मीन पर आ गिरता है। गुब्बारे को भी डोरी की ज़रूरत होती है, जिससे बँधा होने पर ही वह अपने फूले हुए आकार को बनाए रख पाता है। इस तरह जो हवा रूपी झूठे आधार के सहारे टिके रहते हैं, उनकी यही गति होती है।
     शिष्य को गुरु जी की सारी बात समझ में आ चुकी थी और पतंगबाज़ी का प्रयोजन भी। शास्त्रार्थ के इस अनोखे प्रयोग से अभिभूत वह अपने गुरु के कदमों में गिर पड़ा। गुरु जी ने उसे आशीर्वाद देते हुए कहा आज से तुम्हारे जीवन का सूर्य भी उत्तरायण की ओर गति करे और बढ़ते दिनों की तरह तुम जीवन के हर क्षेत्र में उन्नति करो।
     

स्वावलम्बी बनो यानी अपना काम खुद करो

स्वावलम्बी बनो यानी अपना काम खुद करो

     एक बार मनोज नाम का एक व्यक्ति अपने दोस्त राजेश से मिलने शहर आया। दोनों कॉलेज तक साथ पढ़े थे। पढ़ाई के बाद राजेश शहर में आ गया और यहाँ उसने एक छोटे से व्यवसाय से शुरुआत कर कुछ ही वर्षों में एक बड़ा व्यावसायिक साम्राज्य स्थापित कर लिया। उसकी गिनती शहर के धनाढ¬ों में होती थी। शहर की सबसे महँगी कॉलोनी में उसका बहुत बड़ा बंगला था। आज के जमाने की सभी भौतिक सुविधाएँ उसके बंगले में उपलब्ध थीं।
     मनोज जब राजेश के बंगले पर पहुँचा तो रात बहुत हो चुकी थी। वह सोच रहा था कि शायद इतना बड़ा आदमी बनने के बाद उसका दोस्त उसे पहचानेगा या नहीं? लेकिन गार्ड के माध्यम से जब सूचना अंदर पहुँची तो आदेश आया कि उसे ससम्मान अंदर लाया जाए। जब वह अंदर पहुँचा तो देखा कि उसका दोस्त राजेश द्वार पर खड़ा उसकी प्रतीक्षा कर रहा था। राजेश ने बिना कोई औपचारिकता निभाए आगे बढ़कर उसे उसी तरह गले लगा लिया, जिस तरह से वह कॉलेज के जमाने में गले लगा लिया करता था। राजेश के इस तरह के व्यवहार से उसकी झिझक जाती रही और वे प्रसन्नता के साथ अंदर गए।
      इसके बाद दोनों बंगले के अंदर बने बड़े से हॉल में बैठकर बातें करने लगे। इस बीच उसे पता चला कि घर के लोग किसी कार्यक्रम में शामिल होने के लिए शहर से बाहर गए हुए हैं। बातों ही बातों में उसने राजेश से पूछ लिया कि बाकी बातें तो होती रहेंगी, तू तो यह बता कि आखिर यह सब सफलता तुझे मिली कैसे? इस पर राजेश विनम्रता से बोला-पता नहीं यार, मुझे खुद समझ नहीं आता। लेकिन लोग कहते हैं कि मैं किस्मत का बहुत धनी हूँ। शायद वे सही हों। हालांकि मैं ऐसा नहीं समझता। इस पर मनोज तपाक से बोला- वे सही कहते हैं, मैं भी ऐसा ही सोच रहा था। मनोज की बात सुनकर राजेश धीरे से मुस्करा दिया। इसके बाद दोनों ने मिलकर खाना खाया। वहाँ कई नौकर-चाकर होने के बावजूद राजेश ने अपने मित्र को खुद ही खाना परोसा। इसके बाद वे दोनों गेस्ट रूम में आ गए। थोड़ी ही देर में एक नौकर कॉफी बना कर ले आया। राजेश उसे देखकर बड़े ही प्यार से बोला-रामू काका! बहुत रात हो गई है। अब आप लोग जाकर आराम करें। हमें बातें करते-करते देर हो जाएगी।
     इसके बाद राजेश ने आगे बढ़कर ट्रे उठाई और मनोज से कॉफी लेने का आग्रह किया। यह बात मनोज को ठीक नहीं लगी। वह बोला-क्यों तकलीफ करते हो राजेश, मैं खुद ले लेता हूँ। ऐसा कहते हुए वह जैसे ही कॉफी का कप उठा रहा था कि एक झटका लगा और कॉफी ज़मीन पर फैल गई। कुछ बूँदें मनोज के कपड़ों पर भी आ गिरीं। इस पर राजेश बोला-रूको, मैं भीगा कपड़ा लाकर इसे साफ कर देता हूँ, नहीं तो निशान पड़ जाएगा। मनोज ने कहा- परेशान मत हो, मैं खुद साफ कर लेता हूँ। राजेश ने उसे रोकते हुए कहा- नहीं यार, तुम हमारे मेहमान हो। तुम्हारी सेवा करना हमारा धर्म है। मनोज बोला-तो ठीक है, रामू को बुला लेते हैं।
     रामू काका को परेशान नहीं करते। वे अब सोने चले गए हैं। उन्हें जगाना ठीक नहीं। मैं लाता हूँ न एक मिनट में। ऐसा कहकर राजेश कमरे के बाहर जाकर भीगा कपड़ा और साथ में एक पानी की बोतल ले आया। उसने मनोज के कपड़ों पर और नीचे गिरी कॉफी को पोंछकर साफ कर दिया। इससे बाद वह मनोज से बोला- ये है तुुम्हारे लिए पानी की बोतल। रामू काका रखना भूल गए थे। तुम्हें रात में प्यास लगती तो? उसका यह व्यवहार मनोज की समझ से बाहर था। उसने राजेश से कहा-इतना छोटा सा काम तुम जैसे बड़े आदमी को करने की आवश्यकता क्या थी? घर में नौकर-चाकर किसलिए हैं? उसकी बात सुनकर राजेश बोला- क्यों, क्या पोंछा लगाने के बाद अब मैं बड़ा आदमी नहीं रहा। स्वावलंबी होना कोई बुरी बात तो नहीं? याद नहीं, सर कहते थे "स्वावलंबी बनो' इतने छोटे से काम के लिए किसी को नींद से जगाना कहाँ तक उचित है? सिर्फ इसलिए कि वे नौकर हैं। मैने जो किया उसमें मुझे कुछ गलत नहीं लगता। उसके इस उत्तर से मनोज को पता चल चुका था कि उसका दोस्त किस्मत का नहीं, व्यक्तित्व का धनी है जिसकी वजह से आज वह इस ऊँचाई पर पहुँचा है।
     बहुत बढ़िया। राजेश वाकई हर दृष्टि से धनी आदमी है, धन से भी, किस्मत से भी और व्यक्तित्व से भी। स्वावलंबन की भावना उसमें कूट-कूटकर भरी है। साथ ही सफलता के लिए आवश्यक अन्य गुण जैसे बड़प्पन, सह्मदयता, समदृष्टि और संयमित वाणी, अतिथि सत्कार, मित्रता निभाना आदि। उसके इन गुणों का अहसास आपको कहानी पढ़ने के दौरान विभिन्न अवसरों पर हो गया होगा।
     यदि आप भी राजेश की तरह सफल होना चाहते हैं तो इसके लिए हम उसके सर का दिया हुआ "मंत्र' यहां दोहराते हैं कि "स्वावलंबी बनो' यानी अपना काम खुद करो। आप न सिर्फ इस मंत्र को दोहराएँ, बल्कि राजेश की तरह ही आचरण में भी लाएँ। यह आवश्यक है, क्योंकि मंत्र को सुना तो मनोज ने भी था, लेकिन उसने इसे अपने आचरण में नहीं उतारा जिसके कारण वह सफलता की दौड़ में पिछड़ गया। अतः आप इसे अपने अंदर उतारें और फिर देखें इस मंत्र का कमाल

सफलता के लिए प्राथमिकताओं का सही निर्धारण ज़रूरी

सफलता के लिए प्राथमिकताओं का सही निर्धारण ज़रूरी

     एक बार एक शिक्षक से अपनी शिक्षा पूर्ण करने जा रहे विद्यार्थियों ने "जीवन की प्राथमिकताएं और उनके निर्धारण' पर मार्गदर्शन देने का आग्रह किया। शिक्षक ने सभी विद्यार्थियों के अनुरोध को देखते हुए आगामी कक्षा में इस विषय पर मार्गदर्शन का वादा किया। अगले दिन जब शिक्षक कक्षा में आए तो वे अपने साथ काँच का एक मर्तबान और कुछ डिब्बे लेकर आए। सभी छात्र बड़ी उत्सुकता से उनकी ओर देख रहे थे। शिक्षक ने मर्तबान को सामने रखा और एक डिब्बे को खोलकर उसमें रखे बड़े आकार के आँवले मर्तबान में डालने लगे। इसके बाद उन्होने छात्रों से कहा कि मेरे ख्याल से यह मर्तबान अब पूरा भर गया है। उनकी इस बात पर सभी छात्रों ने सहमति जताई।
     शिक्षक ने दूसरा डिब्बा खोला। उस डिब्बे में छोटे आकार के बेर थे। उन्होने मर्तबान को हिलाते हुए बेर उसमें भर दिए। एक स्थिति ऐसी आई कि मर्तबान में और बेर नहीं भरे जा सकते थे, तो उन्होने छात्रों से पूछा कि अब क्या कहते हो? एक छात्र खड़ा हुआ और बोला कि यह अब पूरी तरह भर गया है, इसमें और कुछ नहीं भरा जा सकता।
     छात्र की बात सुनने के बाद शिक्षक ने तीसरा डिब्बा खोला। उसमें राई थी। शिक्षक राई के दाने मुट्ठी में भरकर मर्तबान में डालने लगे। साथ-साथ वे मर्तबान को हिलाते भी जा रहे थे, ताकि आँवले और बेर के बीच शेष स्थान में राई समा सके। छात्र देख रहे थे कि जिस मर्तबान को वे भरा समझ रहे थे, उसमें तो काफी मात्रा में राई भी आ गई है। जब मर्तबान राई से पूरी तरह ठसाठस भर गया तो शिक्षक ने छात्रों से पुनः पूछा कि अब क्या कहते हो?
     एक छात्र खड़ा हुआ और बोला- गुरु जी! अब तो इसमें कुछ भी नहीं भरा जा सकता। यह मर्तबान अब पूरी तरह से भर चुका है। शिक्षक ने छात्र की बात पूरी होते ही पास में रखे बैग में से एक बोतल निकाली। उसमें तेल भरा हुआ था। शिक्षक ने बोतल का तेल मर्तबान में उड़ेलना शुरु किया और देखते-देखते मर्तबान में बहुत सारा तेल समा गया और वह पूरा भर गया। इससे पहले कि शिक्षक छात्रों से प्रश्न करते, पूरी कक्षा ठहाकों से भर गई। शिक्षक ने सभी को शांत करते हुए पूछा कि अब क्या कहते हो? प्रश्न का उत्तर देने के लिए कोई भी विद्यार्थी तैयार नहीं हुआ। अब कोई भी गलत साबित होना नहीं चाहता था। लेकिन इस बार शिक्षक ने कहा कि हाँ, अब यह मर्तबान पूरी तरह भर चुका है। इसमें अब और कुछ समाने की गुंजाइश नहीं है।
     तत्पश्चात् शिक्षक ने कहा, यह मर्तबान क्या है? यह प्रतीक है आपके जीवन का। आँवले हैं आपके जीवन की सर्वोच्च प्राथमिकताएँ। जैसे कि आपका परिवार, आपके बच्चे, आपका स्वास्थ्य, आपके मित्र, आपका ईश्वर, आपके संस्कार और आपके जीवन की वे सभी बातें, जबकि समय के साथ सब कुछ पीछे छूटता जाए, तो भी आप उन्हें नहीं भूलते और न भूलाना चाहते हैं।
     बेर के रूप में हैं आपके जीवन की दूसरी प्राथमिकताएँ। जैसे आपका कॅरियर, आपकी नौकरी, आपका घर, संपत्ति आदि। और राई जीवन की छोटी-छोटी ज़रूरतों, खुशियों, भावनाओं आदि का प्रतिनिधित्व करती हैं, जो प्राथमिकताओं में सबसे नीचे हैं और जिनके होने या न होने से भी आपके जीवन में विशेष प्रभाव नहीं पड़ता।
     आज के प्रतिस्पर्धा के युग में हम सभी शायद अपने मर्तबान को राई से भर रहे हैं और दुःखी हो रहे हैं। इसलिए जब हम जीवन की आँवला रूपी सर्वोच्च प्राथमिकताओं का ध्यान रखेंगे तो इससे प्राप्त होने वाला विटामिन "सी' (प्रसन्नता, आत्मविश्वास आदि) हमारे जीवन की द्वितीयक प्राथमिकताओं को पूरा करने के लिए अतिरिक्त ऊर्जा प्रदान करेगा। वैसे भी जब आप घर में खुश रहेंगे, तो अपनी नौकरी या व्यवसाय में भी मन लगाकर काम करते हुए सफलता प्राप्त कर सकेंगे। तो मुझे आशा है कि आप सभी को जीवन की प्राथमिकताएँ निर्धारित करने अब कोई परेशानी नहीं होगी। ऐसा कहकर जैसे ही शिक्षक ने अपनी बात खत्म करना चाही, तो एक विद्यार्थी खड़ा होकर बोला कि गुरु जी! तेल का मतलब तो आपने बताया ही नहीं।
     शिक्षक बोले-बहुत अच्छा, मैं जानना चाहता था कि आप मेरी बात ध्यान से सुन रहे हैं या नहीं। और आप सुन रहे हैं यानी आपने कानों में तेल डाला हुआ है। सभी विद्यार्थी एक बार फिर जोर से हँस दिए। फिर वे गंभीर होकर बोले कि तेल इस बात का प्रतीक है कि आप चाहे जितने भी व्यस्त रहें, आप ठहाका लगाकर हँसने का समय हर हालत में निकाल सकते हैं। इसमें आपको हर तरह की निराशा से उबारने की अद्भुत क्षमता होती है।
     छात्रों को अपने प्रश्न का उत्तर मिल चुका था कि हम सभी को प्राथमिकताओं का सही निर्धारण ही व्यक्ति को जीवन में सफल बनाता है।

छिपी संभावनाओं में छिपा होता है भविष्य

छिपी संभावनाओं में छिपा होता है भविष्य

     एक बार एक शिक्षक अपनी कक्षा में आए और विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए बोले कल हम कक्षा प्रतिनिधि का चयन करेंगे। इसके लिए मैं आप सभी की बुद्धिमत्ता की परीक्षा लूँगा। मैं देखना चाहता हूं कि आप सभी ने अब तक जितना ज्ञान पाया है, उसमें से कितना अपने अंदर समाया है।
     शिक्षक की बात सुनकर एक छात्र खड़ा होकर बोला सर, अभी तक तो कक्षा प्रतिनिधि का चयन उसके प्राप्ताकों के आधार पर होता था। कक्षा में सबसे अधिक नंबर प्राप्त करने वाले छात्र को चुन लिया जाता था। फिर यह नया तरीका क्यों? शिक्षक ने छात्र की बात को ध्यान से सुना और जवाब दिया- आपका कहना ठीक है, लेकिन योग्यता का आधार सिर्फ प्राप्तांक ही नहीं हो सकते। हमारे अंदर सामान्य ज्ञान भी ज़रूरी है। ज़िंदगी हर रोज़ नई तरह से परीक्षा लेती है। इसलिए आप सभी कल पूरी तैयारी से आएँ। ऐसा कहकर शिक्षक कक्षा से चले गए।
     अगले दिन सभी विद्यार्थी पूरी तैयारी से आए। उन्होने सामान्य ज्ञान की पुस्तकों के पन्ने पलट डाले थे। उन्हें लग रहा था, चलो एक मौका मिला है कक्षा प्रतिनिधि बनने का। इसे बिना प्रयत्न के हाथ से नहीं जाने देना चाहिए। कुछ छात्र तो उनींदे हो रहे थे। उन्होंने पूरी रात परीक्षा की तैयारी करते हुए गुज़ारी थी। कुछ आपस में बात करके यह पता लगाने का प्रयास कर रहे थे कि परीक्षा में क्या पूछा जा सकता है। परीक्षा लिखित होगी या मौखिक। इस तरह अनेक प्रश्न और अनेक जिज्ञासाओं के बीच शिक्षक कक्षा में आए। सभी छात्र एकदम शांत हो गए। शिक्षक ने छात्रों से पूछा- क्या आप सभी परीक्षा के लिए तैयार हैं? जी हाँ! छात्रों ने एक साथ उत्तर दिया। तो प्रश्न बहुत ही सामान्य है। आप सभी को एक-एक कर इस प्रश्न का उत्तर देना है। प्रश्न है-चाँदी, पीतल और लोहा, इन तीनों धातुओं में से सबसे मूल्यवान धातु कौन-सी है? और क्यों?
     शिक्षक का प्रश्न सुनकर कक्षा में हर्ष की लहर दौड़ गई। लगभग हर छात्र सोच रहा था कि कितना आसान प्रश्न है यह। इसके बाद सभी ने क्रम से उसका उत्तर देना शुरु कर दिया। सभी चांदी को मूल्यवान बता रहे थे। मान्यता अनुसार यह सही भी था। इस बीच एक छात्र जो कि काफी चतुर था, बोला-सर! पीतल सबसे मूल्यवान है, क्योंकि वह सोने जैसी दिखती है। उसकी बात पर पूरी कक्षा जोर से हँस दी। छात्र सहम कर बैठ गया। एक के बाद एक छात्र प्रश्न का जवाब दे रहे थे, लेकिन शिक्षक को सही जवाब नहीं मिल रहा था।
     अंत में एक छात्र खड़ा हुआ और बोला- सर! लोहा सबसे मूल्यवान धातू है। शिक्षक ने कहा- अच्छा, लेकिन क्यों? वो इसलिए कि मेरी दृष्टि में पारस पत्थर के स्पर्श से चांदी और पीतल दोनों ही सोना नहीं बन सकते, लेकिन लोहे में यह गुण होता है। चाँदी चाँदी ही रहेगी और पीतल पीतल ही और पारस के स्पर्श से लोहा सोना बनकर उनसे मूल्यवान हो जाता है। अतः मेरा मानना है कि मूल्यवान कोई वस्तु नहीं होती। उसे मूल्यवान बनाती है उस वस्तु में छिपी संभावनाएँ। छात्र की बात सुनकर शिक्षक प्रसन्न हो गए। उन्हें अपने प्रश्न का सही जवाब मिल गया था। उन्होंेने छात्र को अपने पास बुलाकर उसे कक्षा प्रतिनिधि नियुक्त कर दिया।
     तो देखा आपने। केवल किताबी ज्ञान ही सब कुछ नहीं होता। बुद्धिमान व्यक्ति इस बात को समझते हैं और वे समस्याओं को हल करने में केवल किताबी ज्ञान का उपयोग नहीं करते। उनके पास होता है एक विशेष ज्ञान और यह विशेष ज्ञान हमें मिलता है अपने बड़ों से, बुज़ुर्गों से, गुरुजनों से, सत्संग से और संतों की वाणियों से। कॅरियर में उन्नति के लिए यह विशेष ज्ञान बहुत काम आता है। इसी विशेष ज्ञान के आधार पर छात्र ने प्रश्न का सही जवाब दिया। और उसके उत्तर के पीछे जो तर्क था, वह भी कितना सही था कि मूल्य वस्तु का नहीं, उसके अंदर छिपी संभावनाओं का होता है। यह बात इंसानों पर भी लागू होती है। अगर आपके अंदर संभावनाएँ हैं तो उन्हें निखारा जा सकता है। अगर संभावनाएँ ही नहीं होंगी तो फिर काँच को तो घिस-घिसकर हीरा नहीं बनाया जा सकता।

जहाँ चाह वहाँ राह


जहाँ चाह वहाँ राह

     एक गाँव में एक बूढ़ा किसान अपने बेटे के साथ रहता था। उनकी आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। वे दोनों बड़ी मेहनत से खेती करके अपना पेट भरते थे। एक बार किसी चोरी के झूठे आरोप में पुलिस ने उसके बेटे को गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया। किसान और उसके बेटे ने बहुत समझाया, लेकिन पुलिस ने एक न सुनी। इसके बाद किसान अकेला रह गया। वह पहले ही बूढ़ा था और उस पर इतनी बड़ी विपदा के चलते वह काफी कमज़ोर हो गया, जैसे उसके शरीर की सारी ताकत किसी ने छीन ली हो। वह जैसे-तैसे अपना काम चलाने लगा।
     इस बीच बुवाई का समय निकट आता देख किसान को चिंता सताने लगी। कुछ उपाय न सूझने पर उसने अपने बेटे को पत्र लिखा प्रिय पुत्र, तुम्हारे बिना मैं बहुत असहाय महसूस कर रहा हूँ। मेरी बूढ़ी हड्डियां अब जुताई करने के काबिल नहीं हैं। ऐसा लगता है इस साल हम अपने खेत को जोतकर उसमें फसल नहीं बो पाएँगे और हमारे भूखों मरने की नौबत आ जाएगी। कल गाँव की चौपाल पर प्रधान जी इस साल अच्छी बारिश होने की बात कर रहे थे। काश, तुम जेल में नहीं होते तो इस बार अच्छी फसल मिलती और हम महाजन का कर्जा चुका देते। पता नहीं भगवान भी हम गरीबों की ही परीक्षा क्यों लेता है? सोच रहा हूँ कि महाजन से थोड़ा-बहुत और उधार लेकर खेत जुतवा दूँ। तुम अपनी राय जल्दी भेजना। तुम्हारा गरीब पिता।
     चिट्ठी भेजने के कुछ दिनों बाद किसान को उसके बेटे का टैलीग्राम मिला, जिसमें लिखा था-"पिता जी! भगवान के लिए गलती से भी किसी से खेत मत जुतवा लेना। मैने लूट का सारा माल वहीं छिपा रखा है।' टैलीग्राम पढ़कर किसान उदास हो गया। वह अपने बेटे को निर्दोष समझ रहा था, लेकिन वह तो चोरी के माल की बात लिख रहा था। इधर वह किसान टैलीग्राम पढ़ ही रहा था कि एक बच्चा दौड़ता हुआ आया और बोला- बाबा-बाबा, जल्दी से खेत पर चलो। पुलिस वाले तुम्हारा खेत खोद रहे हैं। किसान को समझते देर न लगी कि पुलिस शायद चोरी के माल की तलाश में ही आई होगी। वह तेज़ी के साथ अपने खेत पहुँचा। तब तक पुलिस वाले पूरा खेत खोद चुके थे, लेकिन उन्हें लूटा हुआ माल नहीं मिला। किसान को कुछ बताए बिना पुलिस वाले वापस चले गए।
     किसान को कुछ समझ में नहीं आ रहा था। उसने अपने बेटे को इस बारे में एक और खत लिखकर भेजा और उससे जानना चाहा कि मामला क्या है? इस बार पुत्र का जवाब पोस्टकार्ड पर आया-आदरणीय पिता जी, परेशान न हों। दरअसल आपकी चिट्ठी पढ़ने के बाद मुझे बहुत दुःख हुआ और मैं अपनी किस्मत को कोसता हुआ सोचने लगा कि अब इस परिस्थिति में मैं जेल में बैठकर दुःखी होने के अलावा और क्या कर सकता हूँ? लेकिन दूसरी ओर मैं आपकी सहायता भी करना चाहता था। अब कहते हैं न पिताजी कि "जहाँ चाह हैं, वहाँ राह है।' तो मुझे एक उपाय सूझा और मैने आपको टैलीग्राम में चोरी के बारे में लिखकर भेज दिया। मुझे विश्वास था कि पुलिस वाले मेरा टैलीग्राम अवश्य पढ़ेंगे और हुआ भी ऐसा ही। वे टैलीग्राम पढ़कर झाँसे में आ गए और गाँव पहुँचकर सारा खेत खोद दिया। अब आप निश्चिंत होकर खेत में फसल बो सकते हैं। आपका पुत्र। पोस्टकार्ड पढ़ने के बाद किसान की क्या प्रतिक्रिया रही होगी, यह तो आप समझ ही गए होंगे। और यही भी कि "जहाँ चाह वहाँ राह' की उक्ति प्रबंधन ही नहीं, जीवन के हर क्षेत्र में एकदम सटीक बैठती है। किसी भी कार्य को करने की चाह यदि आप में है तो उपाय आपको अपने आप सूझ जाएगा। कार्य को कर डालने के लिए आवश्यक लगन, दृढ निश्चय, चतुराई और आत्मविश्वास तो "चाह' का पीछा करते हुए आप तक पहुँंच ही जाते हैं।
     इसी के सहारे उस पुत्र ने असंभव लगने वाले कार्य को कम समय, अवरोधों और सीमित साधनों के बावजूद अपने बुद्धि कौशल के उपयोग से पूरा कर लिया। निश्चय ही वह भी एक प्रबंधन गुरु था, जो अपने आसपास के उपलब्ध संसाधनों का सही उपयोग कर परिस्थितियों को अपने पक्ष में मोड़ना जानता था। दूसरी ओर यदि वह बैठकर अपनी किस्मत को कोसता रहता तो सिर्फ बैठा ही रहता और उसके पिता की स्थिति बद से बदतर हो जाती। इसी प्रकार हम भी जीवन की विपरीत परिस्थितियों का सामना अपने बुद्धि कौशल, लगन, दृढ़ निश्चय और आत्मविश्वास के सहारे कर सकते हैं। हाँ, चाह तो ज़रूरी है। तो फिर सोचना कैसा? यदि आप आगे बढ़ना चाहते हैं तो इस "चाह' को बनाए रखिए, राह खुद-ब-खुद बन जाएगी। 
     और अंत में, हम यह भी बता दें कि इस बार भी पुलिस ने उसके बेटे का पोस्टकार्ड पढ़ लिया था। पुलिस को भी समझ में आ गया था कि उसने एक निर्दोष व्यक्ति को गिरफ्तार कर लिया है, लिहाजा उसे छोड़ दिया गया। जब वह गाँव पहुँचा तो उसने अपने पिता के साथ मिलकर पुलिस द्वारा खोदे गए खेत में बुवाई की और अच्छी वर्षा के कारण हुई भरपूर फसल काटी।

"1929 का वो समुद्री राज: आसमान में दिखा विशाल चमकता 'क्रॉस' जिसे विज्ञान ने भी माना अनसुलझा!"

 1929: अटलांटिक महासागर का वो 'चमकता क्रॉस' – एक अनसुलझी समुद्री पहेली 1929: अटलांटिक का 'क्रूसिफॉर्म' रहस्य (The Deep Dive)...