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सोमवार, 8 अगस्त 2016

भक्तिमति गोपिका





काकभुशुण्डि जी गरुड़ के प्रति कथन करते हैंः-
राम  कृपा  बिनु  सुनु खगराई । जानि  न जाइ  राम प्रभुताई।।
जाने  बिनु  न  होइ  परतीती। बिनु  परतीति  होइ नहिं प्रीति।।
प्रीति बिना नहिं भगति दिढ़ाई। जिमि खगपति जल कै चिकनाई।।
अर्थः-है पक्षिराज गरुड़, सुनिये! भगवान की कृपा के बिना भगवान की प्रभुता नहीं जानी जाती, प्रभुता जाने बिना उनपर विश्वास नहीं जमता, विश्वास के बिना भगवान के प्रति ह्मदय में प्रीति उत्पन्न नहीं होती और प्रीति के बिना भक्ति वैसे ही दृढ़ नहीं होती जैसे जल पर चिकनाई दृढ़ नहीं होती।
     अभिप्राय यह कि जब मनुष्य अपने इष्टदेव को महिमावान एवं सर्वसमर्थ मान लेता है, तभी अपने इष्टदेव के चरणों में उसका विश्वास होता है और तभी उसके ह्मदय में प्रीति उत्पन्न होती है। प्रीति उत्पन्न होने से उसकी भक्ति में दृढ़ता आती है और वह अपने लक्ष्य की ओर तीव्रगति से अग्रसर होता है। इष्टदेव के प्रति दृढ़ विश्वास और प्रेम ही इष्टदेव की कृपा एवं प्रसन्नता के आधार हैं। और यदि यह विश्वास और प्रेम बाल सुलभ हो तो इष्टदेव की कृपा अति शीघ्र उतरती है।
     विश्वास और प्रेम को उजागर करने वाली "गोपिका' नामक कन्या की कथा यहां दी जा रही है, जो दक्षिण भारत के एक मन्दिर में रहती थी। मन्दिर में रहने से पूर्व गोपिका अपने माता-पिता के साथ मन्दिर के निकट ही रहती थी। उसके माता-पिता बड़े ही भक्ति-भाव सम्पन्न थे। और नित्यप्रति मन्दिर में जाकर बड़ी श्रद्धाभावना से सेवा किया करते थे चाहे वह झाड़ू लगाने की सेवा हो या बर्तन साफ करने की अथवा मन्दिर के साथ लगे बगीचे से फूल तोड़ने की। गोपिका भी छोटी आयु से ही माता-पिता के साथ मन्दिर जाकर सेवा किया करती थी। जब वह नन्हे-नन्हे हाथों से मन्दिर के प्रांगण में झाड़ू लगाती अथवा बगीचे से फूल चुनती, तो उसे ऐसा करते देखकर माता-पिता तो प्रसन्न होते ही, मन्दिर का प्रधान पुजारी भी अत्यन्त प्रसन्न होता, क्योंकि वह स्वयं भी बड़ा भक्तिभावसम्पन्न था। धीरे-धीरे गोपिका ने अपने माता-पिता से फूलों की माला बनाना भी सीख लिया।
     अभी वह लगभग आठ वर्ष की ही थी कि उसके माता-पिता एक-एक करके चल बसे और वह अनाथ हो गई। मन्दिर के प्रधान पुजारी को उसके अनाथ हो जाने पर बड़ा दुःख हुआ। गोपिका की भगवान के प्रति श्रद्धा एवं भक्ति के कारण वह उस पर पुत्रीवत् ही स्नेह रखता था, अतः उसने अन्य पुजारियों से परामर्श करके उसे मन्दिर में ही रहने की आज्ञा दे दी। मन्दिर के प्राँगण के एक छोर पर कुछ कमरे बने हुए थे, गोपिका को उनमें से एक कमरा दे दिया गया। भोजन भी उसे प्रसाद रुप में मन्दिर से ही मिल जाता। गोपिका वहीं रहने लगी। वह मुँह अन्धेरे ही उठ जाती, स्नानादि से निवृत्त होकर फूल चुनती और भगवान के लिए फूलों की माला बनाती। और यह सब कार्य वह पुजारियों के आने से पहले ही कर लेती। इसी प्रकार वह सायंकाल को भी भगवान के लिए माला बनाती। गोपिका की श्रद्धा एवं प्रेम से बनी हुई माला की मन्दिर के पुजारी बड़ी ही प्रशंसा करते और जब पुजारी वह माला भगवान को पहनाते तो गोपिका भावविह्वल हो जाती और उसके नेत्र जल से भर जाते। उसकी इस अवस्था को प्रधान पुजारी अच्छी तरह से देख और समझ रहा था। एक सच्चा भक्त होने के नाते वह यह बात भलीभाँति जानता था कि ऐसी उत्तम अवस्था प्रभु की कृपा और पूर्बले शुभकर्मों के बिना प्राप्त नहीं होती जैसा कि सत्पुरुषों का कथन हैः-
जन नानक करनी पाईअनि हरिनामा भगति भंडार।।
सत्पुरुष श्री गुरु अमरदास जी का कथन है कि प्रभु-नाम की भक्ति का ख़ज़ाना प्रभु की कृपा से ही मिलता है।
कहु नानक जा कउ होहु क्रिपाल। तिसु जन की सभ पूरन घाल।।
कहु  नानक  जाके पूरन भाग । हरि चरणी  ताका  मनु  लाग।।
सत्पुरुष श्री गुरु अर्जुनदेव जी महाराज फरमाते हैं कि हे प्रभो! जिस पर तू कृपाल होता है, वही तेरी भक्ति करता है, उसी की सारी मेहनत सफल होती है। जिसके भाग्य पूर्णरुप से उदय होते हैं, उसी का मन प्रभु के चरणों में लगता है।
     प्रधान पुजारी उस संस्कारी बच्ची को सेवा के लिए प्रोत्साहित तो करता ही, उसे प्रेमी-भक्तों की कथायें सुनाकर उसकी प्रेमस्वरुपा भक्ति को और भी दृढ़ करता। फलस्वरुप प्रभु के चरणों में गोपिका का प्रेम दिन प्रतिदिन बढ़ने लगा। एकदिन गोपिका के ह्मदय में यह इच्छा उत्पन्न हुई कि अपने हाथ से गुँथी हुई माला वह स्वयं भगवान को पहनाये। एक दिन उसने भगवान के गले में माला डालने के कोशिश भी की, परन्तु चूँकि वह अभी आठ-नौ साल की बच्ची थी और भगवान की मूर्ति ऊँची थी, अतः उसके हाथ भगवान के गले तक न पहुँच सके। परन्तु इससे उसकी यह इच्छा समाप्त नहीं हुई, अपितु इस इच्छा ने धीरे-धीरे प्रबल रुप धारण कर लिया। अपनी इस इच्छा को वह पुजारियों के सम्मुख तो प्रकट कर नहीं सकती थी अतः वह रो-रोकर दिन-रात भगवान के चरणों में प्रार्थना करने लगी। जब तक मन्दिर के पट खुले रहते वह भगवान के सम्मुख बैठकर उनके दर्शन करती रहती और भगवान से उनकी कृपा के लिए याचना करती रहती। और जब मन्दिर के पट बन्द हो जाते तो अपने कमरे में जाकर वह भगवान के चरणों में प्रार्थना करती। एक दिन वह मन्दिर में बैठकर भगवान के दर्शन करने में निमग्न थी कि उसे ऐसा अऩुभव हुआ जैसे कोई उससे कह रहा हो कि तुम्हारी इच्छा अवश्य पूरी होगी। उस दिन के बाद भी उसे कई बार इस तरह की अनुभूति हुई जिससे उसके ह्मदय में यह विश्वास जगने लगा कि भगवान उसकी इच्छा अवश्य पूरी करेंगे।
     कुछ दिन के बाद प्रातःकाल के समय जब पुजारी भगवान को माला पहना रहे थे, तो उन्हें माला पहनाते हुए देखकर गोपिका की आँखें अश्रुपूरित हो गर्इं, तभी उसे महसूस हुआ जैसे कोई उसके कान में धीरे-से कह रहा है-""गोपिका, रो मत! आज आधी रात को तेरे मन की इच्छा पूरी होगी। और तू अपने हाथों से हमें पुष्पमाला पहना सकेगी।'' उसने इधर उधर देखा,परन्तु वहाँ कोई न था। वह सोचने लगी कि कहीं यह मेरे मन का धोखा तो नहीं। तभी उसे पुनः महसूस हुआ जैसे कोई निकट खड़ा होकर उसके कान में फुसफुसा रहा है-""गोपिका! हमारे कथन पर विश्वास कर, आज आधी रात को तेरी इच्छा अवश्य ही पूरी होगी।''
""परन्तु कैसे? गोपिका ने मन ही मन में कहा-आधी रात को तो मन्दिर का द्वार बन्द रहता है और उसमें ताले लगे होते हैं।'' इसके उत्तर में उसके कान में फिर आवाज़ आई-""तू चिंता मत कर। जैसे ही तू द्वार छुएगी, वह खुल जायेगा।''
     गोपिका का ह्मदय प्रसन्नता से झूमने लगा। उसके ह्मदय में भगवान के प्रति श्रद्धा थी, विश्वास था, प्रेम था। इस घटना को उसने अपने ऊपर भगवान की कृपा जाना। शाम को उसने सायंकाल की माला के लिए तो फूल तोड़े ही, रात्रि के लिए भी फूल तोड़ लिए। सायंकाल की आरती हो जाने के बाद उसने पुनः पुष्पमाला तैयार की और आधी रात होने की प्रतीक्षा करने लगी। ज्यों-ज्यों समय बीतने लगा, उसके दिल की धड़कन बढ़ने लगी और वह सोचने लगी कि क्या वास्तव में ही आज उसकी हार्दिक इच्छा पूरी होगी।
     इस विषय में किसी से वह कुछ बात तो कर नहीं सकती थी, अतः अकेली ही व्याकुलता में कभी बिस्तर पर करवटें बदलने लगती तो कभी उठकर कमरे में टहलने लगती, क्योंकि नींद तो उसकी आँखों से कोसों दूर थी। अन्ततः पहरेदार ने बारह के घंटे बजाये। घंटे की आवाज़ सुनकर गोपिका ने पुष्पमाला हाथ में ली और चुपचाप मन्दिर की ओर बढ़ चली। मन्दिर के द्वार के निकट पहुँचकर वह सोचने लगी कि इतना मज़बूत दरवाज़ा जिस पर मज़बूत ताले लगे हुए हैं,कैसे खुलेगा? तभी उसे वे शब्द याद आए कि ""तू चिन्ता मत कर। जैसे ही तू द्वार छुएगी, वह खुल जायेगा।''
     यह बात याद आते ही उसने द्वार को हाथ लगाया। द्वार थोड़ा-सा खुल गया जिसमें से होकर गोपिका मन्दिर के अन्दर चली गई। अन्दर घुप अन्धेरा था और वहाँ हाथ को हाथ भी सुझाई नहीं देता था। उस घुप अन्धेरे में गोपिका को जब भगवान का श्री विग्रह दिखाई न दिया तो वह बोली-""प्रभो! मुझे तो यहाँ कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा है। क्या मैं अपने कमरे से मोमबत्ती ले आऊँ?'' भगवान बोले-""नहीं-नहीं, ऐसा कदापि न करना। यदि किसी को मन्दिर के अन्दर ज़रा सा भी प्रकाश दिखाई दे गया, तो सब खेल बिगड़ जायेगा।''गोपिका कहने लगी-""फिर मैं क्या करुँ? यहाँ घुप अन्धेरे में मुझे आपके दर्शन बिल्कुल नहीं हो रहे हैं, फिर आपको माला कैसे पहनाऊँ?''
     यहाँ स्वाभाविक ही मन में प्रश्न उत्पन्न हो सकता है कि यदि भगवान मन्दिर का द्वार खोल सकते थे, तो क्या मन्दिर में हल्का-सा प्रकाश नहीं कर सकते थे अथवा गोपिका को ऐसी शक्ति नहीं दे सकते थे जिससे वह भगवान को इस घुप अन्धेरे में भी देख सकती? भगवान अवश्य ऐसा कर सकते थे, उनके लिए यह कौन सी बड़ी बात थी। परन्तु उन्हें चूँकि गोपिका की भक्ति की महिमा सबके सम्मुख प्रकट करनी थी, अतः भगवान बोले-यहाँ मोमबत्ती जलाने की अपेक्षा ऐसा करते हैं कि हम तुम्हारे कमरे में चलते हैं, तुम वहाँ प्रकाश में हमें माला पहना लेना। तुम आगे आगे चलो हम तुम्हारे पीछे-पीछे चलते हैं, परन्तु सावधान! पीछे घूमकर मत देखना। ऐसा होने पर हम तुम्हारे कमरे में नहीं जायेंगे और फिर तुम्हारी माला पहनाने की इच्छा कभी पूरी नहीं होगी।''
     भगवान के वचन सुनकर गोपिका खुशी-खुशी अपने कमरे की ओर चल दी। पीछे घूमकर वह देख तो नहीं सकती थी, क्योंकि भगवान ने ऐसा करने के लिए सख्त मना किया था। परन्तु उसे ऐसा अनुभव हो रहा था कि कोई अपने पैर घसीटते हुए उसके पीछे-पीछे चल रहा है। अपने कमरे के निकट पहुँचकर उसने कमरे का द्वार खोला और अन्दर चली गई, पीछे-पीछे भगवान भी कमरे के अन्दर आ गये और द्वार बन्द हो गया। गोपिका ने जैसे ही मोमबत्ती जलाई तो यह देखकर अचम्भित रह गई कि उसके सामने भगवान की मूर्ति नहीं, अपितु भगवान स्वयं साक्षात् स्वरुप में खड़े उसकी ओर देखकर मुसकरा रहे हैं। भगवान के साक्षात् दर्शन कर वह भाव-विह्वल हो गई। उसने भगवान को आसन पर बिठलाया और उनके गले में फूलों की माला डाली। भगवान ने मुसकराते हुए कहा-""गोपिका! हमें बहुत भूख लगी है, जल्दी से कुछ खाने को दो।''
     भगवान की लीला भी कितनी निराली है कि सम्पूर्ण सृष्टि के स्वामी, सम्पूर्ण सृष्टि को सब कुछ देने वाले अपने प्रेमी की प्रेम-भावना को पूरा करने के लिए उससे खाने को माँग रहे हैं। गोपिका के पास उस समय केवल भुने हुए चने मौजूद थे, उसने वही भगवान के आगे रख दिए। जिस प्रकार त्रेतायुग में भगवान श्रीराम ने शबरी के भेंट किये हुए बेरों का बड़े प्रेम से भोग लगाया था, द्वापर युग में भगवान श्री कृष्ण ने विदुर-विदुरानी के घर बिना नमक का साग बड़े प्रेम से खाया था,उसी प्रकार गोपिका द्वारा भेंट किये हुए चनों का भगवान बड़े चाव से भोग लगाने लगे। भगवान के साक्षात् दर्शन कर तथा उन्हें चनों का भोग लगाते देखकर वह इतनी भाव-विभोर हो गई कि भगवान की महिमा के भजन गाने लगी। जब एक भजन समाप्त कर वह दूसरा भजन बोलने लगी, तो भगवान बोले-""तू आज हमारे जी भर के दर्शन कर ले, परन्तु एक बात याद रखना कि चार बजे से पहले-पहले हमें मन्दिर में वापस पहुँचना है, क्योंकि चार बजे पुजारी प्रातः की पूजा-अर्चना के लिए मन्दिर में आ जाते हैं।
     किन्तु गोपिका तो इतनी आत्म-विभोर थी कि उसने भगवान के इन वचनों को सुना ही नहीं। उसने भजन
गाना शुरु किया। भजन गाते-गाते वह इतनी मस्त हो गई कि भजन के साथ-साथ ताल देते हुए नाचने लगी। कुछ देर बाद भगवान भी ताल दे-देकर उसके साथ नृत्य करने लगे। कब चार के घंटे बज गए, पता ही न चला। चार के घंटे बजे और दो पुजारी, जिनकी उस दिन मन्दिर के द्वार खोलने की बारी थी, मन्दिर के द्वार पर पहुँचे। क्या देखते हैं कि द्वार पहले ही खुला हुआ है। अन्दर जाकर रोशनी की तो यह देखकर वे स्तब्ध रह गए कि मन्दिर में भगवान की मूर्ति मौजूद नहीं है, जिस पर लाखों रुपये के गहने थे। उन्होंने तुरन्त शोर मचाया तो शेष पुजारी तथा अन्य कर्मचारी भी अपने-अपने कमरों से निकलकर मन्दिर की ओर भागे और वहाँ मूर्ति न देखकर हैरान रह गए। प्रधान पुजारी ने तुरन्त मन्दिर का मुख्य द्वार बन्द करवा दिया। जैसे-जैसे समय बीतता गया, प्रेमी भक्त मन्दिर में दर्शन करने के लिए आने लगे। प्रातः होने तक तो यह समाचार सब ओर फैल गया और मन्दिर के बाहर अच्छी खासी भीड़ इकट्ठी हो गई। अन्दर पुजारी बड़े असमंजस की स्थिति में थे और आपस में यह परामर्श कर ही रहे थे कि इस चोरी की घटना की सूचना राजा को दी जाए कि तभी एक कर्मचारी की दृष्टि प्राँगण में मौजूद निशानों पर गई जिन्हें देखकर ऐसा लगता था कि कोई भारी चीज़ घसीटकर ले जाई गई हो। उसने पुजारियों से इसका ज़िक्र किया। पुजारियों ने वे निशान देखे और उन निशानों का पीछा करते-करते वे गोपिका के कमरे पर जा पहुँचे। एक पुजारी ने द्वार खटखटाया। दो-तीन बार खटखटाने पर गोपिका ने द्वार खोला, तो यह देखकर सब चकित रह गए कि भगवान की मूर्ति सभी मूल्यवान आभूषणों के साथ वहाँ मौजूद है। पुजारियों को मूर्ति की ओर देखते हुए देखकर गोपिका ने घूमकर उधर देखा और यह देखकर हैरान रह गई कि वहाँ अब साक्षात् भगवान नहीं, केवल उनकी मूर्ति मौजूद है।
     गोपिका के कमरे में भगवान की मूर्ति देखकर पुजारियों के क्रोध की सीमा न रही। उन्हें क्रोधित देखकर गोपिका इस प्रकार सहम गई जैसे शेर को देखकर बछिया सहम जाती है। परन्तु प्रधान पुजारी गोपिका की भगवान के प्रति श्रद्धा,भक्ति,प्रेम और विश्वास को देखकर यह अच्छी तरह समझ गया था कि गोपिका बहुत ही संस्कारी लड़की है। अतः उसने पुजारियों को सम्बोधित करते हुए कहा-""आप लोग क्रोधित न हों, अपितु शान्तिपूर्वक इस बात पर विचार करें कि भगवान की यह मूर्ति इतनी भारी है कि चार-पाँच व्यक्ति मिलकर भी इसे घसीट नहीं सकते। फिर यह आठ-नौ साल की बच्ची इस मूर्ति को घसीट कर कैसे अपने कमरे में लाई होगी।'' प्रधान पुजारी का यह कथन सुनकर अन्य पुजारी कुछ शान्त हुए, परन्तु कहने लगे कि आपकी बात तो ठीक है,परन्तु फिर भी मूर्ति यहाँ मौजूद तो है ही। आखिर कोई तो इसे यहाँ लाया ही है।
     प्रधान पुजारी ने कहा-""आप थोड़ा शान्त रहें, हम इस बच्ची से ही इस विषय में पूछते हैं।'' यह कहकर उसने बच्ची को अपने निकट बुलाया और बड़े प्रेम से उसके सिर पर हाथ फेरते हुए पूछा-गोपिका! मैं जानता हूँ कि तेरा भगवान के चरणों में बहुत प्रेम है। सच-सच बता दे कि यह मूर्ति यहाँ कैसे आई? गोपिका रोती हुई प्रधान पुजारी के चरणों से लिपट गई और उसने अपनी माला पहनाने की हार्दिक इच्छा से लेकर रात की घटना तक-सब कुछ आद्योपान्त कह सुनाया, फिर बोली-""पुजारी जी! मेरी बातों पर विश्वास करें, मैने जो कुछ कहा है, बिल्कुल सच कहा है।''
     प्रधान पुजारी ने उसे उठाया और उसके सिर पर स्नेह भरा हाथ फेरते हुए कहा-""गोपिका! मुझे तुम्हारे एक-एक शब्द पर विश्वास है क्योंकि मैं प्रारम्भ से ही तुम्हारे ह्मदय की अवस्था को देखता आ रहा हूँ। तू सचमुच ही बहुत भाग्यशालिनी है, क्योंकि भगवान की तुझपर अत्यन्त कृपा है।''
     भगवान की मूर्ति को मन्दिर में पुनः अपने स्थान पर स्थापित किया गया। सारी घटना जानकर नगर का हर प्रेमी गोपिका की भक्ति की सराहना करने लगा, परन्तु पुजारी अभी भी शान्त नहीं हुए थे। प्रधान पुजारी के अतिरिक्त अन्य सभी पुजारियों की एक ही राय थी कि गोपिका का यहाँ रहना अब किसी तरह भी उचित नहीं है। प्रधान पुजारी, जो मात्र पुजारी ही नहीं, अपितु भगवान का सच्चा भक्त था, वह भी चाहता था कि गोपिका अब किसी रंगरेज़ के हवाले हो जाए ताकि उस पर मीरांबाई जी की तरह भक्ति का गहरा रंग चढ़ जाए, जिस भक्ति के मजीठे रंग के चढ़ने पर वह कह उठी थीः-
प्रभु जी मैं तो थाँरे रँग राती।।
औराँ के पिया परदेस बसत हैं, लिख लिख भेजें पाती।
मेरा  पिया  मेरे रिदै बसत ह ै, गूँज करुँ दिन राती।।
चूवा  चोला  पहिर सखी री , मैं झुरमुट रमवा जाती।
झुरमुट में मोहि मोहन मिलिया, खोल मिलूँ गल बाटी।
और  सखी  मद  पी पी माती, मैं बिन पिये मदमाती।
प्रेम  भठी  को  मैं मद पियो , छकी  रहूँ दिन राती।
सुरत  नरित  का  दिवला संजोया, मनसा पूरन बाती।
अगम  घाणि का तेल सिंचाया, बाल रही दिन राती।।
जाऊँ नी पीहरिये जाऊँ नी सासुरिये, सतगुरु सैन लगाती।
दासी  मीरा के  प्रभु गिरधर , हरि चरनाँ की मैं दासी।।
।।शब्द।।
पायो जी मैने नाम रतन धन पायो।।
वस्तु अमोलक दी मेरे सतगुरु, किरपा कर अपनायो।।
जन्म  जन्म  की  पूँजी पाई , जग  में सभी खोवायो।
खरचै नहीं घटे चोर न लेवे, दिन दिन बढ़त सवायो।।
सत की नाव खेवटिया सतगुरु, भव सागर तर आयो।
मीरा के प्रभु गिरधर नागर, हरख हरख जस गायो।।
   इस प्रकार विचार करके प्रधान पुजारी गोपिका को अपने गुरुदेव के आश्रम पर ले गया और उनके श्री चरणों में गोपिका के विषय में सारे हालात वर्णन कर दिये। गुरुदेव ने कृपा कर उसे अपनी शरण में रख लिया। जैसे मतंग ऋषि के आश्रम पर रह कर शबरी ने भक्ति की मंज़िलें तय की थीं, उसी प्रकार गुरुदेव के आश्रम पर रहकर उनके मार्गदर्शन में गोपिका ने भी भक्ति की मंज़िलें तय कर अपना मानुष जन्म सफल किया और संसार में अपना नाम अमर कर गई।

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