भक्तिमार्ग में दृढ़ विश्वास की बड़ी आवश्यकता है। जिसके ह्मदय में इष्टदेव के प्रति अवचिल विश्वास एवं अटल निष्ठा है, वही इष्टदेव की कृपा एवं प्रसन्नता का अधिकारी बन सकता है। ऐसे दृढ़ विश्वासी भक्तों के विषय में भगवान श्री कृष्ण चन्द्र जी महाराज फरमाते हैं किः-
मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते।
श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्तततमा मताः।। ( 12/2)
अर्थः-मुझ में मन को एकाग्र करके मेरे भजन-ध्यान में लगे हुए जो भक्तजन अटल श्रद्धा एवं विश्वास से मुझ परमेश्वर को भजते हैं, वे मुझे योगियों में उत्तम योगी मान्य हैं।
इसलिए भक्ति-पथ पर चलते हुए यदि सफलता-प्राप्ति की मन में अभिलाषा है, तो यह अत्यावश्यक है कि इष्टदेव के प्रति दृढ़ विश्वास और अचल निष्ठा रखते हुए मनुष्य सेवा-भक्ति में संलग्न रहे, क्योंकिः-
दोहाः- पद गावै लौलीन ह्वै, कटै न संसय फास।
सबै पछोरै थोथरा , एक बिना बिस्वास।।
इसलिये ह्मदय में दृढ़ विश्वास और अचल निष्ठा रखनी है। यदि मनुष्य ऐसा करेगा तो फिर निश्चितरुप से ही वह अपने उद्देश्य में सफल होगा और इष्टदेव की प्रसन्नता एवं कृपा का पात्र बनकर अपना जीवन सफल कर लेगा।
प्रेम का मार्ग त्याग और बलिदान का मार्ग है। सच्चा प्रेमी अपने प्रिय इष्टदेव के मार्ग में सब कुछ दे डालता है। वह अपना सब कुछ देकर प्रेम का सौदा खरीद करता है। वास्तव में यह सब कुछ देना नहीं, अपितु पा लेना है। जिसने मालिक का प्रेम प्राप्त कर लिया, उसने सब कुछ प्राप्त कर लिया। प्रेम से ही प्रेम मिलता है। जिसे प्रीतम का प्रेम मिल गया, उसे सब कुछ मिल गया और जिसे प्रभु का प्रेम ही नहीं मिला, तो अन्य सब सांसारिक सुख धन-सम्पत्ति, मान-बड़ाई आदि को पाकर भी वास्तव में वह कंगाल ही बना रहता है। प्रेमियों ने प्रेम को पाने के लिये और अपने सच्चे प्रेम को निभाने के लिये क्या-क्या बलिदान नहीं किये। इतिहास ऐसे सच्चे प्रेमियों की प्रेम-कथाओं से भरा पड़ा है। यहां पर अब एक ऐसे ही सच्चे प्रेमी की कथा का वर्णन किया जा रहा है जिसने प्रेम की लगन को निभाने के लिये तथा गुरु-भक्ति और सेवा के लिये सब कुछ बलिदान कर दिया और गुरु-कृपा पाकर सफल मनोरथ हुआ।
यह सच्चे प्रेमी रसिक मुरारी जी थे। ये बड़े गुरु भक्त और प्रसिद्ध महात्मा हुये हैं। ये एक बड़े ज़मींदार थे। इनके आधीन काफी भूमि थी और ढोर-पशु आदि भी थे। अपने गांव में इनकी खेती-बाड़ी थी। रुपया-पैसा की कोई कमी नहीं थी। खाता-पीता परिवार था। दूर-दूर तक इनके अच्छे सम्बन्ध थे और बड़ा मान-सम्मान था। एक समय इन पर ऐसा आया कि धन-सम्पत्ति और सासंारिक भोग-पदार्थों से इनका दिल भर गया। पूर्व जन्मों के शुभ संस्कारों के कारण ही किसी भाग्यवान प्राणी के दिल में संसार की मोह-माया से वैराग्य उत्पन्न होता है और उसका दिल विषय-विकारों से हट जाता है। तब वह मालिक के सच्चे प्रेम और सच्ची भक्ति को पाने की चाह करने लगता है, वरना संसार के लोग तो प्रायः इन्हीं सांसारिक भोगों और धन-सम्पत्ति को ही सब कुछ मान कर उसी में आसक्त हो रहते हैं। जिन्हें संसार में रहकर और संसार के सभी भोग पदार्थ पास होेते हुये भी विषय-विकारों से उपरामता हो जाये, वही जीव भाग्यशाली कहे जा सकते हैं। यही दशा रसिक मुरारी जी की भी हुई। उन्हें यह विचार उत्पन्न हुआ कि सत्संग, प्रेम, भक्ति और गुरु-सेवा के स्थान पर अपने जीवन को विषय भोगों में समाप्त कर देना आत्महत्या कर लेने के समान है। इसलिये कहीं सत्पुरुषों का संग खोज कर उनकी संगति का लाभ प्राप्त करना चाहिये जिससे जीवन सफल हो जाये। ऐसा सोच कर वह इस चिन्ता में हुये कि कोई परमार्थ के सच्चे मार्गदर्शक पूरे महात्मा पुरुष मिल जायें जिनकी संगति से मेरा जीवन धन्य हो जाये।
प्रकृति प्रत्येक मनुष्य की मांग को पूरा करने का साधन निकाल ही देती है, शर्त यह है कि वह मांग सच्चे दिल से हो। रसिक मुरारी जी की मांग पूरी हो गई। अकस्मात् एक सच्चे महात्मा स्वामी श्यामानन्द जी उनके समीप के गांव में आ निकले। सच्चे महात्माओं का किसी स्थान पर शुभागमन हो जाये तो वह किसी से छिपा नहीं रह सकता, क्योंकि सन्तजन जहां भी जाते हैं अपने पारमार्थिक उपदेशों और सत्संग द्वारा भूले-भटके जीवों को सन्मार्ग दिखलाना ही उनका विशेष काम होता है। वे आम संसारी जीवों में जागृति उत्पन्न करके उन्हें नाम और भक्ति के साधन में लगा देते हैं। उनके पारमार्थिक लाभ का चर्चा आस-पास बहुत शीघ्र फैल जाता है। ऐसे सन्त पुरुष जहां भी रहेंगे, उनके आस-पास का वायुमंडल विशुद्ध पारमार्थिक हो जाता है और उसकी महक दूर-दूर तक पहुँचने लगती है। जिस प्रकार सूर्य के उदय होने पर सब दिशाओं में प्रकाश अपने आप पहुँच जाता है, उसी प्रकार ही सन्त सत्पुरुषों का पारमार्थिक प्रभाव भी आम जीवों तक पहुँचे बिना नहीं रह सकता।
रसिक मुरारी जी को भी स्वामी श्यामानन्द जी के द्वारा जीवों के पारमार्थिक लाभ पाने का समाचार मिला। वे तो पहले ही से इसी तलाश में थे, तत्काल गुरु-चरणों में पहुँचे। गुरु ने भी सच्चे अधिकारी को देखा और बड़े प्रेम से उसे भक्ति-मार्ग की दीक्षा दी। रसिक मुरारी जी स्वामी श्यामानन्द जी के शिष्य हो गये। कुछ दिनों तक उन्होने वहीं गुरु-चरणों मे रहकर उनके सत्संग का लाभ प्राप्त किया, फिर गुरु-आज्ञा से अपने गांव वापस आकर भजन-ध्यान करते हुये विरक्त जीवन व्यतीत करने लगे।
गुरु-कृपा से अब उनका मन सांसारिक भोग पदार्थों में नहीं रमता था, क्योंकि वे अपने मन को हर समय गुरु-चरणों में लगाये रखने का पूरा-पूरा यत्न किया करते थे। गांव वाले उनके इस भक्ति भाव से बहुत प्रभावित हुये। उनकी सच्ची भक्ति से और उनके बलिदान को देखकर गांव के बहुत से लोगों का सुधार होने लगा। रसिक मुरारी जी के गांव में भी अब सत्संग प्रचार होने लगा और आम जीव उससे लाभ उठाने लगे।
स्वामी श्यामानन्द जी रमते महात्मा थे। जिस गांव में वे रसिक मुरारी जी से मिले, कुछ दिन वहां ठहरने और जीवों का कल्याण करने के पश्चात् वे आगे और गांवों में भ्रमण करने लगे। अकस्मात् निकट के किसी दूसरे गांव में एक और बड़ा ज़मींदार रहता था जिसकी काफी ज़मीन थी। वह भी उनके सत्संग से प्रभावित हुआ। यह ज़मींदार बहुत बूढ़ा था। जीवन के अन्तिम दिनों में उसे भाग्य से सत्संग प्राप्त हुआ था। उसके कोई सन्तान आदि नहीं थी। पत्नी पहले से ही परलोक सिधार चुकी थी। आदमी परोपकारी और साधु-सेवी था। उसने सोचा-मेरे जीवन के ये अन्तिम दिन हैं, न जाने कब मौत आ जाये। क्यों न इन अन्तिम दिनों में कोई परमार्थ और परोपकार का कार्य करके अपने जीवन को सफल कर लूँ। इसलिये ऐसा उपाय करना चाहिये जिससे मेरे साथ और जीवों का भी कल्याण हो। इतना वह जानता था कि पूरे गुरु के अतिरिक्त जीवों के सुधार का कार्य और कोई नहीं कर सकता। यदि ये सच्चे महात्मा पारमार्थिक लाभ का भण्डार खोल दें तो हज़ारों-लाखों जीवों का सुधार हो सकेगा। इसलिये उसने गुरु चरणों में हाथ जोड़कर विनय की-भगवन! आप जैसे सच्चे सन्तों का सत्संग बड़े भाग्य से ही प्राप्त होता है। मेरे अति सौभाग्य हैं जो आपके पवित्र सत्संग का अमृत अन्तिम अवस्था में प्राप्त हो गया। अब मैं यह चाहता हूँ कि आप यहां सदैव के लिये निवास स्थान बनाकर अपने पारमार्थिक सत्संग से जीवों का कल्याण करें। मैं यह जानता हूँ कि आप जैसे सच्चे सन्तों को किसी बात की परवाह नहीं होती, न ही किसी वस्तु की इच्छा अथवा चाह होती है। मेरे पास काफी भूमि है, इस पर आप एक स्थान स्थापित कर दें तो यह भूमि भी आपके पवित्र चरणों से सफल हो जायेगी और मैं भी शेष समय आपके चरणों की सेवा में व्यतीत करके सच्चा लाभ प्राप्त कर लूंगा, जिससे मेरा जीवन गुरु-कृपा से धन्य हो जायेगा।
स्वामी श्यामानन्द जी ने ज़मींदार भक्त की यह प्रार्थना स्वीकार कर ली। ज़मींदार ने अपनी सारी भूमि गुरु-चरणों में अर्पित कर दी। गुरु के सेवकों ने वहां स्थान बनाना प्रारम्भ कर दिया। स्वामी जी ने वहां पर अनेकों कुएँ, सरोवर और उपवन लगवा कर उस धरती को आबाद करना प्रारम्भ किया। सच्चे सेवकों को सेवा का अवसर हाथ आया और थोड़े ही समय में सेवकों के परिश्रम से वहां पर एक सुन्दर आश्रम बनकर तैयार हो गया। वन के मध्य एक नदी के किनारे यह निवास-स्थान बनाया गया था। सत्संगियों के रहने के लिये मकान, भोजनशाला आदि के अतिरिक्त सुन्दर-सुन्दर फलदार पौधों से भरे हुये बाग भी वहां लगकर तैयार हो गये। सेवकों और सत्संगियों के लिये भजन-ध्यान करने को एक सुन्दर स्थान बन गया। अब वहां पर दिन-रात सत्संग की वर्षा होने लगी। आस-पास के स्थानों से काफी संख्या में लोग वहां आते और सत्संग का लाभ प्राप्त करते।
रसिक मुरारी जी के गांव से यह स्थान आठ-नौ मील की दूरी पर था। रसिक मुरारी जी भी प्रायः वहां जाया करते और कुछ दिनों तक गुरु-चरणों में रहकर पारमार्थिक लाभ प्राप्त करते। वे धनवान व्यक्ति थे, उन्होने उस आश्रम के बनने में दिल खोल कर सेवा की। अब यह स्थान पूर्ण हो जाने पर दूर से बहुत शोभाजनक और मनमोहक प्रतीत होता था।
एक बार उस देश का राजा जो स्वभाव से बड़ा ही दुष्ट था शिकार खेलता हुआ उसी वन की ओर आ निकला। वहां से उसे यह आश्रम दिखाई पड़ गया। वह वहां गया और उसने आश्रम को अच्छी तरह देखा। आश्रम जैसा कि पहले वर्णन हुआ है कि बहुत ही सुन्दर और लुभावना बना हुआ था। सच्चे सेवकों के परिश्रम से वह ऐसा सुन्दर और भव्य स्थान बन गया था कि वैसा स्थान किसी राजा-महाराजा ने भी न बनवाया होगा। आश्रम को देखकर राजा का मन ललचा उठा। उसने अपने मन में सोचा कि साधुओं के पास ऐसे सुन्दर स्थान की क्या आवश्यकता है? वे तो वन में रहकर भजन कर सकते हैं, यह स्थान तो हमारे अधिकार में होना चाहिये। अब जिस प्रकार भी हो सके इस पर अधिकार किया जाना आवश्यक है। राजा इस प्रकार अपने मन में सोचने और ठानने लगा। सत्पुरुषों का कथन हैः-
शेयरः- नीम नाने गर ख़ुरद मर्दे-ख़ुदा।
बज़ले-दरवेशां कुनद नीमे-दिगर।।
हफ़्त अकलीम अरबगीरद पादशाह।
हमचुनां दर फ़िक्रे-अकलीमे-दिगर।।
अर्थः-यह और और की तृष्णा बुरी बला है। तृष्णा का कोई अन्त नहीं। एक साधु पुरुष का यह नियम होता है कि उसे यदि कहीं से एक रोटी मिल जाये तो वह आधी स्वयं खायेगा और शेष आधी दूसरे फ़कीरों में बांट देगा। यह सन्तोष का उदाहरण है। इसके विपरीत तृष्णा का यह हाल है कि बादशाह के पास यदि सात विलायतों का राज्य भी हो तो भी वह एक विलायत और जीत लेने की चिंता में रहता है।
सन्तों फकीरों के मन में सदा सन्तोष रहता है। वे सांसारिक धन-सम्पत्ति के बादशाह न होकर भी दिल के बादशाह होते हैं और इस प्रकार से वे बादशाहों के भी बादशाह हैं। सन्तोष का सबसे बड़ा खज़ाना उनके पास रहता है और उन्हें किसी अन्य वस्तु की चाह ही नहीं रहती। किन्तु उसकी तुलना में एक लोभी मनुष्य की यह दशा होती है कि उसे सदैव और अधिक प्राप्त करने की तृष्णा लगी ही रहती है। राजा के मन में भी साधुओं का वह आश्रम देखकर लोभ उत्पन्न हो उठा। परमार्थ से हीन होने के कारण वह क्या जानता था कि इस आश्रम से कितनी भलाई का काम हो रहा है और कितने जीव सन्तों के सत्संग को पाकर अपने जीवन का सुधार कर रहे हैं? उसका ध्यान तो केवल इसी ओर था कि साधुओंें को इतने बड़े आश्रम की क्या आवश्यकता है? ऐसा स्थान तो राजाओं के योग्य है।
यह सोचकर राजा ने अपने मंत्री से परामर्श करके आदेश जारी कर दिया कि इस स्थान को शासन के अधिकार में ले लिया जाये। साधुओं को स्थान खाली कर देने के लिये तीन दिन का समय दिया गया। राजा यह आदेश जारी करके अपनी राजधानी को लौट गया।
स्थान पर शासकीय अधिकार की बात शीघ्र ही आस-पास फैल गई। रसिक मुरारी जी के कानों में जब यह समाचार पहुँचा, उस समय वे भोजन कर रहे थे। चूँकि वे बड़े ही सच्चे और दृढ़ विश्वासी गुरु-भक्त थे, इसलिये यह समाचार सुनकर उन्हें बड़ा दुःख हुआ और उनसे रहा न गया। भोजन उसी प्रकार थाली में छोड़ कर मुंह-हाथ धोये बिना ही नंगे पैर गुरु-आश्रम की ओर दौड़े चले गये। शाम होने से पहले ही आठ-नौ मील की दूरी तय करके वहां पहुँच कर स्वामी श्यामानन्द जी के चरणों में प्रणाम किया। गुरु जी ने उन्हें इस दशा में देखा तो बड़े विस्मित हुए। रसिक मुरारी जी ने हाथ जोड़ कर विनय की-महाराज! खाना खाते ही में मुझे राजा के इस अत्याचार का समाचार ज्ञात हुआ तो उसी दशा में ही चल पड़ा, तभी मेरी यह हालत है। आप मुझे आज्ञा दें। मैं राजा से इस सम्बन्ध में बातचीत करुँगा और जैसे भी होगा यह सत्संग का स्थान जिससे लाखों जीवों का कल्याण हो रहा है, गुरुदेव! आपकी कृपा से नष्ट नहीं होने दूँगा।
राजा के अत्याचारी और दुष्ट होने की चर्चा पूरे देश में फैली हुई थी। लोगों ने उसके अत्याचार की अनेक कथाएँ सुन रखी थीं। वहां उस समय स्वामी श्यामानन्द जी के पास जो सेवक लोग एकत्र थे, उनमें से अनेकों ने रसिक मुरारी जी को टोका भी कि राजा अन्यायी है, वह सीधी तरह से मानने वाला नहीं है। यहां दिन-रात उसके नये-नये अत्याचारों की बातें सुनने में आती रहती हैं। वह आपको व्यर्थ कष्ट देगा, इसलिये आप वहां न जायें तो अच्छा होगा।
किन्तु रसिक मुरारी जी बड़े पक्के विश्वासी थे। उन्हें यह विश्वास था कि गुरु-कृपा से मैं सफल मनोरथ हूँगा। यह विचार कर उत्तर दिया-गुरु-सेवा और आम जीवों की भलाई के लिये किसी कार्य को करने में यदि मुझे कोई कैसा ही कष्ट क्यों न झेलना पड़े, मुझे उसकी कोई परवाह न होगी। जैसा कि आप सब लोग कहते हैं, यदि राजा मेरे साथ निरादर से भी पेश आयेगा तो भी मुझे गुरु-सेवा का कार्य अवश्य करना है। और यह भी मेरा अटल निश्चय है कि गुरु कृपा से, जो मेरे साथ है, मेरे सामने कोई भी बाधा कदापि नहीं ठहर सकेगी। इसलिये मुझे राजा के पास जाने से न रोकिए।
स्वामी श्यामानन्द जी उसके दृढ़ निश्चय को देखकर अति प्रसन्न हुए। उन्होने रसिक मुरारी जी के सिर पर अपनी कृपा का हाथ रखकर उसे शुभ आशीर्वाद दिया और राजा के पास जाने की आज्ञा दे दी। रसिक मुरारी जी उस प्रदेश के जाने-माने ज़मींदार और परम भक्त होने के कारण आदरणीय माने जाते थे। राज्य के बड़े-बड़े दरबारी भी उनका आदर करते थे। इस बात से भी उन्हें विश्वास था कि मैं राजा से अपनी बात मनवा लेने में सफल हो सकूँगा। इसलिये गुरु-आज्ञा को शिरोधार्य कर वे चल पड़े।
रसिक मुरारी जी अपने मन में दृढ़ निश्चय करके वहां से चले। मार्ग में उनका अपना गांव और अन्य गांव भी पड़ते थे। राजधानी वहां से काफी दूर थी। मार्ग में लोगों ने भी राजा के अन्याय की बहुत सी बातें सुनाकर रसिक मुरारी जी को रोकना चाहा, परन्तु उनका निश्चय डांवाडोल नहीं हो सका। वे मन ही मन ""गुरु-कृपा'' का सहारा लिये राजधानी की ओर बढ़ते चले गये। उधर राजा को भी किसी ने सूचना पहुँचाई कि जिन सन्तों के आश्रम पर बलपूर्वक अधिकार का आदेश दिया गया है, उनके एक बड़े शिष्य उस आदेश को वापस कराने के लिये आ रहे हैं। यह सुनकर राजा ने एक मतवाला हाथी आगे से छुड़वा दिया कि यदि उनमें सच्ची भक्ति होगी तो हाथी उन्हें कुछ भी नहीं कहेगा। अन्यथा उनका हाथी से बच सकना असम्भव है। रसिकमुरारी जी भी अब तो राजदरबार के निकट पहुँचने वाले ही थे। उनके हितैषियों में से किसी ने भाग कर यह सूचना दी कि आपको मार डालने के लिये राजा ने मस्त हाथी छोड़ रखा है। किन्तु रसिक मुरारी जी का निश्चय दृढ़ था। वे यह सुनकर भी नहीं रुके और गुरु का नाम सुमिरण करते हुये बेधड़क चलते गये। आगे चलने पर सामने से वह मस्त हाथी झूमता हुआ चला आता था।
लोगों की भीड़ यह दृश्य देखने के लिये एकत्र थी। मस्त हाथी को आता देखकर ""भागो-दौड़ो'' के स्वर गूंजने लगे और सब लोग सिर पर पांव रखकर भाग खड़े हुये, परन्तु रसिक मुरारी जी के मन में तनिक भी भय नहीं था। उनके मन में यह दृढ़ निश्चय था कि जब मैं गुरु की आज्ञा को सिर पर रखकर गुरु सेवा का कार्य करने चला हूँ और उनकी कृपा का हाथ और शुभ आशीर्वाद मेरे साथ है तो फिर मुझे भय किस बात का है? सत्पुरुषों ने फरमाया हैः-
गुरु को सिर पर राखिये , चलिये आज्ञा माहिं।
कहै कबीर ता दास को, तीन लोक डर नाहिं।।
गुरु समरथ सिर पर खड़े, कहा कमी तोहि दास।
ऋद्धि सिद्धि सेवा करैं , मुक्ति न छाड़ै पास ।।
अर्थः-परमसन्त श्री कबीर साहिब फरमाते हैं कि जो सेवक गुरु के वचन को शिरोधार्य करके उनकी आज्ञा में चलता है, ऐसे दास को फिर तीन लोक में भी किसी बात का भय नहीं रहता। जिस दास के सिर पर समर्थ गुरु का हाथ है उसे किस बात की कमी है? उसकी सेवा के लिये तो ऋद्धि सिद्धि तक तैयार रहती हैं और मुक्ति तो ऐसे सेवक का कभी साथ छोड़ती ही नहीं।
गुरु की कृपा और दया पर पूर्ण विश्वास रखने वाले रसिक मुरारी जी भी आगे बढ़े। झूमता हुआ गजराज उनके निकट पहुँचा। जिस प्रकार परम भागवत श्री मीराबाई जी के पास राणा ने कपट से आभूषणों की पिटारी में काला नाग भेज दिया था, परन्तु मीराबाई जी ने उस काले नाग में भी अपने भगवान को ही देखा था, उसी प्रकार रसिक मुरारी जी ने भी उस मस्त गजराज के मस्तक पर अपने इष्टदेव भगवान को विराजमान देखा। इष्टदेव के दर्शन पाकर उनका मन प्रसन्नता से झूम उठा और उन्होने अत्यन्त श्रद्धा से नमस्कार किया। दूर खड़ी जनता यह तमाशा देख रही थी। स्वयं राजा भी मंत्रियों सहित राजभवन की छत पर खड़ा यह सब कौतुक देख रहा था। वह इस प्रतीक्षा में था कि अभी थोड़ी ही देर में मतवाला गजराज भक्त को अपनी सूंड में पकड़ कर दूर पटक कर मसल डालेगा और वह प्रसन्न होकर तालियां बजायेगा।
किन्तु अरे ! यह क्या?
राजा, उसके मंत्री और दूर खड़ी जनता-सब की आँखें आश्चर्य से खुली की खुली रह गर्इं जबकि आगे बढ़ते हुये मस्त गजराज की ओर मुख करके रसिक मुरारी जी ने उच्च स्वर से कहा-
गुरुदेव का पवित्र नाम लो प्यारे।
सब पाप धुल जायेंगे तुम्हारे ।।
और उनके इतना कहते ही हाथी उनके पास आकर चुपचाप खड़ा हो गया। रसिक मुरारी जी ने उसकी सूंड पर हाथ फेर कर प्रेम से पुचकारा और उसके कान में दो-चार बार उच्च स्वर से मालिक केपवित्र नाम का उच्चारण किया। फिर बोले-यह भगवान का पवित्र नाम है। इसके श्रवण, मनन और उच्चारण करने से जन्म जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं और जीव कृतार्थ हो जाता है। हाथी उनके पास चुपचाप खड़ा रहा। राजा महल की छत से यह सब देख रहा था। अब वह मंत्रियों के साथ महल से उतरा और रसिक मुरारी जी की ओर चला। अब तक जनता भी गजराज का भय छोड़कर निकट एकत्र होने लगी थी। राजा मंत्रियों सहित वहां आया और रसिक मुरारी जी के चरणों में गिर पड़ा और उनसे क्षमा मांगी। सच्चे भक्तजन तो सदैव ही दयालु स्वभाव के होते हैं, रसिक मुरारी जी ने राजा का अपराध क्षमा कर दिया।
उसके बाद-सत्संग का वह आश्रम उसी प्रकार सन्तों का निवास-स्थान बना रहा और उस आश्रम से अनेकों जीव भक्ति प्रेम और परमार्थ का लाभ उठाते रहे। स्वयं राजा भी अब उनका शिष्य होकर दर्शन पाने को आया करता और हित-चित्त से सेवा किया करता।
यह सब गुरु-कृपा का प्रताप है और है गुरु-सेवा-भक्ति में दृढ़ विश्वास का फल।
सोमवार, 8 अगस्त 2016
रसिक मुरारी
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