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शुक्रवार, 1 जुलाई 2016

STORY


गुरु भक्त अम्बादास

सेवक अथवा शिष्य के लिये सद्गुरु की आज्ञा का पालन करना ही सबसे बड़ा धर्म है। जो सेवक सद्गरु की आज्ञा को वेद-वाक्य समझकर श्रद्धा एवं निष्ठा से उसपर आचरण करता है, वही सद्गुरु की कृपा एवं प्रसन्नता प्राप्त करता है। अन्य शब्दों में सद्गुरु की कृपा एवं प्रसन्नता प्राप्त करने का सबसे सुगम साधन यही है कि सेवक इष्टदेव के प्रत्येक आदेश का ह्मदय से पालन करे। गुरु भक्ति के मार्ग पर चलने वाले जिज्ञासु सेवक की प्रत्येक कार्यवाही वास्तव में सद्गुरु की कृपा एवं प्रसन्नता प्राप्ति हेतु ही होती है। सद्गुरु की प्रसन्नता प्राप्त करना ही उसके जीवन का एकमात्र उद्देश्य होता है। और सद्गुरु की कृपा जहां सेवक पर उतरी, तो समझो कि शिष्य का काम बन गया। जब सद्गुरु सेवक की निष्काम सेवा, दृढ़ निष्ठा एवं अचल विश्वास से रीझ जाते हैं, तो फिर वे सेवक को पलक झपकते में ही उस सच्चे ज्ञान की उपलब्धि करा देते हैं, जिसकी प्राप्ति के लिये ऋषि-मुनि वर्षों कठोर तप-साधना करते हैं। इस विषय में भगवान श्री कृष्णचन्द्र जी महाराज अर्जुन के प्रति उपदेश करते हैं किः-
तद्विद्वि   प्रणिपातेन  परिप्रश्नेन  सेवया।
       उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः।। 4/34
हे अर्जुन! उस ज्ञान को तू तत्त्वदर्शी ज्ञानियों (सत्पुरुषों सद्गुरुओं) की शरण में जाकर प्राप्त कर। उनको श्रद्धापूर्वक दण्डवत् प्रणाम करने से तथा उनकी सेवा-भक्ति करने से वे परमात्म तत्त्व के ज्ञाता सत्पुरुष तुझपर प्रसन्न होकर तुझे उस तत्त्वज्ञान से मालामाल कर देंगे।
    सद्गुरु की आज्ञा चाहे जिस प्रकार की भी हो, चाहे वह उलटी-सुलटी ही प्रतीत हो, परन्तु शिष्य को कर्म-अकर्म का विचार किये बिना श्रद्धापूर्वक उसका परिपालन करना चाहिये। विचारवानों का कथन हैः-
स्वाम्यादेशात्सुभृतस्य न भीः संजायते क्वचित्।
         प्रविशेन्मुखमाहेयं   दुस्तरं   वा   महार्णवम्।।  (पचतंत्र)
     अर्थः- स्वामी की आज्ञा होने पर भी सेवक को कर्म-अकर्म का विचार करना चाहिये क्या? अर्थात् नहीं करना चाहिये। स्वामी की आज्ञा के समक्ष सेवक के लिये भय, भ्रम अथवा संशय कोई वस्तु नहीं है, फिर चाहे उसे सर्प के मुख में घुसना पड़े अथवा महासमुद्र में कूदना पड़े।
उलटे सुलटे वचन कै, शिष्य न मानै दुक्ख।
कहै कबीर संसार में , सो कहिये गुरुमुख।।
वास्तव में देखा जाये तो सद्गुरु की आज्ञा-मौज में तो सदैव सेवक का हित और उसकी भलाई ही छिपी होती है। वह उलटा-सुलटा होता ही कहां है, उनका वचन तो धुरधाम से उतरा हुआ वचन होता है। यदि उनकी आज्ञा किसी को उलटी-सुलटी प्रतीत होती है, तो यह जीव के अपने विचारों की दुर्बलता के कारण ही है। यदि सेवक के विचार परिपक्व हैं अर्थात् सद्गुरु के चरणों मे उसकी दृढ़ निष्ठा और आस्था है, तो फिर वह सद्गुरु के प्रत्येक आदेश को श्रद्धापूर्वक शिरोधार्य कर उसका पालन करने में तन-प्राण से जुट जाता है, क्योंकि उसके ह्मदय में यह दृढ़ विश्वास होता है किः-
गुरु  को सिर पर राखिये, चलिये आज्ञा माहिं।
कहै कबीर ता दास को, तीन लोक डर नाहिं।।
अभिप्राय यह कि परमार्थ-पथ के पथिक के लिए यह अत्यावश्यक है कि सद्गुरु को प्रसन्न कर वह उनकी कृपा का पात्र बने, क्योंकि इस मार्ग में सद्गुरु की कृपा और दया ही सफलता प्राप्त करने का एक मात्र साधन है।
     समर्थ स्वामी गुरु रामदास जी के शिष्यों में अम्बादास जी का नाम बहुत विख्यात है। वे सद्गुरु के सच्चे,आज्ञाकारी एवं प्रिय सेवक थे और सद्गुरु के चरणकमलों में उनकी दृढ़ प्रीति और अचल निष्ठा थी। उन्होने अपने जीवन को मन, वचन और कर्म से सद्गुरु की आज्ञा-मौज के साँचे में ढाल रखा था। सद्गुरु की आज्ञा को श्रद्धापूर्वक शिरोधार्य कर वे हर समय सेवा में लीन रहते। सद्गुरु की पावन सेवा तथा सुमिरण-ध्यान को छोड़कर एक पल के लिये भी उनका चित्त दूसरी ओर नहीं जाता था। इस प्रकार सद्गुरु-सेवा में तत्पर रहते हुये वे हर समय उनकी कृपा दृष्टि के याचक बने रहते।
     जब बीज धरती में डाला जाता है, तोे वह पहले अंकुर के रुप में फूटता है, फिर पौधा बनता है, तत्पश्चात पेड़ बनता है और समय आने पर ही उसमें फल लगते हैं। अम्बादास जी ने भी जो सेवा का बीज बोया था, वह धीरे-धीरे पेड़ बन गया और उसके फलीभूत होने का समय निकट आ गया।
     किस सेवक की कितनी कमाई है और भक्ति की सम्पदा से मालामाल होने का वह अभी अधिकारी हुआ या नहीं, इस बात को तो सद्गुरु ही भलीभाँति जानते हैं और जब शिष्य पूरी तरह इसके योग्य हो जाता है, तो फिर तनिक भी देरी नहीं लगती। देर तभी तक है, जब तक आज्ञा और सेवा की परीक्षा में सफल होकर इस दात को प्राप्त करने का वह पूरा-पूरा अधिकारी नहीं बना। जैसे ही वह इस परीक्षा में सफल हुआ कि वह सद्गुरु की पूर्ण प्रसन्नता एवं कृपा का पात्र बना और भक्ति की सम्पदा से मालामाल हुआ।
     अम्बादास जी की निष्काम सेवा तथा दृढ़ निष्ठा की अन्तिम परीक्षा का समय भी निकट आ गया। एक दिन प्रातःकाल सद्गुरुदेव समर्थ स्वामी श्री रामदास जी अपने शिष्यों के साथ सैर करते हुए वन की ओर जा निकले और बरगद के एक बहुत बड़े वृक्ष के नीचे सबको बैठने को कहा। उस पेड़ के पास एक बहुत गहरा कुआँ था जिसपर पेड़ की एक शाखा लटक रही थी।
     शिष्यों ने मौज देखकर तुरन्त एक ऊँचे स्थान पर आसन बिछा दिया और समर्थ स्वामी श्री गुरु रामदास जी उस पर विराजमान हो गये। तत्पश्चात् आपने शिष्यों को भी बैठ जाने का आदेश दिया। जब सब बैठ गए तो गुरुदेव ने प्रवचनों की वृष्टि आरम्भ कर दी। सभी शिष्य एकाग्रचित्त होकर प्रवचन श्रवण करने लगे। कुछ देर बाद प्रवचन करते-करते समर्थ स्वामी श्री गुरु रामदास जी एकाएक मौन हो गए और संकेत से अम्बादास को निकट आने को कहा। संकेत पाते ही अम्बादास तत्काल अपने स्थान से उठे और श्री गुरुदेव के निकट पहुँचकर हाथ जोड़कर खड़े हो गए मानो आज्ञा की प्रतीक्षा कर रहे हों। गुरुदेव ने वृक्ष की उसी शाखा की ओर जो कुएँ के ठीक ऊपर लटकी हुई थी, संकेत करते हुए कहा-अम्बादास! पेड़ की उस शाखा पर चढ़ सकते हो?
     अम्बादास ने विनम्रतापूर्वक कहा-प्रभो! आपकी कृपा से तो पंगु भी दुर्गम पर्वत पर चढ़ने की शक्ति पा जाते हैं, फिर इस शाखा पर चढ़ना कौन सा कठिन है? गुरुदेव उसका उत्तर सुनकर मुस्करा दिये और उसके हाथों में एक कुल्हाड़ी थमाते हुए बोले-तो फिर ऐसा करो कि यह कुल्हाड़ी लेकर उस शाखा पर चढ़ जाओ और उसे काट डालो।
     ""जो आज्ञा गुरुदेव''-यह कहते हुए अम्बादास ने कुल्हाड़ी ली और उस पेड़ पर चढ़ गए और फिर उस शाखा पर जा पहुँचे। वे कुल्हाड़ी चलाने ही जा रहे थे कि गुरुदेव ने पुनः फरमाया- अम्बादास! पेड़ की ओर मुँह कर लो और शाखा को उद्गम स्थान से काट दो।
     गुरुदेव का यह आदेश सुनकर अन्य सभी शिष्य एक-दूसरे का मुँह ताकने लगे, क्योंकि इस प्रकार से शाखा काटने का अर्थ था सीधा कुएँ में गिरना और कुआँ इतना गहरा था कि उसमें गिर जाने पर बचना असम्भव था। सभी शिष्य गुरुदेव की आज्ञा श्रवण कर सोच में पड़ गये, परन्तु गुरुदेव के सम्मुख मुख खोलने
का किसी का भी साहस न हुआ।
     किन्तु अम्बादास के मन में किसी प्रकार का भी कोई विचार उत्पन्न न हुआ। उनकी दृष्टि में सद्गुरु की आज्ञा सर्वोपरि थी और उन्होने सद्गुरु की आज्ञा-मौज में स्वयं को लय कर रखा था। यही कारण था कि सद्गुरु को भी वे अत्यन्त प्रिय थे। सत्पुरुषों के वचन हैं किः-
सेवक स्वामी एक मति, मति में मति मिल जाय।
चतुराई  रीझैं   नहीं ,  रीझैं  मन  के  भाय ।।
अस्तु, अम्बादास ने पेड़ की ओर मुख कर लिया और उस शाखा को जिसपर वे खड़े थे, जड़ से काटना आरम्भ कर दिया। यहाँ आम संसारी लोगों के मन में कुछ सन्देह उत्पन्न हो सकता है कि यह किस प्रकार की आज्ञा है, क्योंकि इसमें तो मृत्यु का भय है। इससे भला शिष्य को क्या लाभ पहुँच सकता है? किन्तु यथार्थता यह है कि आम संसारी लोगों की बुद्धि इस बात की गहनता को समझ सकने में असमर्थ है। यह भक्ति परमार्थ का भेद है जिसे सच्चा सेवक ही समझ सकने में समर्थ है। एक सच्चा सेवक ही इस बात को भलीभाँति समझता और जानता है कि सद्गुरु की प्रत्येक कार्यवाही में उसका हित एवं कल्याण छिपा हुआ है। वास्तव में इस प्रकार की कार्र्यवाही महापुरुष शिष्य की घड़त के लिये ही करते हैं। बाह्ररुप से तो वे शिष्य की घड़त करते हैं, परन्तु अन्दर ही अन्दर अपनी दया का हाथ भी रखते हैं, ठीक उसी प्रकार जैसे कुम्हार बर्तन बनाते समय बाहर से तो चोट मारता है, परन्तु अन्दर हाथ भी रखता है।
गुरु कुम्हार सिष कुँभ है, गढ़ गढ़ काढ़ै खोट।
                     अंतर  हाथ  सहार  दै , बाहर  बाहै  चोट ।। (श्री कबीर साहिब जी)
दूसरी बात यह भी है कि एक सच्चा सेवक सद्गुरु के उपकारों को हर समय याद करता रहता है। वह इस बात को जानता है कि वे भक्ति के दाता हैं, जिस भक्ति को पाकर मनुष्य जन्म-मरण के चक्कर से सदा के लिए मुक्त हो जाता है। अतएव वह गुरुदेव के चरणों में अपने प्राण निछावर करने को भी हर समय तत्पर रहता है। सत्पुरुषों के इन वचनों को वह हर समय स्मरण रखता है किः-
यह तन विष की बेलरी, गुरु अमृत की खान।
                    सीस दिये जो गुरु मिलें, तो भी सस्ता जान।। (श्री कबीर साहिब जी)
अस्तु, अम्बादास तो सद्गुरु की आज्ञा पाकर शाखा काटने में जुट गए, और इधर गुरुदेव ने फिर से प्रवचनों की वृष्टि आरम्भ कर दी। किन्तु शिष्यों का मन उस समय प्रवचन सुनने में कहाँ था? उनका ध्यान तो उस समय अम्बादास की ओर लगा हुआ था। उन लोगों के मन में तो रह-रहकर यही विचार उठ रहा था कि अभी शाखा कटी और अम्बादास गहरे कुएँ में गिरे। और हुआ भी यही, क्योंकि कुछ ही देर बाद तड़ाक की एक आवाज़ के साथ शाखा टूट कर वृक्ष से अलग हो गई और उसके साथ ही अम्बादास कुएँ में जा गिरे।
     सभी शिष्य चौंककर उठ खड़े हुए, परन्तु समर्थ स्वामी श्री गुरु रामदास जी उसी प्रकार शान्तिपूर्वक अपने आसन पर विराजमान रहे, मानो कुछ हुआ ही न हो। शिष्य-मण्डली में उथल-पुथल मच गई। वे सोचने लगे कि इतने गहरे कुएँ में गिरने पर अम्बादास जीवित कहाँ बचे होंगे? गुरुदेव को उसी प्रकार शान्तिपूर्वक बैठे देखकर उनके मन में अनेक प्रकार की शंकायें उठने लगीं।
     किन्तु अम्बादास की तो दशा ही कुछ और थी। वे जब कुएँ में गिरे तो उन्हें ऐसा प्रतीत हुआ जैसे किसी ने अपने हाथों का सहारा देकर बड़े आराम से उन्हें कुएँ की तह में खड़ा कर दिया हो। यह अनुभव कर उन्हें और भी अधिक विस्मय हुआ कि कुआँ बिल्कुल सूखा है और उसमें नाममात्र भी पानी नहीं है। उन्होने गुरुदेव का स्मरण कर आँखें खोलीं, परन्तु यह क्या? कुआँ दिव्य प्रकाश से आलोकित हो रहा था और उसमें प्रकाश के मध्य सद्गुरुदेव समर्थ स्वामी श्री रामदास जी रत्नजड़ित सिंहासन पर विराजमान मन्द-मन्द मुस्काते हुए उसे आशीर्वाद प्रदान कर रहे थे। इस अलौकिक दृश्य को देखते ही अम्बादास आत्म-विभोर हो उठे और आत्मिक आनन्द के समुद्र में डूब गए। उन्हें अपने तन-बदन की कुछ भी सुधि न रही।
     इधर सेवकों के ह्मदय में तो हलचल मची हुई थी, अन्ततः उनसे रहा न गया और एक सेवक ने गुरुदेव के चरणों में विनय की-गुरुदेव! शाखा के कटने से अम्बादास कुएँ में गिर पड़े हैं। उनकी चीख भी हम लोगों को सुनाई नहीं दी। ऐसा प्रतीत होता है कि कुएँ में गिरते समय वे मूर्छित हो गये हैं। मेरे विचार में अम्बादास को कुएँ से निकालने का हमें तुरन्त प्रबन्ध करना चाहिए।
     समर्थ स्वामी श्री गुरु रामदास जी यथास्थान बैठे-बैठे उच्च स्वर से बोले-अम्बादास! तुम ठीक तो हो? गरुदेव के ये वचन जैसे ही अम्बादास के कानों से टकराये, उनकी चेतना लौट आई और इसके साथ ही गुरुदेव का वह दिव्यस्वरुप तथा दिव्य प्रकाश भी लुप्त हो गया। अम्बादास ने उत्तर दिया, प्रभो! सेवक आपकी असीम अनुकम्पा से बड़े आनन्द में है।
     गुरुदेव ने पुनः फरमाया-इतनी देर से कुएँ में क्या कर रहे हो? शीघ्र बाहर आओ। अम्बादास ने उत्तर दिया-प्रभो! अभी आया।
     यह कहकर अम्बादास ने बाहर निकलने के लिए जैसे ही दृष्टि ऊपर उठाई, तो क्या देखते हैं कि वे कुएँ की मुँडेर के बिल्कुल नीचे खड़े हैं। वे पहले तो आश्चर्य में पड़ गए और सोचने लगे कि कुआँ तो बहुत गहरा है, मैं इतना ऊपर कैसे आ गया, परन्तु फिर लीलामय गुरुदेव की लीला समझकर वे गुरुदेव की जय-जयकार बुलाते हुए छलांग लगाकर कुएँ के बाहर आ गए और श्री चरणों में सिर रखकर उन्हें अश्रुओं से पखारने लगे।
     गुरुदेव ने अम्बादस के सिर पर अपना वरद एवं कृपापूर्ण कर कमल रखते हुए फरमाया-उठो वत्स! तुम्हारा कल्याण हो। तुम्हारी सेवाभावना, श्रद्धा, प्रेम तथा विश्वास पर हम अति प्रसन्न हैं। आज से तुम्हारा नाम "श्री कल्याण' हुआ।
     गुरुदेव के आशीर्वाद से अम्बादास भक्ति की सम्पदा से मालामाल हो गए। कालांतर में वे श्री कल्याण जी के शुभ नाम से सुविख्यात हुए और उन्होने अनेकों जीवों को सत्पथ दरसाया।
     इसके विपरीत अन्य शिष्य कहने के लिए तो शिष्य थे, परन्तु गुरुदेव के वचनों पर उन्हें पूरी तरह विश्वास नहीं था, तभी तो उनके मन में अनेक प्रकार के संकल्प-विकल्प और शंकायें उठीं और उन्होने अपनी बुद्धि के अनुसार जाँचा-परखा कि गुरुदेव के वचन सही हैं या गलत। सत्य तो यह है कि मन के धोखे में आकर ही मनुष्य के मन में ऐसे-वैसे विचार उठते हैं, क्योंकि मन नहीं चाहता कि वह भक्ति की सम्पदा से मालामाल हो। वह तो सदा जीव को लक्ष्य से भटकाता है। वास्तव में तो सच्चे सेवक की प्रत्येक कार्यवाही सद्गुरु की प्रसन्नता तथा कृपा प्राप्ति के लिए होनी चाहिए और इसके लिए उसे उनके प्रत्येक वचन को वेद-वाक्य समझकर उसका अक्षरश¬ः पालन करना चाहिए। गुरुदेव के वचन को मन-बुद्धि की कसौटी पर तोलकर देखना कि यह वचन हमारे हित में है या नहीं, यह तो मानो मन के हाथो में खेलना और सरासर धोखा खाना है। इसलिए सच्चे सेवक को मन से सदा सावधान और सतर्क रहना चाहिए। सन्तों के हितकारी वचन हैंः-
    सत्य  असत्य  विचार  न कीजै ।
                 गुरु को कथन मानि सब लीजै।।  (गुरु महिमा)
जीव यदि सद्गुरु के वचन को बुद्धि की कसौटी पर परखता है तो उसका एकमात्र कारण उसके अन्दर विद्यमान अहंता तथा अहंकार की भावना है, जिसके कारण वह स्वयं को अधिक बुद्धिमान, चतुर और सयाना समझता है। और जब तक मन में अहंता-अहंकार की यह भावना विद्यमान है, तब तक वह भक्ति की सम्पदा प्राप्त नहीं कर सकता। भक्ति की दात प्राप्त करने के लिए यह आवश्यक है कि सेवक अहंता-अहंकार को दिल से बाहर निकाल फेंके और अहम्भाव से खाली होकर सद्गुरु की शरण में जाए। सन्तों का कथन हैः-
ज़ि दावा तिही आ कि ता पुर शवी।
                          चूँ पुर आमदी  ज़ां  तिही मे  रवी।। (हज़रत मौलाना रुम साहिब)
ऐ मनुष्य! कुल मालिक सद्गुरु की शरण में अहंता-अहंकार के दावे से खाली होकर आ ताकि तू उनकी बख्शिश से भरा जाये। जब तू पहले ही अहंता-अहंकार से भरा हुआ आएगा, तो फिर बख्शिश से खाली ही जाएगा।
     इस अहंता-अहंकार के मन में विद्यमान होने के कारण ही जीव का मन सद्गुरु की आज्ञा-मौज को सत्य-सत्य करके नहीं मानता और उसका पालन करने से कतराता है, फलस्वरुप सद्गुरु की प्रसन्नता तथा कृपा प्राप्त करने से जीव वंचित रह जाता है। और जब तक वह सद्गुरु की प्रसन्नता एवं कृपा का पात्र नहीं बनता, भक्ति की अनमोल दात प्राप्त करने का अधिकारी क्योंकर बन सकता है।
     इसलिए भक्ति-पथ पर चलने वाले जिज्ञासु को चाहिये कि अहंता-अहंकार से अपने मन को सर्वथा रीता कर दे, क्योंकि ये जिज्ञासु को न केवल परमार्थ-पथ पर आगे बढ़ने से ही रोक देते हैं, अपितु उसे अवनति की गहरी खाई में भी धकेल देते हैं। जहाँ से जन्मो-जन्म तक निकलना उसके लिए कठिन हो जाता है। इन शत्रुओं से बचने का केवल एक ही उपाय है कि सेवक अपना मन पूरी तरह सद्गुरु के हवाले कर दे। मन में कोई विचार भी उसका अपना न हो। उसका मन कोरे कागज़ के समान हो। उस पर जो कुछ भी सद्गुरु अपनी कृपा से लिख दें, वही उसके विचार हों। उसका अपना कोई अलग अस्तित्व न हो। जिन्होने अपने आपको, अपने अस्तित्व को, अपनी अंहता को मिटाया, उन्होने ही सब कुछ पाया। इसलिये अंहता-अहंकार को मिटाना है और सद्गुरु की आज्ञा-मौज के सांचे में जीवन को ढालकर उनकी कृपा एवं प्रसन्नता का पात्र बनना है  और भक्ति की सच्ची एवं शाश्वत सम्पदा प्राप्त करके अपना जीवन धन्य करना है।

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