सच्चा प्रेम ( प्रेमी बालक मोहन)
सच्चा प्रेम बड़ा बलवान है। यह सब कुछ करा लेता है। प्रेम की लीला अपरम्पार है। यह प्रेम एक शेर की तरह है। जब यह शेर दिल के जंगल में आ जाता है, तो नफसानी खाहिशें, संशय, वहम, भ्रम आदि के छोटे छोटे हिंसक पशु इसकी गरजदार आवाज़ को सुनकर आप से आप भाग खड़े होते हैं। यह वह बाज़ है कि जब दिल की टहनी पर आन बैठता है, तो इसे देखते ही कामनाओं और वासनाओं के दुःख देने वाले पक्षी खौफ के मारे फड़फड़ाकर उड़ जाते हैं। यह कमज़ोरों को ताकतवर बना देने वाला है। जिन जीवों ने प्रेम के रस को चखा और पाया है, वही खूब जान सकते हैं कि सच्चे प्रेम में क्या ताकत है और इसमें कैसे कैसे लाज़वाब करिश्मे हैं? जिनके दिलो में प्रेम ने घर नहीं बनाया, वे भला इसके भेदों को क्योंकर जान सकते हैं।
सच्चे प्रेमियों के जीवन संसार में धन्य हैं जो प्रेम के मार्ग में आकर दुनियावी हवसों की ज़िल्लत से ऊपर उठकर ऊँची रुहानी मन्ज़िलों पर पहुँचते हैं। सच्चे प्रेम की अपार लीला के ब्यान में यहाँ एक कथा दी जा रही है।
थोड़े समय की बात है किसी गाँव में एक विधवा ब्रााहृणी रहती थी। अति गरीब और कंगाल। उसके छः वर्ष का छोटा सा बालक था। बालक का नाम था मोहन। मोहन को छोड़कर उस विधवा ब्रााहृणी का और कोई नहीं था। ब्रााहृणी का यह काम था कि अड़ोस-पड़ोस के खाते- पीते घरानों में से भिक्षा माँगकर ले आती और अपना तथा अपने बच्चे का पेट ज्यों त्यों करके भर लेती। किसी दिन अगर भीख कम मिलती, तो माँ खुद उपवास करके बच्चे को खिला देती। इसी तरह जैसे तैसे माँ बेटे की गुज़र चलती थी। श्री प्रभु सबको देने वाले हैं।
एक बार ब्रााहृणी के दिल में ख्याल आया कि ब्रााहृण का बच्चा हो और विद्या से कोरा रह जाये, यह कोई अच्छी बात नहीं है। जिस तरह भी हो सके बच्चे को कुछ न कुछ विद्या ज़रुर पढ़ानी चाहिये। उस गाँव में तो कोई पाठशाला थी नहीं। अलबत्ता वहाँ से दो कोस पूरे दूसरे कसबा में पाठशाला थी। उसने बच्चे को साथ लिया और पाठशाला के पण्डित के पास ले गई मिन्नत समाजत और करुण पुकार के बाद उसने पण्डित जी को इस बात पर राज़ी कर लिया, कि बिना फीस लिये बच्चे को पढ़ायेंगे। चुनाँचे छः वर्ष का मोहन अब रोज़ाना पाठशाला जाने लगा।
पाठशाला जाने के लिये छः वर्ष के अल्पायु बालक को रोज़ाना दो कोस सुबह और दो कोस शाम को सफर तय करना पड़ता। गाँव से कुछ दूर पर एक मील भर के घेरे में एक घना जंगल पड़ता था। कभी कभी पाठशाला से छुट्टी देर में होती, तो घर तक पहुँचते पहुँचते अंधेरा होने लगता था। जंगल में अकेले बच्चे को डर प्रतीत होता। एक रोज़ इत्तिफाक से किसी त्यौहार के कारण छुट्टी ज़रा देर में हुई। बालक मोहन घर को लौटता हुआ जब उस घने जंगल के करीब पहुँचा, तो अंधेरा काफी हो चुका था। जंगली जानवरों की भयानक आवाज़ें आ रही थीं। बच्चा उस दिन बहुत डरा और रोता रोता किसी तरह घर पहुँचा।
घर पहुँचकर बालक मोहन ने भर्राई हुई आवाज़ में माँ से प्रश्न किया,""माँ! और बच्चों को तो पाठशाला पहुँचाने और पाठशाला से वापिस लाने के लिये उनके नौकर जाते हैं। मुझे अकेले जंगल में से गुज़रते डर लगता है। माँ! मुझे भी एक नौकर रख दे।'' उत्तर में माँ बेचारी रो पड़ी। और करती भी क्या? उसके पास धरा ही क्या था, जिससे वह नौकर रख लेती। यह भी शुक्र है कि मालिक की दया से किसी न किसी तरह दोनों के पेट भरने का बन्दोबस्त चलता था। बच्चे ने माँ को रोते देखा, तो वह भी और ज्यादा रो पड़ा। रोता हुआ वह बोला,""माँ! तुम रोती क्यों हो? क्या हमारा और कोई नहीं है?''
माँ उसी प्रकार रोती हुई बोली,""बेटा! क्या बताऊँ? एक गोपाल के सिवा और हमारा है ही कौन?'' बालक मोहन कुछ खुश होकर बोला,""माँ! गोपाल कौन है? वह मेरा क्या लगता है? मैं तो उसे जानता नहीं।'' बच्चे के इस भोलेपन पर माँ फिर बोली,""बेटा! गोपाल तेरा भाई लगता है। तू उसे जाने या न जाने, वह तो तुझे अच्छी तरह जानता है।''
छः वर्ष का अबोध बालक इन भेद भरी बातों को भला क्या समझ सकता। वह फिर पूछने लगा,""अच्छा माँ! अगर वह मेरा भाई है तो हमारे घर क्यों नहीं आता? वह रहता कहाँ है, भला यह तो बता?''
माँ ने समझाया,""बेटा! वह तेरा भाई है। न केवल तेरा और मेरा, बल्कि सभी दीन दुखियों, गरीबों और निरासरोें का आसरा है। इसीलिये उसे दीनबन्धु भी कहते हैं। उसके रहने की जगह तू पूछता है, सो वह ऐसी कौन सी जगह है जहाँ गोपाल नहीं रहता। वह तो हर समय हर जगह मौजूद रहता है। और जो तू पूछता है कि वह हमारे घर क्यों नहीं आता? वह तो हमेशा हमारे घर भी आता है, मगर वह सबको दिखलाई नहीं देता। उसे केवल वही देख सकता है, जिसके ह्मदय में सच्चे प्रेम की आँखें हैं। जब कोई दुःखभरी पुकार से उसे बुलाता है, तो वहीं प्रगट होकर सहायता करता है।'' इतना कहते कहते ब्रााहृणी की आवाज़ भर्रा गई और उसकी आँखें छलछला उठीं।
छः वर्षीय बच्चे की समझ में इतनी बातें क्यों कर आतीं। वह तो केवल इतना समझ सका कि गोपाल नाम का कोई उसका भाई है, जो दुःख और संकट के समय सुमिरण करने पर सहायता के लिये आ सकता है। उसने फिर अपनी तोतली ज़बान में प्रश्न किया,""अच्छा माँ! यह तो बताओ कि जब मुझे जंगल में से गुज़रते डर लगने लगे, तो क्या गोपाल भाई मेरी सहायता कर सकेगा?''
माँ बोली,"" हाँ बेटा! वह जंगल में भी रहता है। जिस समय और जिस जगह कोई सच्चे दिल से और सच्चे प्यार से उसको याद करता है तो वह वहाँ उसकी सहायता को मौजूद रहता है। तुझे जब जंगल में भय और दुःख का सामना हो, तो सच्चे दिली भाव से उसे बुलाना वह गरीबों, बेकसों और दुखियों का सब दुःख हरने वाला है। वह अवश्य तेरी सहायता करेगा।''
बच्चे का धीरज बँध गया, अब उसे भरोसा हो गया कि जंगल में कभी डर लगेगा तो मैं दुःखभरी आवाज़ से गोपाल भाई को पुकारुँगा और वह तत्काल वहाँ आकर मुझे हर तरह के कष्ट से बचा लेगा। इत्तफाक से दूसरे ही रोज़ ऐसा हुआ भी। मोहन को उस दिन पाठशाला से लौटते कुछ देर हो गई। जंगल में से गुज़रते उसे डर लगा। वह लगा दुःखभरी आवाज़ में पुकारने, ""भैय्या गोपाल! भैय्या गोपाल! कहाँ हो तुम-मुझे यहाँ अकेले डर लगता है-जंगल बहुत भयानक है। आओ-गोपाल भाई-जल्दी आओ।''
दीनबन्धु तो हर समय दीन-दुखियों की पुकारों को सुनते हैं। भोले भाले बालक के सरल प्रेममयी ह्मदय की सच्ची पुकार पर उनका दिल क्यों न पसीजता। बच्चे की करुण पुकार के उत्तर में तत्काल ही आवाज़ सुनाई दी,""घबराओं नहीं भैय्या! डरो मत। मैं यहाँ हूँ तुम्हारे साथ ही।'' सरल स्नेहमयी प्रभु की सरल वाणी सुनकर बच्चे का सब भय जाता रहा। उसे आवाज़ सुनाई दी थी, किन्तु भाई नहीं दिखलाई दिया। इसलिये वह फिर पुकारने लगा,""गोपाल भाई! तुम मेरे पास आ जाओ ना। तुम्हारे बिना मुझे भय मालूम होता है।''
अब की दफा बालक मोहन ने देखा कि घने वृक्षों के झुण्ड में से एक साँवले रंग का सुन्दर ग्वाल-बाल निकल कर उसकी तरफ आ रहा है। उसके सिर पर मोरपंखों का मनोहर मुकुट था। मस्त घुंघराले बाल लहरा रहे थे। हाथ में थी एक बाँसुरी। बदन पर पीताम्बर। कमल-पुष्पों सी आँखें। सूर्य का सा तेज़। मनोहर मुखड़े से नूर बरसता था। उसने आते ही मोहन की उँगली थाम ली, और उसे मीठी मीठी बातों में लुभाता, हँसाता-खिलाता घर की तरफ ले चला। गाँव के निकट पहुँचकर उसने मोहन का हाथ छोड़ दिया, और खुद-यह जा-
वह जा-नज़रों से ग़ायब हो गया।
घर पहुँचकर मोहन ने माँ से सब किस्सा ब्यान किया। बच्चे की ज़ुबान से यह हाल सुनकर ब्रााहृणी प्रेम मे मगन हो गई। उसका जी भर आया। गला रुँध गया। आँखों के आँसुओं की झड़ी सी लग गई और वह गद्गद होकर श्री प्रभु को धन्यवाद देने लगी। उसने कहा,""हे भगवान! हे दीनबन्धु! दुखियों और गरीबों के सहारे! हे भव-भयहारी नाथ!!! आप बड़े दयामयी हो। आपकी लीला और महिमा अपरम्पार है। एक बच्चे की सरल पुकार पर आपने इतना कष्ट किया। आपकी महिमा को कौन जान सकता है? द्रौपदी और गज की पुकारों पर भी आप इसी तरह दौड़े हुये चले आये थे। दीनबन्धु! आप धन्य हैं, आपकी लीला धन्य है, और आपके सच्चे प्रेमी धन्य हैं।''
अब तो बालक मोहन का यह रोज़ाना का दस्तूर हो गया कि वह पाठशाला से लौटते समय जब जंगल के करीब पहुँचता, तो गोपाल भाई को पुकारता और वे तत्काल आ जाते। वे उसके साथ प्यार भरी मीठी मीठी बातें करते उसके साथ खेलते, और उसे घर तक पहुँचाकर लौट जाते। सरलह्मदय का प्रेमी बालक रोज़ाना श्री प्रभु का दर्शन पाता और आनन्द में मगन हो उठता। माँ भी बच्चे से रोज़ाना की श्री प्रभु की लीलायें सुनती और प्रेम के आनन्द में भर जाती।
एक रोज़ पाठशाला के पण्डित जी के यहाँ श्राद्ध था। उस दिन पण्डित जी सब लड़कों को कुछ न कुछ लाने के लिये कह रहे थे। सब लड़कों को अपनी अपनी भेंंट लानी थी। मोहन ने भी भोलेपन से पूछा,"" पण्डित जी! मैं क्या भेंट लाऊँ?'' पण्डित जी को उसकी माता की गरीबी और कँगाली का सब हाल मालूम था। वे हकारत से बोले, ""अरे जा! तू क्या लावेगा? घर में है ही क्या तेरे, जो तू लायेगा? बाप न मारी मेंढकी बेटा तीर अन्दाज़।'' पण्डित जी के इस व्यंग की परवाह न करते हुए जिद्द की, ""नहीं पण्डित जी! मैं ज़रुर ही कुछ न कुछ लाऊँगा। आप ही कह दीजिये कि मैं क्या लाऊँ?''
पण्डित जी ने आखिर कहा,""अच्छा जाओ! तुम एक लोटा भर दूध ले आना।'' घर पहुँचकर मोहन ने मां से ज़िक्र किया कि कल पण्डित जी पाठशाला में एक श्राद्ध करा रहे हैं, उसके लिये एक लोटा भर दूध ले जाना होगा। माँ बोली-""बेटा! अपने घर में दूध कहाँ धरा है? पड़ोस के घरों में दूध तो बहुत होता है, मगर हम गरीबों को तो माँगने पर भी कौन देने लगा है?''
मोहन ने रोकर जिद्द की कि माँ उसे कहीं न कहीं से लोटा भर दूध का प्रबन्ध कर दे, नहीं तो वह क्या मुँह लेकर पाठशाला में जायेगा। माँ सोचने लगी कि वह क्या करे। इतने में उसे याद हो आया उसने कहा,""बेटा मोहन, वह तेरा गोपाल भाई जो है। सुबह पाठशाला जाते समय उसी से एक लोटा भर दूध माँग लेना। वह तो तुझे ज़रूर ही ला देगा।''
चुनाँचे दूसरी सुबह को पाठशाला जाते समय जंगल में पहुँचकर मोहन ने आवाज़ दी,""गोपाल भाई! जल्दी आओ।'' उत्तर में आवाज़ आई,""आज सुबह सुबह ही क्या हो गया तुझे, जो तू मुझे बुलाने लगा? मैं इस समय नहीं आऊँगा। आज से पहले तो तूने सुबह के समय मुझे कभी नहीं बुलाया था। शाम को तो भला डर लगता है। इस समय तुझे काहे का डर है रे?'' मोहन बोला,"" नहीं गोपाल भाई! मैं डरता नहीं हूँ, किन्तु आज एक ज़रुरी काम से बुलाया है। आ जाओ भैय्या!'' बच्चा मचल उठा।
बच्चे की हठ देखकर आखिरकार दीनबन्धु को आना ही पड़ा। उनके आ जाने पर मोहन ने कहा,""गोपाल भाई! आज हमारे पण्डित जी के यहाँ एक श्राद्ध कराया जा रहा है। उन्होने मुझसे एक लोटा भर दूध लाने को कहा था। न ले जाने से लज्जा होगी। अच्छे भैय्या! तुम मुझे एक लोटा भर दूध ला दो, तो बड़ी अच्छी रहे।''
उत्तर में गोपाल भाई का हाथ आगे बढ़ा,""यह ले! यह रहा तेरा लोटा भर दूध। मैं पहले ही से तेरे लिये
ले आया था ले जा इसे।'' और एक चाँदी का चमकता लौटा दूध से भरा हुआ मोहन के हाथ में आ गया। मोहन ने लोटा थामा और खुशी-खुशी पाठशाला की तरफ चल दिया। आज वह इतना खुश था, गोया तीन लोक का राज्य उसे मिल गया हो। उसकी खुशी ठीक भी थी। श्री भगवान के पवित्र प्रेम का प्रसाद है भी कुछ ऐसी ही चीज़ कि तीन लोक का राज्य भी उसके मुकाबले में क्या हैसियत रख सकता है?
खुशी और उत्साह से भरा हुआ मोहन पाठशाला पहुँचा। पण्डित जी सब घरों से और लड़कों से आये हुये पदार्थों को संभालने में व्यस्त थे। उन्होंने मोहन की तरफ कोई तवज्जुह नहीं दी। मोहन बहुत देर तक इन्तज़ार करता रहा कि पण्डित जी ज़रा फारिग हो लें तो उसका दूध भी संभाल लेवें। मगर जब उन्होंने उस पर बिल्कुल नज़र तक ही न की और इधर उधर सामान और काम संभालने में आते जाते नज़र आने लगे। तब मोहन उनके आगे पीछे होकर बार बार याद दिलाने लगा, ""पण्डित जी! मैं दूध लाया हूँ।'' एक दो बार तो अब भी पण्डित जी ने कुछ ख्याल न दिया, किन्तु जब वह कई बार यही बात दोहरा चुका, तो पण्डित जी ज़रा कड़वे होकर बोले, ""अरे नौकर! ले जाओ इस लड़के का दूध और हटाओ इसे। ज़रा सा दूध लाकर आसमान सिर पर उठा रखा है इसने। ले जाओ इसका दूध और किसी बरतन में डाल लो।''
पण्डित जी के ये सख्त शब्द सुनकर बेचारे मोहन का सादा दिल बैठने सा लगा। उसका उत्साह जाता रहा। उसके सरल ह्मदय पर चोट लगी, और उसकी आँखें आँसुओं से तर हो गई। अपने प्यारे गोपाल भाई के प्रेम प्रसाद का यह निरादर उससे सहा नहीं गया। वह फूट कर रो पड़ा। नौकर ने उसके हाथों से दूध का लोटा ले लिया, और बोला,""अरे बावले! रोता क्यों है। यह ले, मैं तेरा दूध लिये लेता हूँ।'' यह कहकर उसने दूध का लोटा मोहन से लिया और एक बरतन में दूध डाला। वह बरतन भर गया मगर लोटा फिर भी भरा रहा। तब उसने एक दूसरे गिलास में उसे उँड़ेला। वह गिलास भर गया, मगर लोटा फिर भरे का भरा था। तब उसने उसे एक बड़ी सी हाँडी में उँड़ेल दिया। वह हाँडी भी भर गई, मगर फिर भी लोटा खाली न हुआ। अब तो नौकर हैरान रह गया। दौड़ा दौड़ा वह पण्डित जी के पास पहुँचा और यह अनोखा तमाशा कह सुनाया। सुनकर पण्डित जी और उनके दूसरे सब साथी वहाँ आ गये। सबके सामने एक बहुत बड़ी कड़ाही मँगाकर उसमें वह दूध का लोटा उँड़ेला गया। वह कड़ाही भी भर गई, मगर लोटा ज्यों का त्यों भरा ही रहा। इसी तरह बहुत से छोटे बड़े बरतन जो भी वहाँ मौजूद थे, सब दूध से भर लिये गये, मगर लोटा फिर भी खाली न हुआ। अब तो सब अचम्भे में पड़े। हैरान होकर पण्डित जी ने पूछा,""बेटा मोहन! यह दूध तू कहाँ से लाया था?''
लड़के ने अति भोलेपन से उत्तर दिया,"'लाता और कहाँ से? मेरे गोपाल भाई ने ही तो दिया था यह दूध।'' पंडित जी और भी आश्चर्यचकित हुये, बोले,""अरे! तेरा तो भाई कोई नहीं था। यह गोपाल भाई कौन है?'' मोहन हँसता हुआ बोला,""वाह! है क्यों नहीं? गोपाल मेरा बड़ा भाई है। वह जंगल में रहता है। हर रोज़ वह मुझे वहाँ मिलता है। वह मेरे साथ हँसता खेलता है और मुझेे रोज़ाना घर पहुँचाने जाता है। मेरी माता कहती हैं कि वह हर जगह मौजूद रहता है, मगर सबको दिखलाई नहीं देता। जब दुःखी दिल से कोई उसकोे पुकारता है, तो वह तत्काल वहीं आ जाता है। और उससे जो कुछ भी माँगा जाये, वह दे देता है।''
अब पंडित जी पर भेद खुला। उन्होंने मोहन को छाती से लगाकर बहुत प्यार किया। अब उस दूध की खीर बनाकर श्राद्ध में परोसी गई, तो खाने वाले उसके रसीले स्वाद की उपमा करते नहीं थकते थे। गोपाल भाई के हाथों से दिये हुये दूध का स्वाद तो स्वर्ग लोक के अमृत से भी नहीं हो सकता, तब किसी दुनियावी पदार्थ में भला वैसा रस क्योंंकर हो सकता है। उस दूध के बने भोजन के श्राद्ध से पण्डित जी के पितरों को तृप्ति मिलने के साथ ही साथ मुक्ति का लाभ भी हो गया।
श्राद्ध हो चुका। सब लोग घरों को जा चुके। शाम हो रही थी। अब पण्डित जी ने मोहन को साथ लिया
और बोले,""चल बेटा! मैं तुझे तेरे घर तक छोड़ आऊँ। तू मुझे अपने गोपाल भैया का ज़रा दर्शन करा देना। करा देगा ना?'' भोला भाला मोहन झट बोल उठा,""पण्डित जी! मेरा गोपाल भाई तो बड़ा अच्छा है वह आवाज़ देते ही तत्काल आ जाता है। चलिये, मैं आपको उसका दर्शन करा दूँ।''
दोनों चले। जंगल के निकट पहुँचते ही मोहन ने पूर्ववत् आवाज़ लगाई। उत्तर में आवाज़ आई,""आज तो तू अकेला नहीं है, मोहन भाई! आज तो तुझे डर नहीं लगता होगा। फिर मुझे क्यों बुलाता है?'' मोहन ने कहा,""नहीं गोपाल भैया! यह बात नहीं है। मेरे पण्डित जी तुम्हारा दर्शन चाहते हैं, इसलिये तुम आ जाओ।''
भोले बच्चे का हठ देखकर गोपाल भाई आ तो गये तत्काल ही। पर वे तो मोहन के लिये ही आये थे। पण्डित जी को वे दिखाई न दिये। उन्हें केवल उनकी आवाज़ ही सुनाई पड़ती थी। मोहन कहने लगा,""देखा पण्डित जी! आपने मेरे गोपाल भाई को। यह वही है। मेरी एक ही आवाज़ पर तुरन्त आ जाता है ना? मेरा प्यारा गोपाल भाई!'' हैरान होकर पण्डित जी बोले,""कहाँ हैं वे? मुझे तो केवल आवाज़ ही सुनाई पड़ती है सूरत नज़र नहीं आती।''
अब मोहन ने प्यारी ज़िद्द के साथ कहा,""अरे गोपाल भाई! यह क्या बात है? तुम हमारे पण्डित जी को क्यों नहीं दर्शन देते? दिखा दो ना एक झलक उन्हें भी। मेरे अच्छे गोपाल भाई! तुम्हें मेरी कसम, मान भी जाओ भैय्या!!!
उत्तर में गोपाल भाई की फिर आवाज़ आई,""अरे तेरी बात दूसरी है। तेरा अन्तःकरण शुद्ध है, इसीलिये मैं तुरन्त ही तेरे पास आ जाता हूँ। तेरे पण्डित जी के लिये बस इतना ही काफी है कि उन्होंने मेरा प्रकाश देख लिया और मेरी आवाज़ सुन ली है।''
इस मधुर रसीली आवाज़ को सुनकर पण्डित जी कृत्कृत्य हो उठे साथ ही उन्हें प्रकाश की एक झलक भी दिखलाई दी। उन्होंने अपने दिल ही दिल में अपने आपको कोसा,""आह! मेरा ह्मदय अभी इतना शुद्ध नहीं है कि मैं दीनबन्धु के सुन्दर मनोहर दर्शन पा सकूँ। फिर भी दयासिन्धु की इतनी ही दया मुझपर कम नहीं है, कि उन्होंने अपनी मधुर रसीली वाणी सुनाकर मुझे आनन्द बख्शा और अपनी नूरानी रोशनी की एक झलक भी
दिखलाई दी।''
वादा के मुताबिक पण्डित जी मोहन को घर तक पहुँचाने गये मोहन के घर पहुंचकर पण्डित जी का भी जन्म धन्य हो गया। वहाँ जाते ही उन्होंने देखा, कि मोहन के गोपाल भाई-मोरमुकुट और पीताम्बरधारी गोपाल भाई मोहन की माता की गोदी में विराजमान हैं और माता की अधखुली अधमुंदी आँखों से न थमने वाली आँसुओं की धारा बहकर उनके घुँघराले काले केशों को धो रही है। माता का हाल यह था कि उसे अपने शरीर की सुध-बुध तक नहीं थी उस समय।
पण्डित जी ने यह नज़ारा देखा और प्रेम में मगन होकर होश हवास खो बैठे और मोहन के साथ वे भी सफल मनोरथ हो गये।''
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