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शुक्रवार, 1 जुलाई 2016

Story

भगत गाथा (25 प्रेमी भगतों की जीवन गाथा)

अन्धेर नगरी चौपट राजा


          गुरु जी को सिर पर राखिये, चलिये आज्ञा माहिं।
          कह  कबीर  ता दास को, तीन लोक डर नाहिं।।
   गुरु का वचन उलंघि करि, जो सेवक कहीं जाय।
   जहँ जाय  तहँ काल है , कहै  कबीर  समुझाय।।
जो गुरुमुख सद्गुरु की आज्ञा अथवा वचन को श्रद्धापूर्वक शिरोधार्य कर उसका पालन करता है, उसे तीनों लोकों में किसी का भय नहीं रहता। वह काल के भय से भी मुक्त हो जाता है। इसके विपरीत यदि सेवक सद्गुरु के वचनों की पालना नहीं करता और उनका उल्लंघन करता है तो फिर निश्चय जानो कि वह अपना अनिष्ट करने पर तुला हुआ है, क्योंकि मन का कहना मानकर सद्गुरु के वचनों का उल्लंघन करके वह मानो स्वयं ही काल के मुख में जाने की तैयारी कर रहा है।
     ""अन्धेर नगरी चौपट राजा'' की कथा तो आप सबने पढ़ी-सुनी होगी, फिर भी आप सबकी रुचि के लिए वह कथा यहाँ दी जाती है, क्योंकि उपर्लिखित महापुरुषों के वचनों की सत्यता पर प्रकाश डालती है और उसकी पुष्टि करती है।
     एक नगरी थी जिसे लोग ""अन्धेर नगरी'' के नाम से पुकारते थे। उस नगरी के राजा का नाम ""चौपट'' था। जैसा उसका नाम था वैसा ही उसका काम भी था। वह अपनी बुद्धि से कुछ भी काम न लेता था। जैसा मंत्री और नौकर-चाकर कह देते, वह वैसा ही मान लेता था। नौेकर-चाकर भी उसकी खुशामद करते और कहते-""महाराज! आपके समान न कोई राजा कभी हुआ है और न ही होगा। कितना बढ़िया है आपका शासन।'' राजा अपनी झूठी प्रशंसा सुनकर फूला न समाता था। उसके राज्य में सभी वस्तुयें टके सेर बिकती थीं। मिट्टी, आटा, खोया, बर्फी, लड्डू, फल, सब्ज़ी-सभी वस्तुयें टके सेर थीं, इसीलिए वहाँ के बारे में लोग यह कहा करते थे किः-
अन्धेर नगरी चौपट राजा।। टके सेर भाजी टके सेर खाजा।।
     एक बार भ्रमण करते हुए एक सन्त उस ओर आ निकले। उनका चेला, जोकि शरीर से खूब ह्मष्ट-पुष्ट था, वह भी उनके साथ था। उन्होने नगर के बाहर एक स्थान पर डेरा लगाया, जहाँ घने छायादार वृक्ष थे और एक कुआँ था। स्नानादि से निवृत्त होकर सन्त जी ने चेले से कहा-नगर में जाकर कुछ खाने-पीने को ले आओ। आज्ञा पाकर चेला नगर में गया। वहाँ जाने पर जब उसे यह ज्ञात हुआ कि वहाँ प्रत्येक वस्तु टके सेर है तो वह मन ही मन बड़ा प्रसन्न हुआ और ढेर सारी मिठाई, बहुत-से मेवे और कमण्डल भरकर दूध ले आया। इतना सारा सामान देखकर उसके गुरुदेव ने पूछा-यह सब कहाँ से ले आए? शिष्य ने सारा हाल बताते हुए निवेदन किया-गुरुदेव! अब तो यहीं पक्का डेरा लगा लीजिए। ऐसी अच्छी जगह छोड़कर, जहाँ इतनी सस्ती चीज़ें मिलें, कहीं और जाने की क्या आवश्यकता है? उसकी बातें सुनते ही गुरुदेव ने तुरन्त अपना सामान बाँधना शुरु किया और शिष्य से बोले-शीघ्र अपना सामान संभालो और यहाँ से निकल चलो। यहाँ एक पल भी रुकना ठीक नहीं।
     किन्तु शिष्य को गुरुदेव की यह बात तनिक भी न भायी। उसने कहा-गुरुदेव! जहां इतने सस्ते मिठाई-मेवे मिलते हों, ऐसी जगह छोड़ने को आप क्यों कह रहे हैं? अब तो यहीं रहकर खूब दूध-मलाई पियें-खायेंगे। साग-रोटी खाते-खाते जी ऊब गया है। गुरुदेव ने उसे बहुत समझाया, परन्तु शिष्य ने उनकी एक न मानी। उनके वचनों की उल्लंघना कर उसने वहीं रहने का निश्चय किया। यह देखकर गुरुदेव बोले-तो फिर हम तो यहाँ से जाते हैं; हम एक क्षण भी यहां नहीं रुकेंगे। तुम्हारी जैसी इच्छा हो करो। किन्तु एक बात हमारी याद रखना कि यदि कभी तुम्हारे ऊपर संकट आए तो हमें स्मरण करना। यह कहकर गुरुदेव वहां से चल दिए। शिष्य वहीं रहकर खूब गुलछर्रे उड़ाने लगा। इसी तरह कुछ दिन बीत गए। एक दिन राजा चौपट के सामने एक मुकदमा पेश हुआ। एक व्यक्ति के घर की दीवार गिर गई थी जिसके नीचे दबकर एक दूसरे व्यक्ति की बकरी मर गई थी। जिस व्यक्ति की बकरी मरी थी, उसने राजा चौपट के दरबार में फरियाद की थी। सभी बात जानकर राजा ने मकान मालिक को बुलवाया और कहा-तुमने दीवार ऐसी कमज़ोर क्यों बनवाई कि वह गिर गई और बकरी उसके नीचे आकर मर गई। बकरी की मृत्यु के तुम दोषी हो। उस व्यक्ति ने उत्तर दिया-महाराज! इसमें मेरा कोई दोष नहीं। राजमिस्त्री ने दीवार बनाई थी, दोष तो उसका है कि उसने दीवार ऐसी कमज़ोर बनाई कि वह गिर गई। राजा ने तुरन्त राज मिस्त्री को पेश करने का आदेश दिया। जब वह दरबार में उपस्थित हुआ तो राजा ने उससे कहा-तुमने ऐसी कमज़ोर दीवार क्यों बनाई कि वह गिर गई और उसके नीचे दबकर बकरी मर गई। उसने उत्तर दिया-महाराज! इसमें दोष मेरा नहीं, मज़दूर का है। उसने गारा ही पतला बनाया था, मैं क्या करता? राजा ने कहा-ऐसी बात है तो फिर मज़दूर को पेश करो।
     मज़दूर के हाज़िर होने पर राजा ने उससे कहा-तुमने गारा इतना पतला क्यों बनाया कि जिससे दीवार कमज़ोर बनी और उसके गिरने से बकरी उसके नीचे दबकर मर गई। मज़दूर ने कहा- मैने गारा ठीक बनाया था। राजा ने कहा-तो फिर दीवार कमज़ोर क्यों बनी? तुमने अवश्य ही गारा पतला बनाया था। तुम बकरी की हत्या के दोषी हो। मंत्री! इसे फाँसी पर लटका दो।
     मज़दूर बहुत रोया-चिल्लाया, परन्तु उसकी सुनता ही कौन था? उसे सैनिक ज़बरदस्ती पकड़कर फाँसी के फंदे तक ले गए और फंदा उसके गले में डाल दिया। किन्तु फन्दा बड़ा था और मज़दूर बेचारा दुबला-पतला, इसलिये उसकी गर्दन फंदे में कसती ही नहीं थी। सैनिक राजा चौपट के पास हाज़िर हुए और अपनी समस्या उसके सामने रखी। सुनकर राजा चौपट ने कहा-ऐसी बात है तो फिर नगर में से किसी मोटे-ताज़े व्यक्ति को ढूंढकर ले आओ जिसकी गर्दन में फंदा फिट बैठे और इस मज़दूर के स्थान पर उसे फांसी पर चढ़ा दो।
     सैनिक राजा चौपट के न्याय की प्रशंसा करते हुए मोटा-ताज़ा व्यक्ति ढूँढने के लिये निकल पड़े। एक बाज़ार से गुजर रहे थे कि एक हलवाई की दुकान पर सन्त जी के शिष्य पर दृष्टि पड़ी। सिपाही उसे देखते ही उछल पड़े और उसे ज़बरदस्ती पकड़कर फाँसी के तख़्ते पर ला खड़ा किया। शिष्य ने कहा- मैने तो कोई अपराध नहीं किया, फिर मुझे क्यों यहाँ लाए हो? राजा चौपट के सैनिकों ने उसे सम्पूर्ण वृत्तान्त कह सुनाया। सुनते ही वह शिष्य सटपटा गया कि यह कैसा न्याय है? उसे गुरुदेव के वचन याद आ गए कि ऐसी नगरी में एक पल रहना भी ठीक नहीं। वह यह सोचकर रोने लगा कि गुरुदेव ने यहाँ रहने से मुझे कितना मना किया, परन्तु मैने उनके वचनों की तनिक भी परवाह न की। उनके वचनों का उल्लंघन कर मैने जो घोर अपराध किया, उसी का यह फल मुझे मिल रहा है। यह सोचकर वह लगा ज़ोर-ज़ोर से रोने और गुरुदेव को याद करने कि हे गुरुदेव! मुझे इस विपदा से बचाओ। तभी उसके गुरुदेव वहाँ पहुंच गए। सम्पूर्ण वृत्तान्त जानकर उन्होंने सैनिकों से कहा-हम इसके गुरु हैं। अब चूँकि यह मरने वाला है, इसलिए हमें इसे अन्तिम उपदेश दे लेने दो जिससे कि यह शान्तिपूर्वक मर सके।
     सैनिकों ने बात मान ली। गुरुदेव ने शिष्य के कान में कुछ शब्द फुसफुसाये और फिर फाँसी के तख़्ते पर चढ़ कर बोले--सैनिको! जल्दी से हमें फाँसी लगा दो। यह सुनकर शिष्य चिल्लाया-नहीं-नहीं,आप फाँसी पर कैसे चढ़ सकते हैं? फाँसी का आदेश मेरे लिए है, इसलिए फाँसी पर चढ़ने का अधिकार मेरा है। गुरुदेव बोले-देख! हम तुम्हारे गुरु हैं, इसलिये तुम्हारे से पहले हमारा अधिकार है। अतः हमको फाँसी पर चढ़ने दो। यह देखकर सैनिक बड़े चकित हुए और राजा को सारी घटना जा सुनाई। यह सुनकर राजा चौपट भी बड़ा हैरान हुआ और स्वयं वहां आया। आते ही उसने प्रश्न किया-भाई! बात क्या है? तुम दोनों ही फाँसी पर क्यों चढ़ना चाहते हो?
     गुरुदेव बोले-आपको यह बात जानकर क्या करना है? समय नष्ट मत कीजिए और हमें फाँसी पर चढ़ाये जाने का शीघ्र आदेश दीजिए। इतने में शिष्य फिर बोल उठा-फाँसी पर तो मैं ही चढ़ूँगा, क्योंकि फाँसी पर मुझे ही चढ़ाये जाने का राजा का आदेश है। यह सुनकर राजा चौपट ने कहा-जब तक तुम लोग बात नहीं स्पष्ट करोगे कि तुम दोनों ही फाँसी पर चढ़ने को क्यों उतावले हो, तब तक किसी को भी फांसी पर नहीं चढ़ाया जायेगा। गुरुदेव ने कहा-हम बताना तो नहीं चाहते थे, परन्तु आप इतना हठ करते हैं तो फिर सुनिये! इस समय स्वर्गलोक में इन्द्र का सिंहासन खाली पड़ा है। इस समय बड़ा अच्छा मुहूर्त है। जो व्यक्ति इस समय फांसी पर चढ़ेगा, वह स्वर्ग का राजा बनेगा। यह सुनकर राजा बोला-तब तो मैं ही फांसी पर चढ़ूँगा। क्योंकि यह हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है। सैनिको! हमें तुरन्त फाँसी पर चढ़ा दो। यह कहकर वह फांसी पर चढ़ गया।
     अब यह कथा सच्ची हो अथवा काल्पनिक, इससे हमें प्रयोजन नहीं। किन्तु एक बात स्पष्ट है कि परमार्थी जीव के लिए यह कथा अत्यन्त शिक्षाप्रद है। क्या शिक्षा मिलती है इससे? यही कि गुरुदेव के वचन का उल्लंघन करना तो मानो स्वयं ही काल का फंदा गले में डालना है। इसके विपरीत गुरुदेव का वचन मानने से मनुष्य काल के फंदे से मुक्त हो जाता है। गुरवाणी के वचन हैंः-
गुर का वचन सदा अबिनासी। गुर कै बचनि कटी जम फांसी।।
     इसी प्रकार सत्पुरुष श्री गुरुनानकदेव जी और मरदाने की कथा भी शिक्षाप्रद है। श्री गुरुनानकदेव जी एक बार भ्रमण करते हुए कामरुप देश की ओर गये और एक बड़े ही सुन्दर नगर की ओर जा निकले। उस समय मरदाना भी उनके साथ था। नगर की सजधज देखकर मरदाने के दिल में यह इच्छा उत्पन्न हुई कि मैं घूम-फिर कर नगर की शोभा देखूँ। उसने श्री गुरुनानकदेव जी के श्री चरणों में नगर को देखने की इच्छा व्यक्त की तो गुरुदेव ने फरमाया-मरदाना! नगर की इस बाहरी सज-धज को मत देखो और न ही इस नगर में घूमने-फिरने की इच्छा उठाओ, क्योंकि यह जादूगरों की नगरी है। किन्तु मरदाने ने श्री गुरुमहाराज जी के वचनों को न माना। उसने कहा-आप थोड़े समय के लिए मुझे आज्ञा दे दें, मैं शीघ्र ही वापस लौट आऊँगा। मना करने पर भी मर्दाने ने जब पुनः आग्रह किया तो गुरुदेव ने फरमाया-जैसी तेरी इच्छा।
     मरदाना नगर में घूमने चला। पहली ही गली में पहुँचा था कि एक जादूगर ने उसके गले में धागा बाँधकर भेड़ा बना दिया और खूँटे से बाँध दिया। मरदाना जब काफी देर तक न लौटा तो श्री गुरुनानक देव जी स्वयं नगर में प्रविष्ट हुए और उसी गली में चले गए। श्री गुरु महाराज जी को देखकर मरदाना भेड़े की आवाज़ में ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने लगा। श्री गुरुमहाराज जी ने उसके गले से जादू का धागा खोल दिया जिससे वह फिर से अपने पहले रुप में परिवर्तित हो गया। मरदाना गुरु महाराज जी के चरणों में गिर पड़ा और उनके वचन न मानने के लिए क्षमा मांगी।
     उपरोक्त सभी तथ्यों और कथाओं पर भलीभांति विचार करके शिष्य सेवक को चाहिए कि सद्गुरु के वचनों को धुर का वचन मानकर श्रद्धापूर्वक उसकी पालना करे। इसी में उसका कल्याण है। गुरुवाणी का वाक हैः-        गुर के वचन सति जीअ धारहु। माणस जनमु देह निस्तारहु।।
अर्थः-""हे जीव! गुरु के वचन सत्य-सत्य मानकर ह्मदय में धारण करो और अपने मनुष्य-जन्म तथा देह का निस्तार कर लो।'

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