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मंगलवार, 16 अगस्त 2016

खोपड़ी देखकर बताता था कि आत्मा कहाँ है

     मीगासारा एक ब्रााहृण था जिसकी बड़ी प्रसिद्धि थी। उसने एक विचित्र सिद्धि प्राप्त कर रखी थी। किसी मृत व्यक्ति की खोपड़ी को हाथ में लेकर और उसे अपनी अंगुली से बजाकर वह यह बता सकता था कि इसकी आत्मा इस समय कहां है। मीगासारा ने महात्मा बुद्ध की प्रशंसा सुन रखी थी और यह भी सुन रखा था कि महात्मा बुद्ध आत्मा को नहीं मानते। वह उत्सुक था उनको अपनी सिद्धि दिखाकर यह मनवाने के लिए कि आत्मा का अस्तित्व है और एक शरीर को छोड़कर दूसरे शरीर में प्रवेश करती है। एक दिन उसे पता चला कि महात्मा बुद्ध पास वाले गाँव में आए हुए हैं। बस! फिर क्या था, वह शीघ्र ही वहां जा पहँचा। महात्मा बुद्ध अपने शिष्यों के साथ एक वृक्ष की छाया में विराजमान थे। मीगासारा ने प्रणाम किया और वार्तालाप आरम्भ हो गया। मीगासारा ने बड़े गर्व से कहा- ""आप तो आत्मा के सम्बन्ध में कुछ नहीं जानते, इसीलिए आत्मा के अस्तित्व से इन्कार करते हैं। परन्तु मैं तो किसी भी मृत व्यक्ति की खोपड़ी को हाथ में लेकर यह बता सकता हूँ कि उसकी आत्मा  कहाँ हैं।''
      यह सुनकर महात्मा बुद्ध बोले- ""यह तो आपकी अति विचित्र कला है। क्या आप हमारे एक भिक्षु की खोपड़ी को देखकर उसकी आत्मा के बारे में  बता सकेंगे?'' अवश्य। आज तक  एक  भी ऐसा अवसर नहीं आया जब मैं यह नहीं बता सका। लाइए, खोपड़ी कहां है?'' मीगासारा ने गर्व से कहा। खोपड़ी लाई गई। मीगासारा उसे हाथ में लेकर घुमाने लगा और अंगुली से बजाने लगा। इसके साथ-साथ उसने कुछ मंत्र भी उच्चारण किए। परन्तु उसके चेहरे से ऐसा प्रतीत हो रहा था कि खोपड़ी कुछ भी नहीं बता रही।
     ""मीगासारा, क्या हुआ? इस भिक्षु की आत्मा कहाँ है?'' महात्मा बुद्ध ने पूछा। जब मीगासारा उस भिक्षु की आत्मा के बारे में बताने में असफल हो गया और उसने अपनी आँखें नीची कर लीं, तब महात्मा बुद्ध ने उसे इस असफलता का रहस्य बताते हुए कहा- ""मीगासारा, घबराओ नहीं। इस खोपड़ी में कोई विचित्र बात नहीं है। मृत्यु से पहले ही इस भिक्षु ने अपनी ""मैं'' अथवा अहम् की भावना को पूरी तरह समाप्त कर दिया था, इसलिए उसने निर्वाण प्राप्त कर लिया और जन्म-मरण के चक्कर से मुक्त हो गया। मीगासारा। सब प्राणी अपने विचारों से व इच्छाओं से अपना एक व्यक्तित्व या मैं या अहंकार बना लेते हैं और वही बन जाता है उनके जन्म-मरण का कारण। मैं जो धर्म सिखाता हूँ, वह इसी ""मैं'' को मिटाता है और व्यक्ति निर्वाण प्राप्त करके जन्म मरण के चक्कर से छुटकारा पा जाता है।
 

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