एक सेठ के तीन लड़के थे, जो जवान थे और काम- काज में उसका हाथ बँटाते थे। एक दिन वह सेठ अपनी चावल-मिल में अपने कार्यालय में बैठा था। तीनों लड़के भी अपने-अपने कार्यालय में बैठे हुए थे। एकाएक सेठ के मस्तिष्क में एक विचार उभरा। उसने तीनों लड़कों को बुलाया और उन्हें साथ लेकर वहाँ गया, जहाँ धान का बहुत बड़ा ढेर पड़ा हुआ था। सेठ ने धान के उस ढेर में से एक-एक मुट्ठी धान उठाकर तीनों लड़कों को दिया और कहा- "यह धान लो और जब मैं माँगू, मुझे वापस कर देना। इस चावल-मिल का कार्य अब कुछ दिन तुम लोग देखना, मैं कुछ दिन दूसरे कार्यों की ओर ध्यान दूँगा।"
सेठ तो यह कहकर घर चला गया। इधर लड़कों ने क्या किया ? सबसे बड़े लड़के ने सोचा कि यहाँ तो हर समय धान के ढेर लगे रहते हैं, यह एक मुट्ठी धान मैं कहाँ सम्भालता फिरूँगा? इसी ढेर में डाल देता हूँ, जब पिता जी माँगेंगे, इसी ढेर में से उठाकर दे दूँगा। यह सोचकर उसने उस एक मुट्ठी धान को ढेर में वापस डाल दिया।
दूसरा लड़का उस एक मुट्ठी धान को अपने कार्यालय में ले गया। वहाँ उसने उस धान को एक कपड़े के टुकड़े में बाँधा और उस पोटली को अलमारी में रख दिया। कभी-कभी वह अलमारी में से पोटली निकालता और उस धान को देख लिया करता।
किन्तु छोटा लड़का बहुत विचारवान् था। उसने मन में सोचा कि धान की तो यहाँ कोई कमी नहीं है, अतएव पिताजी ने जो एक-एक मुट्ठी धान दिया है, उसमें अवश्य ही उनका कोई उद्देश्य निहित है। उसने पूरी मिल का अच्छे-से निरीक्षण किया। मिल की चारदीवारी के बाहर काँटेदार तारों की बाड़ लगी हुई थी। चारदीवारी और तारों की बाड़ के बीच में जो जगह खाली पड़ी थी, उसने मज़दूर लगाकर उसमें थोड़ी- सी जगह ठीक करवायी और वहाँ पर वह एक मुट्ठी धान बोआ दिया। समय आने पर वहाँ धान की फसल उगी, जिससे उसे बहुत धान प्राप्त हुआ।
अगली बार उसने और अधिक जगह साफ़ करवायी और उसमें वह सारा धान बोआ दिया। जब फिर फसल तैयार हुई, तो उसने फिर सारा धान बोआ दिया। इसी प्रकार दो साल व्यतीत हो गये। एक दिन सेठ ने तीनों लड़कों को बुलवाया और सबसे पहले बड़े लड़के से कहा- "मैंने जो तुम्हें एक मुट्ठी धान दिया था, वह ले आओ।"
लड़के ने उत्तर दिया- "जी! अभी ले आता हूँ।"
यह कहकर वह बाहर गया; कुछ ही पलों में मुट्ठी-भर धान ले आया और सेठ के आगे मेज़ पर रख दिया।
सेठ ने कहा- "यह तो वह धान नहीं है, जो मैंने तुम्हें दिया था। यह तो नया धान है।"
लड़के ने कहा- "पिताजी ! यहाँ धान की कोई कमी तो होती नहीं, इसलिये जब आपने धान दिया, तो मैंने यह सोचकर ढेर में डाल दिया कि जब आप माँगेंगे, तो ढेर में से एक मुट्ठी धान उठाकर आपको दे दूँगा।"
सेठ ने रुष्ट होते हुए कहा- "इसका अर्थ यह हुआ कि जो धान मैंने तुमको दिया था, उसे तुमने उसी समय फेंक दिया। क्या मैंने तुम्हें फेंकने के लिये धान दिया था?"
यह सुनकर बड़े लड़के ने नज़रें नीची कर लीं। तब सेठ ने दूसरे लड़के को सम्बोधित करके कहा- "तुमने उस धान का क्या किया ? वह धान ले आओ।"
दूसरे लड़के ने उत्तर दिया- "मैंने उसे पोटली में बाँधकर अलमारी में रखा था, अभी ले आता हूँ।"
यह कहकर वह अपने कार्यालय में गया और धान की वह पोटली अलमारी में से निकालकर ले आया और पिता के आगे पोटली रख दी। सेठ ने पोटली खोली। धान तो काला पड़ चुका था और बिल्कुल ख़राब हो गया था। यह देखकर सेठ ने कहा- "यह तो ख़राब हो गया है। क्या ऐसा ही धान मैंने तुमको दिया था?"
यह सुनकर उसने भी आँखें झुका लीं। तत्पश्चात् तीसरे लड़के की ओर देखकर सेठ बोला- "अब, तुम वह धान ले आओ।"
लड़के ने कहा- "पिता जी! आप मेरे साथ चलने की कृपा करें, ताकि मैं आपको वह धान दे सकूँ।"
सेठ उठ खड़ा हुआ और छोटे लड़के के साथ चल पड़ा। सेठ के अन्य दोनों लड़के भी साथ थे। उस तीसरे लड़के ने जो धान बोआ रखा था और जो चावल गोदाम में बोरियों में भरा पड़ा था, वह सब दिखाते हुए कहा - "पिता जी ! यह सब आपका वही एक मुट्ठी धान है।"
"क्या मतलब?”- सेठ ने प्रश्न किया।
छोटे लड़के ने अथ से इति तक सब बात कह सुनायी, जिसे सुनकर सेठ बहुत प्रसन्न हुआ।
यह तो एक कथानक है। ठीक इसी प्रकार सत्संग सुनने वाले श्रोता भी तीन तरह के होते हैं। पहले तो वे जो सत्संग में आते हैं और सन्त-सत्पुरुषों के वचन भी सुनते हैं, परन्तु सत्संग से उठते समय अपना पल्ला वहीं झाड़ जाते हैं अर्थात् एक कान से सुना, दूसरे कान से निकाल दिया। ऐसे श्रोता सत्संग से भला क्या लाभ उठा सकते हैं अर्थात् कुछ नहीं।
दूसरे प्रकार के श्रोता वे होते हैं, जो सत्संग के वचनों
को सुनकर हृदय की अलमारी में रख लेते हैं और उन वचनों
को कभी-कभी याद कर लिया करते हैं कि अमुक समय सन्त-सत्पुरुषों ने ये वचन फ़रमाये थे, परन्तु फिर उन्हें भूल जाते हैं और वही दुनियादारी के झमेलों में ग्रस्त हो जाते हैं।
तीसरे प्रकार के श्रोता वे होते हैं, जो सत्संग के वचनों को एकाग्रचित्त होकर सुनते हैं, हृदय में धारण करते हैं एवं उन पर आचरण भी करते हैं। ऐसे श्रोता ही वास्तविक अर्थों में सत्संगी हैं और सत्संग से पूरा-पूरा लाभ प्राप्त करके अपने जीवन का कल्याण कर लेते हैं।
परमसन्त श्री कबीर साहिब जी ने श्रोताओं को अग्र- लिखित प्रकार से भी तीन श्रेणियों में विभाजित किया हैः-
पहले प्रकार के श्रोता छलनी की तरह हैं। छलनी में जब कोई वस्तु डालकर छानते हैं, तो वह कंकड़ आदि को तो अपने अन्दर रख लेती है और वास्तविक वस्तु को नीचे फेंक देती है। छलनी के स्वभाव-वाले श्रोता सत्संग में आकर भी दोष और बुराइयाँ ही ढूँढ़ते रहते हैं कि अमुक व्यक्ति ने यह किया, अमुक व्यक्ति यह कर रहा था, अमुक व्यक्ति ऐसा बोल रहा था, अमुक व्यक्ति सो रहा था आदि-आदि। वे सत्संग के वचनों को न तो ध्यान पूर्वक सुनते हैं और न ही उन्हें हृदय में धारण करते हैं, तो उन वचनों पर आचरण भला वे क्या ही करेंगे ?
दूसरे प्रकार के श्रोता ऊखल और मूसल की तरह हैं। धान जब ऊखल में डालकर मूसल से कूटा जाता है, तो चावल और छिलका अलग-अलग तो अवश्य हो जाते हैं, परन्तु उसी मूसल में आपस में मिले रहते हैं। चावल और छिलकों को ऊखल और मूसल अलग नहीं कर सकते। इस प्रकार के श्रोता भी सत्संग में अनेक प्रकार के वचन सुनते हैं, परन्तु इस बात का निर्णय नहीं कर सकते कि कौन-सी वस्तु ग्रहण करने योग्य है और कौन-सी त्यागने योग्य ?
तीसरे प्रकार के श्रोता छाज अर्थात् सूप की तरह हैं। छाज का काम होता है- असार वस्तु को बाहर फेंकना और सार वस्तु को ग्रहण करना। छाज के स्वभाव-वाले श्रोता सत्संग में जाकर दूसरों के दोष और बुराइयाँ नहीं देखते, अपितु सत्संग के वचनों को एकाग्र-चित्त होकर सुनते हैं, उन्हें अपने अन्दर धारण करते हैं और उन वचनों पर आचरणकर उनसे पूरा-पूरा लाभ प्राप्त करते हैं।
इसलिये सच्चे श्रोता बनो अर्थात् सत्संग के वचनों को एकाग्र-चित्त होकर श्रवण करो, श्रद्धा-पूर्वक हृदय में धारण करो और उन पर आचरण करके अपने जीवन का सुधार कर लो।
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